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संपादकीय

एक माता-पिता का दर्द

पिछले सप्ताह मैंने लिखा था कि महिलाओं का सम्मान बहुत जरूरी है। बहुत सी महिलाओं के पत्र व फोन आए तो मालूम पड़ा कि बहुत सी महिलाएं पीड़ा में हैं जिससे मन और मजबूत बन रहा है। आने वाले समय में महिलाओं के लिए बीड़ा उठाना होगा।

आज चुनावी माहौल है। सब लोग, जनता, नेता चुनावी माहौल में रंगे हुए हैं। टी.वी., अखबार, सोशल मीडिया पर एक ही बात है चुनाव और देश में जब महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले अधिकारों की बात संवैधानिक व्यवस्था के तहत बढ़-चढ़कर की जा रही हो तो ऐसे में देश को हिलाकर रख देने वाले निर्भया रेपकांड के पीड़ित एक माता-पिता वोट न डालने की बात कहें तो बहुत दर्द होता है। निर्भया कांड कभी भी भुलाया नहीं जा सकता, जिसने देश-विदेश को हिलाकर रख दिया था। देश का हर निवासी बाहर निकल कर आया था।

हर मां, बहन, बेटी रोई थी। सबने उस दर्द, पीड़ा को महसूस किया था, अपनी पीड़ा समझी थी। देश की उस बेटी की माता श्रीमती आशा देवी और पिता श्री बद्रीनाथ सिंह जी ने बाकायदा नई दिल्ली में एक प्रैस कांफ्रैंस में कहा कि विभिन्न राजनीतिक पार्टियां आजकल नौटंकी की तरह काम कर रही हैं। उन्होंने कहा कि हमारे से राजनीतिक पार्टियों ने बड़ी सहानुभूति जताई लेकिन यह सब नौटंकी है। भले ही लोग कह देते हों कि बलात्कारियों को फांसी की सजा का ऐलान हो गया है पर हम मानते हैं कि बलात्कारी जिन्दा हैं। मैंने निर्भया की मां के साथ कई मंच साझे किए हैं। अभी तक उनके आंसू नहीं थमते और देश में बेटियों को इन्साफ दिलाने का जज्बा है।

अभी मैं अपने लेख के माध्यम से जो भी सरकार आने वाली है उससे यही कहूंगी कि नारों से नहीं, जमीनी हकीकत पर बेटियों के लिए काम होना चाहिए ताकि कोई मां ऐसा निर्णय न ले। आखिर में मैं यही कहूंगी कि महिलाओं का सम्मान और नारी सशक्तिकरण तभी हो सकता है अगर प्रावधानों को गम्भीरतापूर्वक लागू किया जाए। निर्भया के माता-पिता का यह कहना कि आज भी शहर की सड़कें महिलाओं और बच्चियों के लिए असुरक्षित बनी हुई  हैं, सचमुच हमारी सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल रहा है। मैंने सैकड़ों बार रेप घटनाओं के बाद आयोजित चैनलों और डिबेट्स में दिल्ली में महिलाओं और बिच्चयों की सुरक्षा की बात उठाते हुए हर बार यही कहा कि अपराधियों के दिल में सजा का डर होना चाहिए। जब तक किसी अपराधी को सजा नहीं मिलेगी तब तक नारी पर अपराध होते रहेंगे। निर्भया रेप कांड के बाद भी कोई कमी बलात्कार की घटनाओं में नहीं आई।

नन्हीं-नन्हीं बच्चियों से रेप की घटनाएं बढ़ीं। मैं समझती हूं कि दिल्ली में सुरक्षा की बात कहना तथा इसे निभाना भी आना चाहिए। श्रीमती आशा देवी ने तो साफ कह दिया कि मेरा तो व्यवस्था से भरोसा उठ गया है। यह प्रमाणित करता है कि किस प्रकार राजनीतिक पार्टियां और सत्ता में बैठे लोग काम कर रहे हैं।

मैं श्रीमती आशा देवी के इस वक्तव्य पर हैरान हूं जिसमें उन्होंने यह कहा कि महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण की बातें हर पार्टियां करती हैं परंतु उन्होंने साफ कहा कि दु:ख की बात है कि निर्भया राहत कोष का समुचित ढंग से इस्तेमाल भी नहीं हुआ। कहने का मतलब यह है कि महिलाओं के सम्मान को समझा ही नहीं जाता। पिछले दिनों कुछ नेताओं के महिलाओं के प्रति बोल वचनों को लेकर मैंने उन्हें मर्यादा में रहने की बात कही थी परंतु एक पारिवारिक महिला होने के नाते मैंने सम्मानपूर्वक यह बात कही लेकिन ऐसा लगता है कि नारी को लेकर पुरुष की मानसिकता आज भी जंगली ही रही है।

निर्भया के माता-पिता का वोट न डालने का फैसला जहां सरकारी सिस्टम की असफलता पर कड़ा प्रहार है वहीं यह उतना ही चौंकाने वाला है जैसा कि 16 दिसम्बर 2012 का मंजर था परन्तु मेरा उनसे अनुरोध है कि सिस्टम को बदलने के लिए उन्हें एक बार फिर हिम्मत दिखानी होगी आैर बैलेट काे हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए आगे बढ़ना होगा। नारी सम्मान आैर सुरक्षा तथा निर्भया के संघर्ष को हम कोटि-कोटि नमन करते हैं आैर संकल्प लेते हैं कि महिलाओं को न्याय के लिए हम हमेशा आवाज उठाते रहेंगे।