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पाकिस्तान पगला चुका है!

कश्मीर को लेकर पाकिस्तान अब पूरी तरह बौखलाया सा नहीं बल्कि पगलाया सा लगता है क्योंकि इस देश के प्रधानमन्त्री से लेकर अन्य राजनैतिक नेता जिस तरह की हरकतें कर रहे हैं उनसे लगता है कि इस मुल्क के वजूद के लिए ही जैसे खतरा खड़ा होने वाला है। दूसरी तरफ हमारे रक्षामन्त्री श्री राजनाथ सिंह ने एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है कि कश्मीर के बारे में पाकिस्तान की हैसियत क्या है? अर्थात वह किस हैसियत से भारत के इस राज्य के बारे में बोल सकता है? 

क्या कभी कश्मीर उसका हिस्सा रहा? भारत और पाकिस्तान की भौगोलिक सीमाएं खिंच जाने के समय जम्मू-कश्मीर एक स्वतन्त्र रियासत थी जिसका 26 अक्टूबर 1947 को भारतीय संघ में विलय हो गया और इससे पहले पाकिस्तान ने इस रियासत पर हमला करके इसका एक हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया तो पाकिस्तान की हैसियत एक हमलावर की हुई मगर क्या कयामत है कि हमलावर चिल्ला रहा है कि उसका सरमाया लुट रहा है। इसका वजीरे आजम इमरान खान कभी लोगों से कश्मीर मुहिम के लिए आधे घंटे खड़े होने की अपील कर रहा है तो कभी उस बलूचिस्तान से ‘एटमी मिसाइल गजनवी’ को हवा में दाग कर धमकी दे रहा है तो कभी ऐलान कर रहा है कि पाकिस्तान हिन्दोस्तान के हवाई जहाजों को पाकिस्तान के ऊपर से उड़ने पर रोक लगा देगा। 

यह पूरी तरह बेहोशी की हालत है जिसमें पाकिस्तान भूल रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय नागर विमानन के नियम होते हैं जिनसे हर मुल्क बन्धा रहता है। मिसाइल का परीक्षण करने से क्या फर्क पड़ जायेगा? भारत के पास गजनवी से चार गुना क्षमता की अग्नि मिसाइलें हैं मगर हमारी घोषित नीति शान्त और सह-अस्तित्व की है। पिछले 70 साल का इतिहास गवाह है कि भारत ने कभी भी पाकिस्तान पर अपनी तरफ से कोई आक्रमणकारी कार्रवाई नहीं की, जब भी उसने हुंकार भरी है जवाबी कार्रवाई के तौर पर ही भरी है और हर बार पाकिस्तान को उसी की जमीन में घेर कर उलटा लटकाया है। 

जम्मू-कश्मीर से धारा 370 समाप्त करने का फैसला भारत की संसद का है जिसे दुनिया की कोई भी ताकत चुनौती नहीं दे सकती मगर अपने मुल्क के सूबे बलूचिस्तान में वहां के नागरिकों पर जुल्म ढहाने वाले पाकिस्तान को भारत की इस संवैधानिक कार्रवाई से परेशानी हो रही है और वह अपनी हैसियत से बाहर आने की जुर्रत इस तरह कर रहा है जैसे कश्मीर में केसर की खेती इसी ने शुरू की हो। सबूत रहना चाहिए कि इस राज्य के स्वतन्त्रता के समय सबसे लोकप्रिय नेता स्व. शेख अब्दुल्ला के परदादा कौल कश्मीरी पंडित थे। अतः कश्मीरियों ने कभी मजहब की बुनियाद पर तामीर हुए पाकिस्तान का समर्थन नहीं किया। इसलिए रक्षामन्त्री श्री राजनाथ सिंह ने यह बिल्कुल सही कहा कि पाकिस्तान की हालत बिल्कुल ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ जैसी है। 

यह भारत को देखना है कि कश्मीरियों के लिए किस प्रकार की राजनैतिक व्यवस्था समयोचित है। हो सकता है कि 1947 में धारा 370 को तत्कालीन सत्तासीन सरकार ने उपयुक्त समझते हुए इसे अस्थायी तौर पर लागू किया हो मगर पिछले 70 साल में परिस्थितियों में भारी परिवर्तन आया है। वह पाकिस्तान आधा रह चुका है जो उस समय था। अब इसमें से नया देश बांग्लादेश बन चुका है। आज का पाकिस्तान आतंकवाद की फैक्टरी की तरह पूरी दुनिया में बदनाम हो चुका है। इसकी सरकारी नीति आतंकवाद को एक हथियार के रूप में प्रयोग करने की बन चुकी है। पिछले तीस साल से यह इसी नीति का प्रयोग भारत के जम्मू-कश्मीर में कर रहा है और वहीं के भोले-भाले नागरिकों को अपना शिकार बना रहा है। 

बल्कि इससे भी ऊपर इसने मजहबी जेहादी दहशतगर्दी को बढ़ाने में अपनी फौज को भी खुली छूट दी है जिसकी वजह से भारत की आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था के सामने भी चुनौती खड़ी करने की इसने नापाक कोशिश की है मगर भारत के मुसलमान भारत माता के वे सच्चे सपूत हैं जिन्होंने हर मौके पर कुर्बानियां देने में हिन्दुओं से भी आगे बढ़कर बाजी मारी है। चाहे ब्रिगेडियर उस्मान हों या हवलदार अब्दुल हमीद, सभी ने पाकिस्तान के मुंह पर तमाचा मार कर हिन्दोस्तानियत की कहानी लिखी है लेकिन अफसोस उन लोगों पर होता है जो मौजूदा मोदी सरकार और भाजपा की मुखालफत के नाम पर वही भाषा बोल रहे हैं जो पाकिस्तान के सियासतदां बोलते हुए नजर आते हैं। चाहे सीताराम येचुरी हों या राहुल गांधी, वे सबसे पहले भारतीय हैं और हर भारतीय का यह राष्ट्रधर्म है कि वह भारत की समन्वित एकता को मजबूत करने की हर कार्रवाई का खुले दिल से समर्थन करे। 

कश्मीर में यदि फिलहाल हालात सामान्य नहीं हैं तो उन्हें सामान्य बनाने के लिए सरकार का सहयोग किया जाना चाहिए न कि उसकी आलोचना करने के बहाने ढूंढे जाने चाहिएं। दलगत राजनीति भारतीय लोकतन्त्र में पूरी तरह जायज है मगर राष्ट्रहित की कीमत पर नहीं। याद रखा जाना चाहिए कि कश्मीर के साथ कश्मीरी भी हमारे हैं और उन्हें भी वे सभी हक मिलने चाहिएं जो भारतीय संविधान किसी अन्य राज्य के किसी भी नागरिक को देता है। मानवीय मुद्दा केवल तात्कालिक जरूरत के मुताबिक अस्थायी प्रतिबन्ध ही नहीं है बल्कि बराबर के अधिकार भी है लेकिन विपक्ष फिलहाल ऐसी दकियानूस सोच में बन्धा हुआ दिखाई पड़ रहा है जिसका सम्बन्ध अतीत की शिथिलताओं से है। 

राजनीति का भी यह नियम है कि शिथिलता को कभी स्थायी भाव से नहीं देखा जा सकता वरना सत्तर साल में हम संविधान में सौ बार संशोधन क्यों करते। अतः वक्त की मांग है कि पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए हम अपनी आन्तरिक राजनीति को भूलकर देश की राजनीति करें और उस कश्मीर को भी भारतीय संघ से जोड़ें जिसे नामुराद मुल्क पाकिस्तान ने जबरन अपने कब्जे में किया हुआ है... जय हिन्द।