कर्नाटक से उगती विपक्षी एकता


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कर्नाटक में कांग्रेस व जनता दल (एस) की सरकार गठित होने से राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों की एकता का मार्ग जिस तरह प्रशस्त हुआ है उसका श्रेय निश्चित रूप से इस राज्य में चुनाव परिणामों के बाद चले हैर​त में डालने वाले नाटक को दिया जा सकता है। इस नाटक में राज्यपाल की भूमिका केन्द्र में इस तरह रही कि विपक्षी दलों को अपना पक्ष रखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जाना पड़ा। इससे प्राथमिक तौर पर यह सिद्ध होता है कि सत्ता पर अपना दावा ठोकने वाले भाजपा नेता बी.एस. येदियुरप्पा ने चुनाव आयोग द्वारा अधिसूचित दलीय आधार पर चुने गए विधायकों की ‘संख्या’ के आधार पर अपने बहुमत का आकलन न करते हुए ‘ताकत’ के आधार पर किया। इस अनदेखी ताकत का सार्वजनिक प्रदर्शन जनता दल (एस) व कांग्रेस द्वारा अपने विधायकों को कर्नाटक से बाहर दूसरे राज्यों में सुरक्षित स्थानों पर ले जाने से हो गया, जिससे उनकी संख्या में कोई कमी न हो सके।

हमारे संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का आधार सजावटी या दिखावटी नहीं है बल्कि इस तरह व्यावहारिक है कि हर छह महीने बाद हुकूमत पर काबिज किसी भी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सके। यह नियम केन्द्र से लेकर राज्यों में एक समान रूप से लागू होता है मगर इसकी शर्त एक ही होती है कि हर हालत में सरकार बहुमत की ही होगी। बहुमत की रोशनी में ही किसी चुनाव परिणाम का विश्लेषण किया जायेगा। यदि इस नियम का पालन न होता तो 1967 में किस तरह नौ राज्यों में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकारों का गठन हो पाता जबकि इनमें से अधिकतम सरकारें चुनावों में कांग्रेस पार्टी को मिले हाशिये पर बहुमत को समाप्त करके ही गठित की गई थीं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, प. बंगाल व बिहार जैसे राज्यों से कांग्रेसी नेताओं ने ही अपनी पार्टी छोड़कर अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर संयुक्त विधायक दलों की सरकारें बनाई थीं। इनमें कुछ सरकारें एेसी थीं जिनमें जनसंघ व कम्युनिस्ट दोनों ही शामिल थे। सवाल खड़ा हो सकता है कि क्या ये सरकारें जनादेश का अपमान थीं? बेशक ये सरकारें आधी-अधूरी ही चलीं मगर तब तक ही चलीं जब तक उनके पास सदन के भीतर बहुमत था।

तब तो दल-बदल कानून भी नहीं था जबकि अब सख्त दल-बदल कानून वजूद में है जिसके तहत चुने जाने के तुरन्त बाद भी यदि कोई विधायक किसी भी कारण से अपना दल बदलता है तो उसकी सदस्यता तुरन्त समाप्त हो जाती है। एेसी परिस्थितियों में बहुमत से एक सीट दूर रह जाने पर भी (यदि कोई निर्दलीय सदस्य चुनकर नहीं आया है) सरकार बनाने का हक उसी के पास होगा जिसके पास एक सीट ज्यादा है मगर लोकतन्त्र संविधान से चलता है जिसकी वजह से विपक्ष सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे पर पहुंच गया और वहां से उसे राहत मिली लेकिन लोकतन्त्र का यह भी नियम है कि चुनावों में हार-जीत बहुदलीय एकता करके कोई भी गठजोड़ किसी एेसे अकेले दल को नहीं हरा सकता है जिसके राजनीतिक सिद्धांत पर आम जनता का विश्वास हो। इसका उदाहरण 1971 में हुए लोकसभा चुनाव हैं जिनमें स्व. इंदिरा गांधी की नई कांग्रेस ने विपक्षी दलों के बने चौगुटे को बुरी तरह हरा दिया था और बड़े-बड़े दिग्गज ढेर रहे थे। यह चौगुटा केवल स्वतन्त्र पार्टी, संसोपा, जनसंघ, संगठन कांग्रेस का ही नहीं था बल्कि इसमें स्व. चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रां​ित दल, डा. फरीदी की मुस्लिम मजलिस पार्टी के अलावा अन्य राज्यों के क्षेत्रीय दल भी शामिल थे और देश के उद्योग व पूंजीपति जगत और पूर्व राजे-रजवाड़ों का भी इसे खुला समर्थन प्राप्त था मगर हश्र क्या निकला, झुंझुनूं से के.के. बिड़ला हारे।

मुम्बई से टाटा हारे, फरीदाबाद से एस्कार्ट्स के मालिक एच.पी. नन्दा हारे, यहां तक कि स्व. चौधरी चरण सिंह भी अपने जीवन में पहली बार मुजफ्फरनगर सीट से इंदिरा गांधी समर्थित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी कामरेड विजयपाल सिंह से हार गए। पूर्व राजा-महाराजाओं का तो हिसाब ही नहीं। केवल ग्वालियर रियासत के लोगों को छोड़कर बड़ी-बड़ी रियासतों के पूर्व महाराजा इस तरह हारे कि उनमें से कई की तो जमानतें भी जब्त हो गईं मगर जो लोग सोचते हैं कि यह सब स्व. इंदिरा गांधी का व्यक्तिगत करिश्मा था वे हकीकत को नजरंदाज करते हैं? हकीकत यह है कि अभी तक के इतिहास में केवल 1971 में ही लोकसभा चुनाव आर्थिक मुद्दों पर हुए हैं। क्योंकि यह जीत इन्दिरा जी द्वारा दिए गए उस आर्थिक अधिकार की थी जो उन्होंने इस देश के गरीब आदमी को ‘गरीबी हटाओ’ कहते हुए दिया था। इसके जवाब में प्रतिद्वन्दी चौगुटा कोई कारगर सियासती तजवीज पेश नहीं कर पाया और इन्दिरा जी की तरफ से एेलान कर दिया गया कि ‘वे कहते हैं कि इन्दिरा हटाओ।’ जो लोग इसे इन्दिरा गांधी की व्यक्तिगत जीत बताते हैं वे भारत के मतदाताओं का अपमान ही करते हैं क्योंकि श्रीमती इन्दिरा गांधी के व्यक्तित्व का करिश्मा बंगलादेश युद्ध के बाद पूरे भारत के लोगों के सिर चढ़ कर बोला और वह देखते-देखते ही ‘प्रियदर्शनी’ बन गईं।

2014 के चुनाव राजनीतिक नेतृत्व के निर्वात में लड़े गए थे जिसमें श्री नरेन्द्र मोदी का प्रवेश एक जोरदार राजनीतिक झोंके की तरह हुआ और लोगों ने उनके द्वारा रखे गए विमर्श को कोई दूसरा कारगर विकल्प न देखते हुए अपनी मंजूरी दी। यह जीत उस विमर्श की थी जिसे भाजपा अपने जनसंघ काल से ही लगातार केन्द्र में लाने के प्रयास में लगे रहकर कई पीढि़यां खपा चुकी थी। श्री मोदी इसके प्रतीक बनकर नायक बन गए मगर यह राजनीतिक तजवीज ही थी जो मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में गोलबन्द कर रही थी। विपक्षी एकता होने भर से 2019 में विजय के सपने को साकार नहीं किया जा सकता है। कड़ी टक्कर की तभी संभावना हो सकती है जब संयुक्त विपक्ष भाजपा के मुकाबले कोई कारगर राजनीतिक विमर्श पेश करके लोगों को उसकी तरफ आकर्षित होने के लिए बाध्य करे। भारत में चुनाव राष्ट्रपति प्रणाली की तर्ज पर नहीं लड़े जाते हैं बल्कि पार्टीगत आधार पर ही लड़े जाते हैं। इसका प्रमाण 1977 के चुनाव हैं जिनमें विभिन्न दलों की खिचड़ी से बनी जनता पार्टी ने उत्तर भारत में इन्दिरा जी की कांग्रेस को करारी शिकस्त दी थी।

बिना शक ये चुनाव इमरजैंसी के मुद्दे पर हुए थे जिसने सभी विपक्षी दलों को एक मंच पर आने के लिए इस तरह मजबूर कर दिया था कि उन्होंने अपना वजूद जनता पार्टी में समाहित कर दिया था। इस पार्टी का चुनावी जीत के बाद प्रधानमन्त्री कौन होगा किसी को नहीं पता था क्योंकि एक दावेदार नहीं बल्कि कई कद्दावर नेता थे लेकिन भारत इससे बहुत आगे बढ़ चुका है और इसने 1996 से 2010 तक सांझा सरकारों का दौर भी सफलतापूर्वक पार किया है जिसमें नेतृत्व के झगड़े नहीं हुए। यहां तक कि डा. मनमोहन सिंह ने दोनों बार लोकसभा चुनाव भी नहीं लड़ा और वह दस साल तक प्रधानमंत्री भी बने रहे। इसलिए बहस जब भी जनता को आकर्षित करेगी व्यक्तित्वों पर नहीं बल्कि राजनीतिक विमर्श पर ही करेगी। विपक्ष के एकजुट होने पर सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा यह होगा कि संयुक्त विपक्ष का नेतृत्व कौन करेगा यानि प्रधानमंत्री पद का दावेदार कौन होगा। अब तक जितनी भी खिचड़ी सरकारें बनी हैं उनमें हमेशा सरकारें अस्थिर ही रही हैं। देश को स्थायी आैर मजबूत सरकार देने के लिए देश की जनता का विश्वास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्र​ति कायम है और 2019 के चुनाव में फैसला देश की जनता ही करेगी।