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प्रवासी भारतीयों की ताकत

दुनियाभर में प्रवासी भारतीयों की संख्या 1.75 करोड़ के लगभग है। प्रवासियों की संख्या के मामले में भारत, मैक्सिको और चीन पहले, दूसरे और तीसरे नम्बर पर हैं। पिछले दस वर्षों में भारतीय प्रवासियों की संख्या में लगभग 23 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। प्रवासियों की कुल संख्या वर्तमान आबादी का 3.5 फीसदी है। नौकरी, उद्योग, व्यापार और दूसरे कई कारणों से अपना देश छोड़कर दूसरे देशों में रहने वालों में भारतीयों की आबादी दुनिया में सर्वाधिक है। दुनिया की बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में मुख्य कार्यकारी अधिकारी से लेकर अनेक देशों में कानून एवं अर्थव्यवस्था में निर्णय लेने वाली संस्थाओं का प्रमुख हिस्सा बनने में भारतीय बहुत सफल हुए हैं। 

अमेरिका, ​ब्रिटेन, कनाडा और कई अन्य देशों में भारतीय वहां की सरकारों में मंत्री और सांसद तो निर्वाचित हुए ही हैं बल्कि नीति निर्धारक विभागों में उच्च पदों पर आसीन हैं। भारतीयों की खासियत है कि वे जिस भी देश में गए उन्होंने वहां की संस्कृति और संविधान काे आत्मसात कर लिया। वहां के व्यापार, उद्योग, चिकित्सा क्षेत्र आदि में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भले ही प्रवासी भारतीयों ने वहां का सब कुछ आत्मसात कर लिया है लेकिन वह भारत माता की माटी की सुगन्ध को नहीं भूले। वे आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। अपनी जन्मभूमि, अपने गांव और अपने शहरों के ​लिए उनके दिल में स्नेह उमड़ता है।  आज की तारीख में भारतीय नई शक्ति के तौर पर अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर उभर चुके हैं और अलग-अलग देशों में भारत के रिश्तों को लेकर उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो चुकी है।

विश्व बैंक की रिपोर्ट में बताया गया है कि पूरी दुनिया में सबसे अधिक पैसा भारतीयों ने अपने देश भेजा है। रिपोर्ट बताती है कि प्रवासी भारतीयों ने अपने देश के लिए 87 अरब डालर भेजे जो लगभग 64.64 खरब रुपए के बराबर हैं। विदेशों से पैसे भेजने के मामले में भारतीय पहले नम्बर पर हैं। प्रवासी भारतीयों द्वारा इस साल भारत पैसा भेजने में 4.6 फीसदी की बढ़ौतरी हुई है। कोरोना महामारी के दौरान केसों और मौतों की गम्भीरता को देखते हुए परोपकारी कार्य करने के लिए प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजे गए धन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजे गए पैसों में आक्सीजन टैंक की खरीद के लिए भेजी गई राशि शामिल है। कोरोना काल में प्रवासी भारतीयों ने देश को काफी सहयोग दिया। जितना धन भारत भेजा गया है, उसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। प्रवासी भारतीयों को अपनी सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्य बनाए रखने के कारण ही साझा पहचान मिली है। उनकी सफलता का श्रेय उनकी परम्परागत सोच, सांस्कृतिक मूल्य, शैक्षणिक योग्यता को दिया जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर सूचना तकनीक के क्षेत्र में क्रांति में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसके कारण भारत की विदेशों में छवि निखरी है। प्रवासी भारतीयों की ताकत को देखते हुए और उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ने के​ लिए 2002 में एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने हर वर्ष 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस मनाने का निर्णय किया था। प्रवासी भारतीयाें का देश की जीडीपी में योगदान बढ़ रहा है। कारगिल युद्ध हो या ओडिशा के चक्रवात, महाराष्ट्र और गुजरात के भूकम्प के समय इनके द्वारा आर्थिक और मेडिकल सहयोग दिया गया था। 1990 के आर्थिक संकट के दौरान भी भारतीयों ने रिसर्जेंट इंडिया बांडों जैसे अनेक प्रकार के बांडों द्वारा अपने आर्थिक संसाधनों से भारत की आर्थिक मदद की थी।

आज भी प्रवासी भारतीय अपने गांवों में लौटते हैं तो कुछ न कुछ देकर ही जाते हैं। प्रवासी भारतीयों ने अपनी पुश्तैनी जमीनें दान में देकर शिक्षा संस्थान और कम्प्यूटर केन्द्र स्थापित किए हैं। अनेक प्रवासी भारतीयों ने गांवों में स्कूल और सामुदायिक भवन बनाए हैं। केन्द्र सरकार ने प्रवासी भारतीयों को अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानते हुए इनकी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए अनेक नीतियां बनाई हैं। प्रवासी भारतीय ही विश्व के समक्ष हमारा चेहरा हैं और ​वैश्विक मंच पर भारत के हितों के हिमायती। भारत इसकी संस्कृति और परम्पराओं के प्रति इनके निरंतर भावनात्मक जुड़ाव के कारण हमें उन पर गर्व है। एक तरफ विकसित देशों में प्रवासी भारतीयों की भूमिका सराही जा रही है तो दूसरी तरफ कम कुशल और कम शिक्षित प्रवासी कामकगार भी खाड़ी देशों सहित कई देशों के विकास के सहभागी बन गए हैं। खाड़ी देशाें में अकुशल और मामूली शिक्षित प्रवासी भारतीय श्रमिकों ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी क्षमता को साबित किया है। आज दु​निया को भारत पर भरोसा है तो इसमें प्रवासी भारतीयों का बड़ा योगदान है। प्रवासी भारतीरयाें ने अपनी पहचान को मजबूत किया है। कठिन समय में भी उन्होंने सेवाभाव बनाए रखा है। भारत को प्रवासी भारतीयों की शक्ति पर गर्व है।


आदित्य नारायण चोपड़ा

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