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संपादकीय

कर्नाटक में सियासत का खेल!

कर्नाटक के राजनैतिक रंगमंच पर खेले जा रहे नाटक का चरमोत्कर्ष (क्लाइमेक्स) दृश्य का पर्दा अब कभी भी खुल सकता है और मुख्यमन्त्री एच.डी. कुमारस्वामी को सत्ता के सिंहासन को छोड़कर सामान्य विधायक की भूमिका में आना पड़ सकता है। दरअसल कुमारस्वामी की पार्टी जनता दल (सैकुलर) और कांग्रेस को जोड़कर जो रेलगाड़ी शासन चलाने के लिए पिछले साल मई महीने में तैयार की गई थी उसमें ‘गार्ड’ का डिब्बा आगे और ‘इंजन’ पीछे लगा हुआ था। 37 विधायकों वाली जद (सै.) के नेता कुमारस्वामी 80 विधायकों वाली कांग्रेस पार्टी के डिब्बों को खींच रहे थे जिसकी वजह से इस रेलगाड़ी के पटरी से उतरने का खतरा लगातार बना हुआ था। बेशक भारत के विभिन्न राज्यों में साझा या गठबन्धन सरकारों का सफलतापूर्वक पूरे पांच वर्ष तक चलने का इतिहास भी रहा है मगर वे ऐसी रेलगाड़ी बनकर पटरी पर दौड़ती रही हैं जिसमें हर तरीके से सन्तुलन कायम रखा गया हो। 

इसके उदाहरण केरल व प. बंगाल जैसे वामपंथी गठबन्धनों के राज्य तो रहे ही हैं परन्तु बिहार जैसा उत्तर भारत का राज्य भी रहा है जहां दो वर्ष छोड़कर 2005 से जनता दल (यू) व भाजपा की गठबन्धन सरकार चलती रही है। सफल साझा सरकारों के इंजन हमेशा उस राज्य की प्रभावशाली पार्टी ही रही है परन्तु पिछले वर्ष हुए चुनावों के बाद कर्नाटक में इंजन को पीछे लगाकर रेलगाड़ी को ही उल्टा जोड़ दिया गया अतः इसके पटरी से उतरने का खतरा तो अन्तर्निहित था। जिस तरह कांग्रेस पार्टी के विधायकों में सत्ता में भागीदारी से बेदखल रहने को लेकर असन्तोष पनपा वह अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता क्योंकि राजनीति का जिस गति से वाणिज्यिकरण हुआ है उसने चुने हुए जनप्रतिनिधियों के चरित्र को ही बदल कर रख दिया है। ‘जन सेवा’ का स्थान ‘धन सेवा’ ने ले लिया है। 

चुनाव जीतकर केवल विधायक बनने की पदवी से अब विधायकों को सन्तोष नहीं होता है और उनकी इच्छाओं की पूर्ति तभी होती है जब वे मन्त्री पद की ‘पदवी’ से नवाजे जाते हैं। अतः अवसरवाद आज की राजनीति का शिष्टाचार बन चुका है लेकिन इसकी जिम्मेदार खुद राजनैतिक पार्टियां ही हैं क्योंकि अपने चुनावी प्रत्याशियों का चयन करने में स्वयं उन्होंने ही सारे स्थापित मानदंडों को तोड़ डाला है अतः जैसा ‘पेड़’ लगाया जायेगा ‘फल’ भी वैसा ही प्राप्त होगा। कांग्रेस के जो विधायक आज विधानसभा से इस्तीफा दे रहे हैं वे जानते हैं कि उनके इस कार्य से कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में आ जायेगी मगर चुने हुए सदन की शक्ति कम करके बहुमत पाने का तरीका किसने ईजाद किया था? इसे खुद कांग्रेस पार्टी ने ही खोजा था। पहली बार इसका इस्तेमाल गोवा में 1999 में हुआ था जब इस पार्टी के नेता स्व. प्रियरंजन दासमुंशी ने अपनी पार्टी की सरकार बचाने के लिए दो विपक्षी विधायकों के इस्तीफे करा दिये थे।

‘दल-बदल’ कानून को झटका देने का यह ऐसा औजार साबित हुआ कि बाद में इसका उपयोग अन्य राज्यों में भी हुआ और गोवा में तो पिछले साल भी हुआ। जाहिर है कि यह तकनीक बाद में और परिष्कृत हुई होगी और सभी राजनैतिक पार्टियों ने इसमें अपना- अपना योगदान भी किया होगा। इसलिए राजनीति में इसे ‘ब्राह्मास्त्र’ की तरह प्रयोग किये जाने की परंपरा भी शुरू हो गई। जाहिर है कि चुने हुए विधायक अपने रुतबे की भरपाई की कीमत पर ही यह जोखिम उठाते हैं। धन सेवा बनी राजनीति का विकल्प भी इस भरपाई के अलावा दूसरा क्या हो सकता है? अतः इस्तीफा देने वाले विधायकों को मनाने के लिए कांग्रेस पार्टी की तरफ से भी ऐसे ही विकल्प प्रस्तुत किये जा रहे हैं और पेशकश की जा रही है कि विद्रोही विधायकों को मन्त्री बनाने के दरवाजे खुले हुए हैं। 

कुमारस्वामी मन्त्रिमंडल के सारे मन्त्री इस्तीफा लिये खड़े हैं कि किसी तरह विद्रोही विधायकों को इस्तीफा देने से रोका जाये मगर क्या ये विधायक अब मान सकते हैं ? 223 सदस्यीय विधानसभा (एक सदस्य की मृत्यु की वजह से स्थान रिक्त है) के 14 विधायक विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफा सौंपकर राज्यपाल से भी मुलाकात करके अपने फैसले की लिखित जानकारी देकर मुम्बई के पांच सितारा होटल में रहने के लिए चले गये। इसके साथ ही कुमारस्वामी सरकार में मन्त्री बने एक निर्दलीय विधायक ने भी अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंपकर कह दिया कि वह सरकार से अपना  समर्थन वापस लेते हैं और दूसरे भाजपा विकल्प के पक्ष में हैं। तस्वीर शीशे की तरह साफ है मगर मुख्यमन्त्री कुमारस्वामी अब भी कांग्रेस के साथ मिलकर उम्मीद पाले बैठे हैं कि ‘आइना’ ही चटख जायेगा और सभी 14 विधायक उनकी सरकार में मन्त्री बनने के लालच में अपना इस्तीफा इसलिए वापस ले लेंगे कि उनको अभी तक विधानसभा अध्यक्ष ने स्वीकार नहीं किया है। 

इसके लिए कांग्रेस ने मन्त्रिमंडल में शामिल अपने सभी मन्त्रियों का इस्तीफा भी ले लिया है जिससे कुमारस्वामी सरकार का पुनः नये सिरे से पुनर्गठन हो सके! क्या-क्या रंग बिखेरे जा रहे हैं ‘फिजां’ में कि ‘खुशबुओं’ की बहार फिर से आ जाये। इतने चेहरे बदले जा रहे हैं कि ‘आइना’ खुद ही शरमा कर टूट जाये! मगर क्या गजब की तबीयत पाई है जनाब कुमारस्वामी ने कि पूरा चमन खिजां तब्दील होते देखकर भी ‘बहार’ की उम्मीद लगाये बैठे हैं और सोच रहे हैं कि उनकी गद्दी सलामत रहेगी।

लोकतन्त्र में सत्ता का ‘सरूर’ सलीके से ‘सुर्ख-रू’ तभी होता है जब सलीके से उसे निभाया जाये। नजीरें ऐसी भी हैं कि कुमारस्वामी को ‘स्वामी’ बना डालतीं। एक नजीर उत्तर प्रदेश की है। 1967 में राज्य में संविद सरकार के मुखिया स्व. चौधरी चरण सिंह थेे। डेढ़ साल बाद उनकी गठबन्धन सरकार से एक सहयोगी दल ने समर्थन वापसी की घोषणा तब की जब वह पूर्वी उत्तर प्रदेश के दौरे पर थे। वहीं उन्हें रेडियो पर आई उस खबर के बारे में बताया गया। चौधरी साहब जिस सरकारी मोटर में थे उसे उन्होंने वहीं छोड़ दिया। एक निजी कार का इन्तजाम किया और अपना इस्तीफा देने लखनऊ राजभवन पहुंच गये।

कुमारस्वामी के तो 14 समर्थक विधायकों ने अध्यक्ष के दफ्तर में अपने इस्तीफे दाखिल कर रखे हैं। उन्हें मालूम है कि उनका बहुमत समाप्त हो गया है फिर भी ‘जिद’ है कि ‘रुसवाई’ के ‘मयखाने’ में ‘मदहोश’ होकर ही ‘मैकशी’ की कसम खायेंगे। क्या कमाल की सियासत है कर्नाटक की ? मगर इसमें गलती किसी की नहीं है क्योंकि जो चलन चला है वह तो अपना रंग दिखायेगा ही! इसलिए लोकसभा में आज इस मामले में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी के ‘गमगुसारी’ करने का खास मतलब इसलिए नहीं है कि खुद उनकी पार्टी के ही विधायक किश्ती में पानी भर रहे हैं और उसके डूबने के इन्तजार में पलकें बिछाये बैठे हैं। विधायकों की हालत तो यह है कि
पीनस में गुजरते हैं कूंचे से जब वो मेरे 
कन्धा भी ‘कहारों’ को बदलने नहीं देते !