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संपादकीय

बलूचिस्तान में चीनी निवेश का विरोध

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भारत-पाकिस्तान के विभाजन का इतिहास खंगालें तो पता चलता है कि जब 1947 में करीब-करीब यह पक्का हो गया था कि ब्रिटिश राजसत्ता दक्षिण एशिया के इस भूभाग को छोड़कर चली जाएगी और जब यह बात भी तय हो गई कि जो रियासतें होंगी, वे चाहे तो भारत के साथ रहें, चाहे पाकिस्तान के साथ रहें या चाहें तो अपना स्वतंत्र वजूद कायम रखें तो ऐसे में बलूचिस्तान ही ऐसा सूबा था जिसने सबसे पहले अंग्रेजों को लिखित तौर पर कहा था-‘‘हमारा कलात क्षेत्र (बलूचिस्तान) एक अलग रियासत रहेगा और एकछत्र सम्राट होंगे-मीर अहमद यार खान।’’ ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने इसका वचन भी दिया था और ब्रिटेन ने इसकी घोषणा भी कर दी थी।

केवल 225 दिन बलूचिस्तान आजाद रहा। अप्रैल 1948 में पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर आक्रमण कर उस पर जबर्दस्ती कब्जा कर लिया। पाकिस्तान ने इस कामयाबी पर जमकर जश्न मनाया। बलूचिस्तान तब भी खून से सराबोर था। पाकिस्तान की दुष्टता ने उसे कभी चैन से नहीं रहने दिया। तब से लेकर आज तक पाकिस्तान के हुक्मरानों ने बलूचिस्तान से उठी आजादी की आवाजों को कुचला है। बलूचिस्तान के संसाधनों का पाकिस्तान ने जमकर दुरुपयोग किया लेकिन वहां के अवाम पर अत्याचार ही हुए। बलूचिस्तान का इतिहास लम्बे समय से संघर्ष से भरा पड़ा है। बलूच पाकिस्तान से स्वायत्तता और संसाधनों पर अपने हक की मांग करते रहे हैं।

वर्षों तक पाकिस्तान की सेना ने बलूच अलगाववादियों का दमन करने की कोशिश की और इस दौरान मानवाधिकारों का गम्भीर उल्लंघन भी किया गया। जब से चीन ने पाकिस्तान में घुसपैठ की है तब से न केवल पाक अधिकृत कश्मीर में बल्कि बलूचिस्तान में राष्ट्रवादी आंदोलन को नई धार मिल गई है। चीनी निवेश की सुरक्षा में पाकिस्तान की प्र​तिबद्धता और इस इलाके में बढ़ती सैन्य मौजूदगी की वजह से बलूचों के मन में असंतोष बढ़ गया है। बलूचिस्तान फिर पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बन गया है। वहां का अवाम चीन के निवेश का विरोध कर रहा है। बलूच के चरमपंथी अब फिदायीन हमले कर तनाव बढ़ा रहे हैं। पिछले दिनों एक बंदूकधारी ने ग्वादर स्थित एक आलीशान पर्ल कांटिनेंटल होटल में हमला किया था। यह हमला चीन की सीपीईसी परियोजना से जुड़ा हुआ है।

बलूचिस्तान के अलगाववादी संगठनों द्वारा चीन का विरोध किए जाने की पहली बड़ी वजह चीन द्वारा पाकिस्तान में किए जा रहे 60 अरब डॉलर के भारी निवेश हैं। चीन के इस निवेश का सबसे बड़ा हिस्सा बलूचिस्तान में ही खर्च किया जा रहा है। दरअसल चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का सबसे अहम भाग बलूचिस्तान का ग्वादर बंदरगाह है। इस वजह से चीन इस प्रांत में गलियारे के साथ-साथ कई अन्य प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रहा है। वह बलूचिस्तान में बुनियादी ढांचा, परिवहन और ऊर्जा परियोजनाओं जैसे एलएनजी (लिक्विड नैचुरल गैस) टर्मिनल और गैस पाइप लाइन में भी निवेश कर रहा है। ग्वादर बंदरगाह के करीब ही एक विशेष आर्थिक क्षेत्र का निर्माण भी किया जा रहा है, जिसमें करीब 5 लाख चीनियों के रहने की व्यवस्था होगी।

कुल मिलाकर देखें तो बलूचिस्तान चीन के सीपीईसी प्रोजेक्ट की रीढ़ जैसा है। चीन की परियोजनाओं को पाकिस्तान की सरकार देश का भाग्य बदलने वाली कवायद मानती है लेकिन बलूचिस्तान, जो इस प्रोजेक्ट का सबसे अहम हिस्सा है, के लोगों को इसका कोई फायदा नहीं हो रहा। चीन के इतने बड़े निवेश के बाद बलूचिस्तान के लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार आदि की उम्मीद जगी थी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। चीनी प्रोजेक्ट्स में मैन पॉवर से लेकर मैटीरियल और मशीनरी तक सब चीन के ही इस्तेमाल हो रहे हैं। प्रोजेक्ट्स के कॉन्ट्रेक्ट भी चीनी ठेकेदारों को ही दिए जा रहे हैं। इसके अलावा बलूचिस्तान के लोग गलियारे के लिए जमीनों के अधिग्रहण और मुआवजे को लेकर भी खासे नाराज हैं। साथ ही यहां सीपीईसी से जुड़ी परियोजनाओं में पारदर्शिता के अभाव और भ्रष्टाचार होने के आरोप भी लग रहे हैं।

पाकिस्तान की सरकार भी बलूच लोगों को लेकर काफी गैर-जिम्मेदार दिखी है। सीपीईसी की घोषणा से लेकर अब तक किसी भी सरकारी दस्तावेज में यह नहीं कहा गया है कि बलूचियों को इस निवेश का कोई लाभ होगा या दिया जाएगा। जब से बलूचिस्तान में चीन की परियोजनाओं की घोषणा हुई है तब से वहां व्यापारिक सम्भावनाओं को देखते हुए अन्य प्रांतों के लोगों ने बड़े स्तर पर निवेश करना शुरू कर दिया है। ये लोग बलूचिस्तान के ग्रामीण इलाकों में बहुत कम दामों पर जमीन खरीद रहे हैं। पाकिस्तानी पत्रकारों की मानें तो बलूचिस्तान के अलगाववादी संगठनों के साथ वहां के आम लोगों को भी लगता है कि चीन की सीपीईसी परियोजना की वजह से उनके यहां जो कुछ हो रहा है, वह बलूच समुदाय के लिए बड़ी तबाही जैसा होगा। इनका मानना है कि इससे न सिर्फ वे प्राकृतिक संसाधनों और खनिजों की प्रचुरता वाली अपनी जमीन खो देंगे बल्कि बाहरी लोगों के बड़ी संख्या में उनके यहां बसने से वे अपनी पहचान भी खो देंगे। यही वजह है कि बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी सहित इस प्रांत के सभी अलगाववादी संगठन चीन के खिलाफ हो गए हैं।

पिछले दिनों चीनी काफिले पर हमले के बाद बलूच लिबरेशन आर्मी ने पाक प्रधानमंत्री इमरान खान और चीनी सरकार के लिए एक संदेश जारी किया था। इसमें बीएलए कमांडर जीयन बलूच ने कहा था, ‘‘हमारे लड़ाके अपनी जमीन की रक्षा करने में सक्षम हैं। बीएलए की नीति साफ है कि वह चीन या किसी भी अन्य बाहरी ताकत को अपने क्षेत्र की धन-सम्पदा लूटने नहीं देगा। पाकिस्तान सरकार और चीन दोनों ही बलूचिस्तान में बलूचों की ही पहचान खत्म करना चाहते हैं। इस तरह के हमले तब तक जारी रहेंगे जब तक चीन पाकिस्तान के साथ अपनी सांठगांठ को खत्म नहीं कर देता। पाकिस्तान की लड़कियों की चीन के लड़कों से शादियां और उनके यौन शोषण की खबरें चीन के खिलाफ आक्रोश को और भड़का रही हैं।

चीनी नागरिक पाकिस्तान की गरीब लड़कियों को शिकार बना रहे हैं और उन्हें चीन ले जाकर वेश्यावृत्ति के धंधे में धकेल देते हैं। इस रैकेट में ईसाई, पादरी और कुछ मौलाना भी शामिल हैं। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालत खराब है। पिछले कुछ हफ्तों से पाकिस्तान में मंजूर पश्तीन नाम का एक युवा पश्तून नेता सुर्खियों में है। पश्तीन पाकिस्तान के युद्धग्रस्त इलाके दक्षिणी वजीरिस्तान से ताल्लुक रखते हैं। वह भी पश्तूनों की सुरक्षा, नागरिक स्वतंत्रता और समान अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। देखना होगा पाकिस्तान अपने भीतर के खतरों से कैसे निपटता है और चीन अपने बढ़ते विरोध को कैसे शांत करता है। कुल मिलाकर पाकिस्तान का भविष्य अच्छा नजर नहीं आता। कुछ लोग तो पाकिस्तान के टूट जाने की भविष्यवाणियां भी करने लगे हैं।