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संपादकीय

पाकिस्तान का फिर गिड़गिड़ाना

प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जहां पड़ौसी देशों के साथ मधुर व प्रगाढ़ सम्बन्धों की यात्रा पर मालदीव व श्रीलंका के दौरे पर हैं वहीं हमारे बेढब पड़ौसी पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री इमरान खान से यह चिट्ठी आने की खबर आयी है कि वह भारत से सभी विवाद शान्तिपूर्ण माहौल में हल करने के लिए काम करना चाहते हैं। इमरान खान क्रिकेट जगत की हस्ती रहे हैं और इस खेल की मार्फत अर्जित लोकप्रियता के सहारे उन्होंने अपने देश में राजनैतिक सीढि़यां चढ़ी हैं। अतः स्वाभाविक है कि उनका मिजाज खिलाडियों की तरह हर प्रतियोगिता में विजय प्राप्त करने का हो किन्तु बात जब दो पड़ौसी देशों के बीच पिछले सत्तर साल से चले आ रहे कड़वे रिश्तों की हो तो इस मिजाज में बदलाव इस तरह आना जरूरी है जिससे खेल के मैदान की हकीकत भी सामने आये।

 पिछले वर्ष पाकिस्तान राष्ट्रीय एसेम्बली के चुनावों में इमरान खान की ‘तहरीके इंसाफ’ पार्टी ने अपनी मुख्य प्रतिद्वन्दी पार्टी मुस्लिम लीग (एन) को यह नारा बुलन्द करते हुए शिकस्त दी थी कि ‘‘बल्ला घुमाओ-भारत हराओ।” जाहिर है कि अपने सियासी मुकद्दर को चमकाने के लिए ही इमरान खान ने यह नारा चुनावी मैदान में बुलन्द किया होगा। इससे साबित होता है कि वह ‘गुड़ तो खाना चाहते हैं मगर गुलगुलों से परहेज करते हैं।’  इमरान खान को सबसे पहले दिल से यह कबूल करना होगा कि भारत से दुश्मनी के आधार पर पाकिस्तान का वजूद नहीं टिका हुआ है।

 पाकिस्तान का निर्माण मजहब की बुनियाद पर जिस वजह से भारत के टुकड़े करके हुआ था उसका मकसद इस नये देश में रहने वाले सभी प्रकार के लोगों का विकास और उत्थान था न कि भारत के खिलाफ लगातार जंगी माहौल खड़ा करके दुश्मनी को पाले रखने का और भारत के खिलाफ विश्व की चुनीन्दा ताकतों के हाथ का खिलौना बने रहना का परन्तु 1956 तक इस देश में लोकतन्त्र को दफना कर जिस तरह फौजी हुकूमत को नाजिल किया गया उसने इस मुल्क को वहशियाना हरकतों के मंजर में बदल दिया। इसके निर्माण के बाद पाकिस्तान की लोकप्रिय सियासी पार्टियों में रिपब्लिकन पार्टी भी थी जो मुस्लिम लीग से थोड़ा आगे-पीछे होती रहती थी। एक बार फौजी बूटों के नीचे आ जाने के बाद इस मुल्क का एकमात्र लक्ष्य भारत विरोध के साथ ही ‘हिन्दू विरोध’ हो गया बल्कि हद यह हो गई कि यहां के फौजी हुक्मरानों ने भारत विरोध का पर्याय हिन्दू विरोध सुनिश्चित कर दिया। 

असल में  हालात तभी से बदलने शुरू हुए और इनके बदलते-बदलते वह मुकाम आ गया जब पाकिस्तानी हुक्मरानों ने दहशतगर्दी को भारत के खिलाफ एक कारगर हथियार बना दिया। यह मुल्क दहशतगर्दों की ऐशगाह और सैरगाह बनता चला गया और इस काम को अंजाम देने में यहां की फौज का किरदार अहम रहा। सवाल यह बिल्कुल नहीं है कि भारत फौज के पाकिस्तानी आला अफसरों के राब्ता कायम करे बल्कि सवाल यह है कि पाकिस्तान के आधे-अधूरे लोकतन्त्र के तहत चुनी हुई वहां की सरकार अपनी फौज की हदों को तय करे। असलियत  तो यह है कि पाकिस्तान की विदेश और रक्षा नीति  फौज के जनरल तय करते हैं और इस तरह करते हैं कि अपने ही वजीरे आजम के किये गये वादों और अहद के परखचे उड़ाने से भी गुरेज नहीं करते। यह हकीकत है कि पाकिस्तान भारत का ऐसा पड़ौसी है जिसकी हर चीज आज भी हिन्दोस्तानी है। 

संस्कृति से लेकर संगीत तक। इसके बावजूद यदि खलिश है तो इस मुल्क में पैदा की गई उन लानतों की वजह से है जो भारत विरोध को हर पाकिस्तानी का ईमान बनाकर पेश करने की जुगत में रहती हैं। जम्मू-कश्मीर मसले पर जिस तरह पाकिस्तान के सियासी रहनुमा अपनी फौज के लिखे नग्मों को तरन्नुम से गाते हैं उसकी असली वजह इसी फौज की रोजी-रोटी है। कश्मीर समस्या को हर हाल में बनाये रखने के लिए ही पाकिस्तान के फौजी हुक्मरान रहे मरहूम जनरल जिया-उल-हक ने दहशतगर्दी की नीति पर चलना शुरू किया था। 90 के दशक से पहले शुरू हुई नीति ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में खूनी खेल चला रखा है। अतः भारत के प्रधानमन्त्री के साथ विवादों का हल ढूंढने के लिए शान्तिपूर्ण वातावरण को तैयार करना पाकिस्तान का ही फर्ज बनता है। सवाल एक कदम की जगह दो कदम चलने का नहीं है बल्कि पहला कदम ही अमन-चैन और शान्ति के माहौल में उठाने का है। इसलिए भारत का यह जबाव पूरी तरह माकूल है कि बातचीत तभी हो सकती है जब दहशतगर्दी खत्म हो जाये।

 क्या यह बताने की जरूरत है कि जब 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर दहशतगर्दों ने हमला किया था तो तब भी पाक के विदेश मन्त्री के औहदे पर जनाब महमूद कुरैशी ही काबिज थे और संयोग से तब वह भारत की राजकीय यात्रा पर थे। उन्हें पुर-एहतजाज अन्दाज से हमारे तब के विदेश मन्त्री श्री प्रणव मुखर्जी ने इस्लामाबाद रवाना कर दिया था मगर कुरैशी साहब ने कबूल किया था कि यह काम उन्हीं के मुल्क के कुछ गैर सरकारी (नानस्टेट एक्टर) लोगों का था। अरसा बीता मगर पाकिस्तान की हरकतों में कोई फर्क नहीं आया। 

पिछले फरवरी महीने में ही उसने कश्मीर के पुलवामा में एक और वहशियाना हमला करके भारत के 40 जवानों को शहीद कर डाला। इसका जवाब भारत ने ‘बालाकोट हवाई कार्रवाई’ से दिया। यह सब तब हुआ जबकि वह रुआब गालिब कर रहा था कि उसके पास भी एटम बम है मगर क्या कभी पाकिस्तानी हुक्मरानों ने इस हकीकत पर गौर किया है कि सांझा संस्कृति की ताकत किसी भी शक्तिशाली से शक्तिशाली एटम बम से भी ज्यादा होती है। इसका गवाह तो खुद पाकिस्तान है जब उसका ही पूर्वी हिस्सा उससे अलग होकर स्वतन्त्र बांग्लादेश बन गया था और उसकी मदद करने के लिए बंगाल की खाड़ी में अमेरिकी सातवां एटमी जंगी जहाजी बेड़ा आ गया था।  इसलिए इमरान खान को सबसे पहले अपना घर ही ठीक करना होगा और जब वह पूरी तरह मुतमइन हो जायें तो भारत के सामने पेशकश करनी होगी।

            इन्हीं पत्थरों पे चलके गर आ सको तो आओ

            मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नहीं है !