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पाकिस्तान-तालिबान एक समान !

अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करने वाले देशों के​ लिए कंट्रीज ऑफ पर्टीकुलर कंसर्न यानी सीपीसी की सूची जारी की है। पाकिस्तान को रेडलिस्ट में रखा गया है, इस सूची में पाकिस्तान के साथ चीन, तालिबान, ईरान, रूस, सऊदी अरब, ​एरिट्रिया, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और  म्यांमार भी शामिल हैं। इसके अलावा कुछ और देशों को विशेष निगरानी सूची में रखा गया है। हालांकि धार्मिक आजादी  का आकलन  करने वाले एक अमरीकी  पैनल यूएस कमिशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम ने इस सूची में भारत का नाम शामिल करने का सुझाव दिया था लेकिन बाइडेन प्रशासन ने इस सुझाव को ठुकरा दिया है। इस सूची में भारत का नाम नहीं आने पर पाकिस्तान फिर से बौखला उठा है और सूची पर सवाल दागने लगा है। यह सारी दुनिया जानती है कि धर्म के नाम पर उत्पीड़न पाकिस्तान की प्रवृत्ति बन गया है। जहां हिन्दू, ईसाई और अहमदिया जैसे अल्पसंख्यक समुदाय धार्मिक कट्टरपंथियों के हाथों उत्पीड़न झेलने पर मजबूर हैं। एक तो पाकिस्तान की सरकारें हमेशा सेना के बूटों के दबाव में ही चलती रही हैं। दूसरा पाकिस्तान के हुक्मरान कट्टरपंथियों के हाथों की कठपुतली रहे हैं। पाकिस्तान को मुख्यतः सेना और इस्लामी चरमपंथी समूह चलाते हैं इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किए जाने की उम्मीद ही नहीं बचती। 

यह बात कोई छिपी हुई नहीं है बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ज्ञात तथ्य हैं कि मुस्लिम बहुसंख्यक पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है। हिन्दू, सिख और ईसाई लड़कियों के अपहरण, बलात्कार और  जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाएं भयावह रूप से अक्सर होती रहती हैं। हिन्दुओं के धर्म स्थानों को तोड़ा जाता है। सिखों के पवित्र स्थल गुरुद्वारा ननकाना  साहिब पर भी हमले किए गए। 1990 से लेकर अब तक ईश निंदा कानून के तहत 70 से ज्यादा लोगों को मौत की सजा सुनाई गई है और कई अन्य को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। सजा पाने वालों में ईसाई समुदाय से जुड़े लोग शामिल हैं।

इमरान सरकार भी देश से सख्त ईश निंदा कानूनों के अपमानजनक प्रवर्तन ने गैर मुस्लिमों, शिया मुसलमानों, हिन्दुओं, सिखों और अहमदियों के अधिकारों का दमन जारी रखा। एक शोध पत्र के अनुसार पाकिस्तान में हर महीने औसतन 25 हिन्दू लड़कियों का अपहरण और धर्मांतरण किया जाता है। 1947 में देश की आबादी में लगभग 15 प्रतिशत हिन्दू शामिल थे, अब वे मात्र दो फीसदी हैं। अपहरण, जुल्म और जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन हिन्दुओं का भाग्य है। वहां हिन्दुओ को नौकरी पाने के लिए मुस्लिम नाम अपनाने पड़ते हैं। अत्याचारों से तंग आकर और अपनी बहू-बेटियों की इज्जत बचाने के लिए पाकिस्तानी हिन्दू भारत में आकर शरण ले रहे हैं। पाकिस्तान में ईसाई मुख्य रूप से लाहौर के शहरों के आसपास केन्द्रित हैं, फैसलाबाद और कराची, कुछ खैबर पख्तूनवा प्रांत में स्थित हैं।

गरीब ईसाई लड़कियों की तस्करी धनी चीनी दूल्हों में की जाती है। आतंकवादियों की भीड़ चर्चों को निशाना बनाती रहती है। पाकिस्तान की मुख्यधारा के राजनीतिक दल और नीति निर्धारक भी गैर मुस्लिमों को गम्भीरता से नहीं लेते। इमरान खान ने घोषणा की थी कि उनकी सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि अल्पसंख्यकों को न्यू पाकिस्तान में सुरक्षित , संरक्षित और समान अधिकार मिलें। इस भाषण में उन्होंने यह भी कहा था कि ‘‘हम मोदी सरकार को दिखाएंगे कि अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाए।’’ लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदली। दूसरी तरफ भारत ने उन पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों को खुली बाहों से स्वीकार कर लिया है जो अपनी मातृभूमि में धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए भारत आ गए थे। अमेरिकी पैनल ने भारत के नागरिकता संशोधन कानून को लेकर चिंता व्यक्त की थी और मुस्लिमों पर बढ़ते हमलों का उल्लेख किया था लेकिन नागरिकता संशोधन कानून ऐसे लोगों को नागरिकता देने के लिए है जो अपने हैं और हमसे बिछुड़ गए थे। अगर भारत हिन्दुओं और सिखों को गले नहीं लगाएगा तो फिर कौन सा देश उन्हें गले लगाएगा। अमेरिकी पैनल भारत के कानून को समझ ही नहीं पाया।

आज की तारीफ में पाकिस्तान के हुकमरानों और तालिबान में कोई ज्यादा अंतर नहीं रह गया। कट्टरता किसी देश को दशकों पीछे धकेल देती है और इसे हम अफगानिस्तान और पाकिस्तान में देख रहे हैं। भारत ने अफगान शरणार्थियों को भी गले लगाया है। दुनिया को साफ समझ आ रहा है कि हिन्दुस्तान के लोग किसी को दुख में अकेले छोड़ नहीं पाते, हम तो दुश्मन की भी मदद के​ लिए तैयार हो जाते हैं। 

‘‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।’’

भारत में श​ताब्दियों से विभिन्न धर्मों के लोग आकर बस रहे हैं। उन्होंने यहां की संस्कृति को आत्मसात कर लिया है। पारसी समुदाय तो ऐसे घुलमिल गया जैसे पानी में नमक। भारत एक ऐसा देश है जहां अल्पसंख्यकों की स्थिति मुस्लिम देशों से कहीं बेहतर है। जहां हर किसी को अपनी बात रखने की आजादी है, जरा उस देश के बारे में सोचिये जहां तालिबान की हकूमत है। यह अफगानिस्तान के लोगों की आंखों की उदासी और किसी देश का दोजख बन जाना भर है। भारत कम से कम कट्टर समाज से तो अच्छा है जो धर्म के नाम पर अपने ही देश का नाश कर रहे हैं। पाकिस्तान इन्हीं देशों में से एक है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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