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निजी डाटा सुरक्षा विधेयक

भारत में अब तक कोई डाटा सुरक्षा कानून नहीं है। देशवासी डाटा सुरक्षा और व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए एक फ्रेमवर्क का इंतजार कर रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 43 ए है, जो सुनिश्चित करती है कि निजी संस्थाएं क्षतिपूर्ति और मुआवजे के लिए उत्तरदायी है। यद्यपि डाटा की परिभाषाएं उलझी हुई हैं और प्रावधान भी व्यापक नहीं है। कानून के अभाव में डिजिटल दुनिया में डाटा प्रवाह की जटिलताओं ने स्थितियों को काफी बदतर बना दिया है। निजी डाटा संरक्षण विधेयक 2019 में पेश किया गया था और तब से यह संसद की संयुक्त समिति के पास लम्बित है। उचित डाटा की सुरक्षा के लिए कानून की अनिवार्यता को समझा जा सकता है। 2010 में भारत में मुश्किल से 9 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता थे जो 2020 में 74 करोड़ से ज्यादा पंजीकृत इंटरनेट उपयोगकर्ता हो गए हैं। भारतीय सामाजिक जुड़ाव से लेकर सरकारी सेवाओं तक पहुंच बनाने और व्यवसाय करने तक के​ लिए ऐप का उपयोग करते हैं। अब सवाल यह है कि डाटा संरक्षण के लिए कौन सा दृष्टिकोण बेहतर है। अब तो लोग आॅनलाइन खरीदारी करते हैं। अगले पांच वर्षों में यह लेन-देन 1.5 अरब तक पहुंचने की उम्मीद है।

संसद की संयुक्त समिति ने निजी डाटा सुरक्षा विधेयक में बदलावों को लेकर सुुझाव दिए हैं, जिसे स्वीकार कर लिया गया है। संयुक्त संसदीय समिति ने विधेयक में सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को पब्लिशर्स के रूप में मानने के साथ-साथ डाटा की निगरानी और जांच के अधिकार को दायरे में लाने की सिफारिश की है। दो वर्ष तक चली चर्चा के बाद व्यक्तिगत डाटा संरक्षण विधेयक के दायरे को बढ़ाने के लिए संसदीय समिति ने अपने सुझावों में गैर-व्यक्तिगत डाटा और इलैक्ट्रानिक हार्डवेयर द्वारा जुटाए जाने वाले डाटा को भी अधिकार क्षेत्र में शामिल किया गया है। समिति के सुझावों में उस प्रावधान को बरकरार रखा गया है जो सरकार को अपनी जांच एजैंसियों को इस प्रस्तावित कानून के दायरे में मुक्त रखने का अधिकार देता है। संसदीय समिति का कहना है कि इस विधेयक को लेकर 93 सिफारिशें की गई हैं आैर इसमें सरकार के कामकाज और लोगों की निजता की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने का पूरा प्रयास किया गया है। 31 सदस्यीय समिति में से कांग्रेस के चार सांसदों, तृणमूल कांग्रेस के दो और बीजू जनता दल के एक सांसद ने विधेयक की कुछ सिफारिशों को लेकर अपना असहमति नोट दिया है। कांग्रेस के जयराम रमेश, मनीष तिवारी ने विस्तृत असहमति नोट जमा किया है। असहमति नोट संसदीय लोकतंत्र की सबसे अच्छी भावना है। निजी डाटा सुरक्षा विधेयक के अनुसार केन्द्र सरकार राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा, राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था और देश की संप्रभुता एवं अखंडता की रक्षा के लिए अपनी एजैंसियों को इस प्रस्तावित कानून के प्रावधानों में छूट दे सकती है। 

विपक्षी सदस्यों ने मुख्य रूप से इसे लेकर विरोध व्यक्त किया है। इनका कहना है कि केन्द्र सरकार अपनी एजैंसियों को कानून के दायरे से छूट देने के लिए बेहिसाब ताकत दी जा रही है। इस ताकत का दुरुपयोग हो सकता है। कुछ विपक्षी सांसदों ने यह भी कहा है कि सरकार को अपनी एजैंसियों को छूट देने के लिए संसदीय मंजूरी लेनी चाहिए ताकि जवाबदेही तय की जा सके। तृणमूल कांग्रेस सांसदों द्वारा भी असहमति नोट दिया गया है, उसमें कहा गया है कि यह विधेयक स्वभाव से ही नुक्सान पहुंचाने वाला है। समिति ने संबंधित पक्षों को विचार-विमर्श के लिए पर्याप्त अवसर ही नहीं दिया। इन सांसदों का कहना है कि इसमें निजता के अधिकार की सुरक्षा सुनिश्चित करने के ठोस उपाय है ही नहीं। समिति की अनुशंसाओं में यह महत्वपूर्ण है कि सोशल मीडिया के बिचौलियों को फिर से डिजाइन करके ​पब्लिशर्स माना जाए ताकि पब्लिश होने वाली सामग्री की पूरी जवाबदेही तय हो सके। सोशल मीडिया पर पोस्ट या पब्लिश होने वाले हर कंटेट की निगरानी और नियमों के लिए भी एक प्राधिकरण बनाए जाने का सुझाव दिया गया है। सहमति और असहमतियों के बीच इस विधेयक के कानून बन जाने पर देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था पर काफी असर पड़ने वाला है। डाटा सुरक्षा को लेकर अन्तर्राष्ट्रीय मानक भी तय होंगे।

दरअसल वर्ष 2017 में एक मजबूत डाटा संरक्षण कानून की जरूरत तब महसूस की गई थी जब सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी (सेनानिवृत्त) बनाम भारतीय संघ बाद में निजता के अधिकार को भौतिक अधिकार के रूप में स्थापित किया। अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने एक डाटा संरक्षण कानून बनाने का आह्वान किया था जो उपयोगकर्ताओं के​ निजी डाटा की गोपनीयता को प्रभावी ढंग से सुरक्षित कर सके। नि​जी डाटा सुरक्षा कानून के तहत संस्थाओं को व्यक्तिगत डाटा की सुरक्षा के लिए उपायों को अपनाना होगा, साथ ही डाटा सुरक्षा दायित्वों और पारदर्शिता तथा जवाबदेही संबंधी नियमों का पालन करना होगा। आशंका यह भी होगी कि कहीं सरकारी एजैंसियां बड़ी मात्रा में व्यक्तिगत डाटा एकत्ररण में लिप्त न हो जाए। अब संसद में ​विधेयक लाया जाएगा तो मंथन होगा। देखना होगा कि विधेयक क्या अंतिम रूप लेता है। देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए डाटा संरक्षण बहुत जरूरी है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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