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दागी माननीयों पर शिकंजे की तैयारी!

देश की चुनावी व्यवस्था में सुधार होते रहे हैं लेकिन अब समय आ गया है कि ठोस कदम उठाए जाएं। राजनीति धन-बल और बाहुबल पर्याय हो चुकी है। पहले राजनीतिज्ञ अपराधियों का इस्तेमाल अपने लिए करते थे लेकिन फिर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग सियासत में उतर आए। संविधान निर्माताओं ने कल्पना की थी। धीरे-धीरे जब व्यवस्थाएं आधुनिक होंगी और मूल्य अपनी जड़ें जमा लेंगे तो धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के सवाल प्रभावी नहीं रहेंगे। उन्होंने राजनीति के अपराधीकरण की कल्पना भी नहीं की थी। 2004 में भारतीय संसद में 24 प्रतिशत सांसद दागी थे, 15वीं संसद में यह संख्या बढ़कर 30 फीसदी हो गई और मौजूदा 16वीं लोकसभा में कुछ 186 सांसद दागी हैं। इस तरह से देश की विधानसभाओं में 31 फीसदी विधायकों के विरुद्ध आपराधिक मामले चल रहे हैं। देश की शीर्ष अदालत दागी राजनीतिज्ञों के खिलाफ काफी सक्रिय है।

सन् 2006 में चुनाव आयोग ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखते हुए कहा था कि ''यदि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में जरूरी बदलाव नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब देश की संसद और विधानसभाओं में दाऊद इब्राहिम और अबू सलेम जैसे लोग बैठे होंगे। सरकार ने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया तब सुप्रीम कोर्ट को पहल करनी पड़ी। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 (4) के अनुसार अगर कोई जनप्रतिनिधि किसी मामले में दोषी ठहराए जाने की तिथि से तीन महीने के दौरान अपील दायर कर देता है तो उस मामले का निपटारा होने तक वह अपने पद के अयोग्य घोषित नहीं होगा। इस धारा का सबसे ज्यादा फायदा सियासतदानों ने उठाया और आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग चार्जशीट्स होने के बावजूद लम्बे अर्से तक अपने पदों पर बने रहे। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की यह धारा संविधान के अनुच्छेद 14 में प्रदत्त समानता के अधिकार पर खरी नहीं उतरती तो राजनीति में तूफान खड़ा हो गया।

तत्कालीन यूपीए सरकार ने अध्यादेश जारी कर इस निर्णय को रद्द करने का प्रयास किया तब कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रैस क्लब में अपनी ही सरकार के अध्यादेश के प्रारूप की प्रति फाड़ डाली थी। इस विवादित अध्यादेश में प्रावधान किया गया था कि सजायाफ्ता सांसद और विधायक न केवल विधानसभा और सांसद सदस्य बने रह सकेंगे बल्कि चुनाव भी लड़ सकेंगे। हालांकि दोषमुक्त होने तक उनके संसद और विधानसभा में वोट देने के अधिकार और वेतन- भत्ते पर रोक रहेगी। सुप्रीम कोर्ट के लोकतन्त्र के हित में फैसला दिया और सजायाफ्ता नेताओं के चुनाव में भाग लेने पर अंकुश लगाया। लालू प्रसाद यादव जैसे नेता कोर्ट के इसी फैसले की वजह से चुनाव नहीं लड़ पा रहे। मौजूदा समय में किसी भी मामले में दोषी करार दिए गए सांसदों और विधायकों के 6 वर्ष तक चुनाव लडऩे पर प्रतिबन्ध है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका में दो वर्ष से अधिक सजा पाने वालों पर आजीवन प्रतिबन्ध की मांग की गई है। याचिकादाता का तर्क है कि अगर किसी सरकारी सेवक को सेवा से बर्खास्त कर दिया जाता है तो उसके सेवा में लौटने का कोई सवाल ही नहीं है लेकिन नेताओं को जेल की सजा काटने के 6 वर्ष बाद राजनीति में लौटने की वैधानिक अनुमति है। फौजदारी मामले में किसी लोकसेवक की गिरफ्तारी के 48 घण्टे के भीतर निलम्बित कर दिया जाता है और दोषसिद्धि के बाद उसकी सेवाएं समाप्त कर दी जाती हैं लेकिन नेताओं को छूट है। नेताओं को 6 वर्ष की अवधि के लिए अयोग्य ठहराना शायद उन्हें राजनीति के क्षेत्र में फिर से आमंत्रित करना है। इससे संघीय ढांचा ही विकृत होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने दोषी सांसदों और विधायकों के आजीवन प्रतिबन्ध लगाने के मामले में चुनाव आयोग को नोटिस दिया था और पूछा था कि क्या आयोग सजा पाने वालों पर आजीवन प्रतिबन्ध लगाने के पक्ष में है या नहीं। चुनाव आयोग ने विरोधाभाषी रुख अपनाया। उसने अपने हलफनामे में याचिका का समर्थन तो किया लेकिन सुनवाई के दौरान उसका कहना था कि इस मुद्दे पर विधायिका ही फैसला कर सकती है। चुनाव आयोग लटकाऊ नीति अपना रहा है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने उसे फटकार भी लगाई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जघन्य अपराध मामले में आरोपी सांसदों और विधायकों के मामले में सुनवाई 6 माह के अन्दर पूरी होनी चाहिए। इसके लिए त्वरित अदालतें भी स्थापित होनी चाहिए। लोकतन्त्र में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे पुष्ट अपराधियों को राजनीति से हटाया जाए। सुप्रीम कोर्ट को सजायाफ्ता व्यक्ति के चुनाव लडऩे पर आजीवन प्रतिबन्ध को लेकर फैसला देना है। फैसला क्या आता है, यह देखना अभी बाकी है लेकिन इतना तय है कि दागी माननीयों पर शिकंजा कसने की तैयारी हो चुकी है।