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पाकिस्तान के ‘मरी’ में मरते लोग

पाकिस्तान के पर्यटक स्थल ‘मरी’ में केवल बर्फबारी देखने को उतावले 23 सैलानियों की जिन परिस्थितियों में मृत्यु हुई वह बहुत दर्दनाक घटना कही जायेगी क्योंकि इनमें कुछ बच्चे भी शामिल थे परन्तु इससे एक तथ्य का पता चलता है कि इस देश में किस कदर पिछड़ापन है कि आसमान से गिरती बर्फ के मंजर का नजारा करने के लिए ही लोग भारी संख्या में मरी की तरफ उमड़ पड़े और उन्होंने किसी भी जरूरी एहतियात बरतने की जरूरत नहीं समझी। विगत दो दिन पहले ही यह घटना इस देश की राजधानी इस्लामाबाद से केवल कुछ कि.मी. की दूरी पर ही बसे मरी पर्यटक स्थल में हुई है। यह स्थान एक तरफ से भैर पख्तूनवा प्रान्त की सीमाओं के बहुत करीब है और दूसरी तरफ पाकिस्तानी पंजाब प्रान्त में आता है। रावलपिंडी भी इससे बहुत अधिक दूर नहीं है। इससे इस हकीकत का अंदाजा लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान का आम शहरी किन मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों में अपना जीवन गुजारता है।

एक तरफ इसकी राजधानी इस्लामाबाद में किताबों की  दुकानें लगभग बन्द हो चुकी हैं और उनकी जगह ‘कबाब’ या अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की दुकानें खुल रही हैं जिसकी वजह से आम नागरिक को लगातार जाहिल बनाने की मुहीम छिड़ी हुई है वहीं दूसरी तरफ इस देश के हर प्रान्त में इस्लामी शिक्षा देने के मदरसों की बाढ़ आयी हुई है जिनमें से बच्चे जेहाद करने की शिक्षा लेकर निकलते हैं। किसी भी समाज में प्रकृति के सौन्दर्य को निहारने या उसके करिश्मों को देखने की चाहत होती है मगर यह चाहत कभी भी जिन्दगी की कीमत पर नहीं होती क्योंकि इंसान करिश्मों को निहारने तो अपनी जिन्दगी में खुशी और रौनक बिखेरने के लिए ही जाता है। जरा कल्पना कीजिये कि किसी पर्यटक स्थल पर एक लाख कारें एक ही दिन पहुंच जायें तो उसकी हालत क्या होगी?

भारत की आजादी के पहले से ही मरी पंजाब का खूबसूरत पर्यटक स्थल था। पाकिस्तान बनने के बाद इसकी विशिष्टता कायम रही और कभी ऐसी घटना नहीं हुई जब इस स्थान पर लोगों की अचानक बेतरतीब भीड़ इकट्ठा होने पर सभी स्थापित जन सुविधाएं दम तोड़ दें और बजाय पुलिस के सेना को आकर शहरियों को बचाना पड़े। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी बल्कि स्वयं लोगों द्वारा ही पैदा की गई आफत थी। इससे यह निष्कर्ष निकालने में किसी भी सामाजिक या राजनैतिक विज्ञानी को देर नहीं लगेगी कि आम लोगों को पाकिस्तान में वैज्ञानिक व तार्किक सोच से बाहर रखा जा रहा है और उन्हें जहालत में धकेला जा रहा है। जरा गौर कीजिये जिस देश में दहशतगर्द आज भी स्कूली बच्चों तक को अपना निशाना बनाते हों और विश्वविद्यालयों तक में छात्राओं की वेषभूषा से लेकर हंसने-बोलने के पैमाने तय कर दिये गये हों तो उनके नागरिकों की जहनियत क्या होगी? आजादी से पहले संयुक्त भारत का पंजाब प्रान्त ऐसा  क्षेत्र था जिसमें हिन्दू-मुसलमान की पहचान करना आसान काम नहीं होता था क्योंकि दोनों की जुबान एक और संस्कृति व रीति-रिवाज तक एक थे परन्तु पाकिस्तान बनने के बाद इसके हिस्से में आये पंजाब के लोगों की मादरी जुबान पंजाबी को ही हिकारत की नजर से देखा जाने लगा और इस राज्य के किसी भी स्कूल में प्राथमिक स्तर तक पर पंजाबी को पढ़ाने पर पाबन्दी लगा दी गई। पाकिस्तान के पंजाबियों ने अपनी मादरी जुबान को छोड़ कर उर्दू को अपनाया जो मूल रूप से हिन्दोस्तानी भाषा है।

मगर मुद्दा यह है कि मरी जैसी घटनाओं का किसी भी मुल्क के मुतल्लिक मतलब क्या होता है? इसका मतलब केवल एक ही निकलता है कि लोगों की मानसिकता को रूढ़ीवादी और दकियानूसी बनाया जा रहा है क्योंकि वे सर्दी के मौसम में किसी पहाड़ी स्थल पर बर्फबारी को किसी चमत्कार की तरह देख रहे हैं जबकि यह प्रकृति का साधारण नियम होता है। मगर बर्फबारी देखने के जुनून में लोग इस कदर उतावले थे कि मरी में भारी भीड़ जमा न करने के ऐलानों  का भी उन पर असर नहीं हुआ और उन्होंने मरी तक पहुंचने वाली सारी सड़कों को भी भर डाला लेकिन दीगर सवाल यह भी है कि इस स्थिति को किस प्रकार पाकिस्तान के प्रशासकों ने बनने दिया? इसका अर्थ यह निकलता है कि पाकिस्तान के हुक्मरान इतने बेपरवाह हैं कि वे एक पर्यटक स्थल तक की व्यवस्था को सुचारू नहीं रख सकते हैं।

मरी में कोई इस्लामी या धार्मिक जलसा तो नहीं हो रहा था जिसकी वजह से इस देश की सरकार लोगों की भीड़ पर पाबन्दी न लगाने का फैसला करती। मगर जिस देश के ‘स्यालकोट’ शहर में पिछले महीने एक श्रीलंकाई नागरिक का ईशनिन्दा के नाम पर सरेबाजार कत्ल कर दिया जाता हो और फिर उसके मृत शरीर को भरे चौराहे पर जला दिया जाता हो, उस देश की शहरी मानसिकता के स्तर को क्या कह सकते हैं?  मगर इसमें सारा दोष नागरिकों के मत्थे नहीं मढ़ा जा सकता क्योंकि पाकिस्तान बनने के बाद से ही यहां के नागरिकों को अपनी मिट्टी से नफरत करके बाहर से आने वाले आक्रान्ताओं को पूजने और उन्हें अपना ‘नायक’ मानने की शिक्षा दी जा रही है। भला कोई पूछे कि महमूद गजनवी और मोहम्मद गौरी या अहमदशाह अब्दाली का आम पाकिस्तानी से क्या लेना-देना है क्योंकि इन सभी ने भारत पर आक्रमण करके सबसे पहले पाकिस्तान स्थित प्रान्तों के लोगों को ही लूटा और यहां रहने वाली स्त्रियों को अपने सिपाहियों में ‘माले गनीमत’ कह कर बांटा। जबकि पाकिस्तान में ही मोहनजोदाड़ो व हड़प्पा की संस्कृति के अवशेष हैं और तक्षशिला विश्वविद्यालय के खंडहर इस इलाके की यशोगाथा का बयान कर रहे हैं। मगर ये स्थान वीरानी को अपना नसीब मान बैठे हैं। यही वजह है कि एक जरा सी बर्फबारी का दीदार करने के लिए लोग दिमागों पर ताला डाल कर इसका नजारा करने के लिए भागमभाग मचा देते हैं। इसलिए पाकिस्तान के इस्लामी हुक्मरानों ने आम नागरिक के दिमाग पर ताला लगाने की जो तरकीबें मजहब के नाम पर शुरू से ही लगाई हैं उन्हें परखा जाये। यह काम निश्चित रूप से लोगों को स्वयं ही करना होगा। 

आदित्य नारायण चोपड़ा

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