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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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मजदूरों पर सियासत और सुप्रीम कोर्ट

कोरोना काल में मेहनतकश मजदूर सबसे ज्यादा पीड़ा और संकट के दौर से गुजर रहे हैं। काम की तलाश में मजदूरों के शहरों में आने से गांव उजड़े थे और अब मजदूरों के गांवों के लौटने से शहर मजदूर विहीन हो रहे हैं। कोरोना के वायरस ने असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोगों को गरीबी में धकेल दिया है। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो सिर्फ अप्रैल माह में ही बेरोजगारी दर में 14.8 फीसदी का इजाफा हुआ है और लगभग 12 करोड़ से ज्यादा लोगों को नौकरी गंवानी पड़ी है। शहरों में फंसे अधिकांश मजदूरों को उनके नियोक्ता द्वारा कोई धनराशि नहीं दी गई, कुछ दिन का राशन जरूर मिला लेकिन वह भी खत्म हो गया। उनके सामने एक ही विकल्प बना कि वे सैकड़ों किलोमीटर अपने गांवों तक पहुंचने के लिए पैदल ही चल पड़े। देखते ही देखते भारत श्रमिकों के सबसे बड़े विस्थापन का गवाह बन गया। न तो राज्य सरकारों और न ही गांवों में इतनी ताकत है कि वह वापिस आए मजदूरों का पेट पाल सकें। प्रवासी मजदूरों को रोटी के लाले पड़े हैं। घरों को लौटने के लिए  हजारों की भीड़ रेलवे स्टेशन पर विशेष श्रमिक ट्रेनें पकड़ने के लिए इकट्ठे हो जाते हैं, बदइंतजामी का आलम यह है कि ट्रेनें रद्द कर दी जाती हैं और मजदूर नौतपा के दौरान चिलचिलाती धूप में दिन भर खड़े होकर शाम के वक्त वहीं सो जाता है और नई सुबह फिर उम्मीद लेकर पंक्ति में खड़ा हो जाता है। घरों को लौटने की जल्दी में सोशल डिस्टेंसिंग कौन बनाएगा! मजदूर अपने ही देश में शरणार्थी हो गए हैं लेकिन उसने राजनीतिज्ञों की रोजी का इंतजाम बांध दिया है। ​प्रवासी मजदूरों को लेकर दिल्ली से शुरू हुई सियासत के तार मुम्बई, लखनऊ और पटना से जुड़ गए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि घरों को लौटने वाले मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार की राज्य सरकारों के लिए चुनौती बन गए हैं। प्रवासी मजदूर अब एक वोट बैंक बन गए हैं। यह वोट बैंक किसे नुक्सान पहुंचाएगा, किसे फायदा पहुंचाएगा, इसका पता तो चुनावों में ही चलेगा। मजदूरों के मामले पर तीखी बयानबाजी शुरू हो चुकी है। 

बिहार में तो विधानसभा चुनावों की तारीख तेजी से नजदीक आ रही है। लाखों लोगों को रोजगार देना कोई सरल काम नहीं है।

मजदूरों को लेकर शुरू हुई सियासत के बीच सुप्रीम कोर्ट ने देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे प्रवासी मजदूरों की परेशानियों को लेकर स्वतः संज्ञान लेते हुए केन्द्र, राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों से जवाब तलब किया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि मजदूरों के मामले में केन्द्र और राज्य सरकारों से गलती हुई है। अब केन्द्र आैर राज्य सरकारों को मिलकर प्रवासी मजदूरों की यात्रा, उनके भोजन की व्यवस्था के लिए कदम उठाने चाहिएं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि मजदूरों की यात्रा, ठहरने और खाने-पीने की सेवाएं मुफ्त होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रवासी मजदूरों के मामले में स्वतः संज्ञान लेने को विधि विशेषज्ञों ने राहत भरा कदम माना है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट को यह कदम बहुत पहले उठा लेना चाहिए था। दरअसल कोरोना काल में मची अफरातफरी में व्यवस्थाएं भंग हो चुकी हैं और ऐसा लगता है कि राज्य सरकारों ने भी मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। मजदूर भूखे-प्यासे रहने को मजबूर हैं।

सवाल यह भी उठ रहा है कि लॉकडाउन के बावजूद न्यायपालिका, खास तौर पर सुप्रीम कोर्ट, सरकारी विभाग आंशिक रूप से सक्रिय रह सकते हैं तो संसद क्यों नहीं। ऐसे स्वर भी उठ रहे हैं कि संसद का वर्चुअल सेशन बुलाया जाना चाहिए। इस सेशन में सबकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। अगर ब्रिटेन की संसद वर्चुअल सेशन बुला सकती है तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में ऐसा क्यों नहीं हो सकता। 15 करोड़ किसानों और 12 करोड़ प्रवासी मजदूरों की तकलीफों और चीत्कार संसद में नहीं गूंजनी चाहिए।

दरअसल मजदूरों का लगभग सभी राजनीतिक दलों और नेताओं पर से भरोसा उठ चुका है। लाचार मजदूरों के सामने लगभग सभी विकल्प खत्म हो चुके हैं। किसी ने कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। हजारों किलोमीटर का रास्ता तय करते मजदूरों के साथ पुलिस का जो बर्ताव दिखा, उसने लोगों को भीतर से तोड़ दिया है। अब वे वापिसी के त्रासद हालात में झोंक दिए गए हैं। मजदूरों का आक्रोशित होना स्वाभाविक है। एक तरफ पूरा देश अपने पिता को 1250 किलोमीटर तक साइकिल पर ले जाने वाली ज्योति की तारीफ कर रहा है। ज्योति की जीवनता के सफर के पीछे भी दर्द था। बेहतर यही होगा कि इस समय मजदूरों पर सियासत छोड़ उनकी इज्जत से घर वापिसी सुनिश्चित की जाए। सरकारों को यह काम बड़े सलीके से करना होगा ताकि उन्हें महसूस हो कि वे भी इंसान हैं, पशु नहीं हैं। 

आदित्य नारायण चोपड़ा

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