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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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राजस्थान में सियासी तूफान!

आगामी 19 जून को होने वाले राज्यसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में जो राजनैतिक तोड़फोड़ और उठापटक हो रही है उसे किसी भी रूप में स्वस्थ लोकतन्त्र के लिए उचित नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह सारी कवायद जनता द्वारा चुने गये विधायकों को किसी बाजार में  रखा हुआ ​‘बिकाऊ माल’ बनाती है, लोकतन्त्र में राजनैतिक दलों में सैद्धान्तिक मुद्दों पर मतभेद होना कोई गलत बात नहीं होती। पूर्व में इसी प्रक्रिया के चलते भारत में राजनैतिक विविधता सकारात्मक रूप से फैली है। यदि एेसा न होता तो  जनसंघ-भाजपा, कम्युनिस्ट व हिन्दू महासभा को छोड़ कर भारत के स्वतन्त्र होने के बाद राजनैतिक दलों की संख्या इतनी न होती। इन तीनों पार्टियों के अलावा जितनी भी अन्य पार्टियां हैं वे कमोबेश कांग्रेस पार्टी से ही निकली हैं, सैद्धान्तिक मतभेदों के चलते ही पचास के दशक में कांग्रेस से बाहर हुई समाजवादी पार्टी के नेताओं डा. राम मनोहर लोहिया और आचार्य नरेन्द्र देव के बीच सैद्धान्तिक मतभेद होने की वजह से ही इसके दो भाग संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी व प्रजा समाजवादी पार्टी में हुए।

 सैद्धान्तिक मतभेद के चलते ही 1972 में भारतीय जनसंघ के उस समय तक पुरोधा और स्तम्भ समझे जाने वाले स्व. प्रोफेसर बलराज मधोक ने अपनी अलग ‘राष्ट्रीय जनसंघ’ पार्टी बनाई थी (जो चल नहीं सकी) ये सब सैद्धान्तिकवादी लोग थे जिनके लिए निजी लाभ या स्वार्थ किसी महापाप से कम नहीं था, वे राजनीति में कुछ विशिष्ट सिद्धान्तों को समर्पित थे और उसके लिए अपनी पार्टी के नेतृत्व को चुनौती देने से भी नहीं चूकते थे। यही कमाल 1969 में स्व. इदिरा गांधी ने किया था जब अपनी पार्टी कांग्रेस को उन्होंने दो भागों में बांटने का साहस केवल इसलिए दिखाया था क्योंकि वह लोकोन्मुख समाजवादी नीतियों को प्रधानमन्त्री रहते हुए लागू करना चाहती थीं और उनकी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इसमें रोड़े अटका रहा था। सैद्धान्तिक मतभेद होना लोकतन्त्र की जीवन्तता की निशानी होती है, यह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण होता है कि पार्टी के नेताओं के लिए सर्वप्रथम लोकहित है क्योंकि वे मानते हैं कि उनके सिद्धान्तों को लागू करके देश व जनता का हित बेहतर तरीके से किया जा सकता है, परन्तु 80 के दशक में भारत की राजनीति में जिस तरह दोतरफा हमला साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और जातिगत गोलबन्दी का हुआ उसने समूची राजनीति को व्यापारिक घराने में बदल डाला और इसमें शरीक लोग अपनी-अपनी ‘वाणिज्यिक फर्में’ बनाने लगे जिसमें सिद्धान्त की जगह ‘मुनाफे’ ने ले ली। अभी यह दौर खत्म नहीं हुआ है बल्कि इस प्रकार स्थायी भाव में आ गया है कि राजनीति मुनाफा या धनतन्त्र में तब्दील हो चुकी है। इस राजनीति की मुद्रा या करेंसी केवल धन ही हो सकती थी और इसी के विभिन्न स्वरूप आज हमारे सामने भेष बदल-बदल कर पेश हो रहे हैं। हम जिसे बहुरंगी राजनीति समझ रहे हैं असल में उसका रंग केवल रोकड़ा के ही रंग मे रंगा हुआ है जो चुनावी मैदान से लेकर विधानसभाओं के भीतर पहुंच चुका है। अतः मध्य प्रदेश हो या गुजरात अथवा राजस्थान, हमें जो तोड़फोड़ या राजनैतिक उठापटक दिखाई पड़ रही है उसके पीछे कोई सिद्धान्त न होकर स्वार्थ और निजी हित है, यह निजी लाभ राजनैतिक पार्टियों की संस्कृति में शामिल हो चुका है  इसी वजह से ये अधिसंख्य राजनैतिक दल ‘कदीमी परचून की दुकानें’ बन चुके हैं। ऐसे माहौल में राजनैतिक पार्टियां उन लोगों के सहारे चल रही हैं जो निजी लाभ के फेर में चुनावों मंे इनका टिकट पाकर अपनी हैसियत में इजाफा करते हैं और राजनैतिक लाभ की पार्टियों की जंग में जहां इन्हें अच्छा भाव मिलता है उसी तरफ खिसक लेते हैं।

मध्य प्रदेश में हमने इसका नंगा नाच इस तरह देखा कि 22 विधायकों ने अपनी पार्टी कांग्रेस से ही इस्तीफा देकर कमलनाथ सरकार गिरा दी। इन विधायकों को जनमत का डर इसलिए नहीं था क्योंकि उन्हें अपने ‘धनतन्त्र’ पर ज्यादा यकीन है, गुजरात में केवल राज्यसभा की एक सीट की खातिर अभी तक सात कांग्रेसी विधायक इस्तीफा दे चुके हैं। इस राज्य से चार राज्यसभा सदस्य चुने जाने हैं और इन विधायकों के इस्तीफे की वजह से विपक्षी पार्टी केवल एक ही सांसद चुन कर भेज सकेगी जबकि सत्तारूढ़ भाजपा के तीन सांसद थोड़ी हील-हुज्जत के साथ चुने जा सकेंगे मगर राजस्थान में स्थिति  उल्टी है, यहां कांग्रेस की गहलौत सरकार सत्ता में है और 200 सदस्यीय विधानसभा मेंे इसके 107 विधायक हैं और इसे 18 अन्य निर्दलीय आदि सदस्यों का समर्थन प्राप्त है। जबकि भाजपा के 77 विधायक हैं। यहां से तीन राज्यसभा सदस्य चुने जाने हैं। एक प्रत्याशी को विजयी होने के लिए 51 प्रथम वरियता वोट चाहिएं। कांग्रेस  के दो सदस्य आसानी से जीत सकते हैं मगर यहां भी एक तीर से दो निशाने की चाल विपक्षी भाजपा ने चल डाली है। कुछ कांग्रेसी विधायक अगर यहां भी इस्तीफा देने को राजी हो जायें तो सरकार भी गई और दो राज्यसभा सीटें भी हाथ आईं इसीलिए कांग्रेस पार्टी अपने ही शासित राज्य में अपने विधायकों को एकजुट रखने की गरज से पर्यटन स्थल पर ले गई है जिससे उन्हें कोई तोड़ न सके मगर क्या यही लोकतन्त्र है जिसे हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र कहते हैं!

दीगर सवाल यह है कि कांग्रेस को अपने ही विधायकों पर भरोसा क्यों नहीं है और भाजपा को उन्हें तोड़नेे का किस वजह से यकीन है? इसका उत्तर भी आज की सिद्धान्तविहीन, धन मूलक और मुनाफे की राजनीति में छिपा हुआ है। विधायक ऐसा सिक्का हो गया है कि जिसकी जेब में होगा वही उसे चला लेगा? लेकिन एक बहुत गंभीर सवाल यह है कि किसी भी राज्यसभा सदस्य की योग्यता कुछ विधायकों का इस्तीफा नहीं हो सकती क्योंकि विधायक ही उसका चुनाव करते हैं। अतः अब समय आ गया है कि इन चुनावों में भी अचार संहिता लागू की जाये। चुनाव आयोग को संज्ञान लेना होगा और चुनाव घोषित होने के बाद मतदान के दिन तक विधानसभा के संख्या बल के कम होने पर प्रतिबन्ध लगाना होगा, वरना यह परिपाटी हमारी विधानसभाओं को ‘आरजी सरकारों’ का गठन करने लायक ही छोड़ेगी, चुनावों में दिये गये जनमत की महता स्वतः समाप्त हो जायेगी। 

                                             

आदित्य नारायण चोपड़ा

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