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संपादकीय

कर्नाटक में विदाई की तैयारी !

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कर्नाटक के नाटक का पटाक्षेप अब सुनिश्चित लगता है परन्तु पूरे मामले में जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष गये कांग्रेस के 15 बागी विधायकों की स्थिति पर विद्वान न्यायाधीशों का फैसला आया है उससे स्वतन्त्र भारत का यह राजनैतिक प्रकरण एक अध्ययन विषय (स्टडी केस) बन गया है। उच्चतम न्यायालय ने आज उन 15 कांग्रेसी विधायकों को स्वतन्त्र दर्जा दे दिया जिन्होंने विधानसभा की सदस्यता से अपने इस्तीफे इसके अध्यक्ष को काफी पहले सौंप दिये हैं और उन पर अध्यक्ष के.आर. रमेश कुमार ने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है। 

विधानसभा का बजट सत्र विगत 12 जुलाई से शुरू हो चुका है और इसमें राज्य की कांग्रेस व जद (सै.) की संयुक्त सरकार ने अपना बहुमत साबित करने का प्रस्ताव रखने का वचन दिया है। यह वचन मुख्यमन्त्री एच.डी. कुमारस्वामी ने सदन के भीतर ही दिया है। अध्यक्ष रमेश कुमार ने 15 विधायकों के इस्तीफे अभी तक स्वीकार नहीं किये हैं जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि अध्यक्ष पर इस्तीफों पर फैसला करने के ​िलए कोई समय सीमा लागू नहीं की जा सकती है। वह अपने विवेक से इस बारे में फैसला करें। 

स्पष्ट है कि सर्वोच्च न्यायालय ने विधानसभा अध्यक्ष के संवैधानिक अधिकारों में हस्तक्षेप न करते हुए बागी विधायकों के इस्तीफा देने के अधिकार की सुरक्षा भी की है परन्तु सदन के भीतर की क्रियावली से स्वयं को दूर रखा है। सदन के भीतर जो कुछ भी होता है और इसके सदस्यों की क्या भूमिका रहती है उसके बारे में संवैधानिक नियमावली के अनुसार केवल अध्यक्ष ही अंतिम फैसला कर सकते हैं परन्तु एक विधायक के नागरिक अधिकारों के संरक्षण के प्रति सर्वोच्च न्यायालय ने संज्ञान लिया है और उन्हें चालू विधानसभा के सत्र में उपस्थित रहने या न रहने की खुली छूट दी है। इससे यही साबित होता है कि न्यायालय ने अध्यक्ष पर ही यह जिम्मेदारी छोड़ दी है कि वह अपने पद के संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करें और बागी विधायकों की हैसियत का फैसला उसी के अनुसार करें।

 जाहिर है कि विधानसभा में अध्यक्ष यदि गुरुवार को शक्ति परीक्षण के प्रस्ताव की मंजूरी देते हैं तो इस बैठक में बागी 15 विधायकों का शामिल होना जरूरी नहीं है और दूसरी तरफ यदि अध्यक्ष उनके इस्तीफे स्वीकार नहीं करते हैं तो उनकी सदन की सदस्यता भी बरकरार है। ऐसे में क्या इन विधायकों को अपने मूल दल कांग्रेस का सदस्य समझ कर उन पर वह सचेतक नियम लागू होगा जिसके न मानने पर उनकी पार्टी सदस्यता समाप्त हो जायेगी और इसके प्रभाव से उन पर दलबदल विरोधी कानून लागू करके उनकी सदन की सदस्यता समाप्त कर दी जायेगी? मगर असली सवाल यह है कि ये सदस्य तो पहले ही अपनी पार्टी की इच्छा के विरुद्ध सदन की सदस्यता से इस्तीफा देकर खुद को पार्टी अनुशासन से मुक्त कर चुके हैं। 

जब वे इस्तीफा अध्यक्ष को ही सौंप चुके हैं तो उन पर सदन या उनकी पार्टी का अनुशासन कैसे लागू हो सकता है ? लेकिन स्वयं अध्यक्ष ही उनके इस्तीफे स्वीकार नहीं कर रहे हैं और कह रहे हैं कि वह संवैधानिक रूप से सही फैसला लेंगे। एक बात शीशे की तरह साफ हो चुकी है कि इस्तीफा देने वाले 15 विधायकों के लिये ऐसा कदम उठाने के पीछे चाहे जो भी कारण रहा है परन्तु उन्हें सदन के भीतर शक्ति परीक्षण के दौरान उपस्थित होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अतः यदि ये सदस्य बहुमत के लिए होने वाले मतदान में शामिल नहीं होते हैं तो उनकी अनुपस्थिति को अध्यक्ष किस रूप मे लेंगे? अध्यक्ष को इन सदस्यों के बारे में फैसला लेते समय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को ध्यान में रखना होगा। 

इसके साथ ही उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि उन्हें उन्हीं लोगों के बारे में फैसला लेना है जो खुद उनके सामने ही गुहार लगा रहे हैं कि उन्हें सदन के संवैधानिक नियमों से मुक्त किया जाये। अतः अध्यक्ष को सबसे पहले स्वयं ही सन्तुष्ट होना पड़ेगा कि उनका फैसला सदन के किसी भी सदस्य के मूलभूत अधिकारों के खिलाफ न हो। किसी भी सदस्य को जबरन विधानसभा का सदस्य बने रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है और किसी भी सदस्य को कोई अन्य शक्ति दबाव या लालच देकर इस्तीफा देने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है। चंूकि ये सभी 15 सदस्य सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जाकर खुद कबूली कर चुके हैं कि वे अपनी इच्छा से इस्तीफा दे रहे हैं।

 अतः अध्यक्ष को सर्वोच्च अदालत के सामने की गई स्वीकारोक्ति के विरुद्ध बागी विधायकों की मंशा पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं मिलता है। इससे स्पष्ट है कि स्तारूढ़ सांझा सरकार के समर्थक विधायकों की संख्या में 15 सदस्यों की कमी आ चुकी है जिससे कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में आ चुकी है किन्तु तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि यदि ये बागी विधायक या इनमें से कुछ विधायक विधानसभा में पहुंच जाते हैं तो फिर क्या होगा? इसका मतलब यही होगा कि सदन की कार्यवाही में शिरकत करने वाले विधायकों को खुद अपने फैसले पर ही भरोसा नहीं है और वे इस्तीफा देने के बावजूद अपनी हैसियत को विधायक के रूप में देखने की लालसा में हैं। 

ऐसी स्थिति में उन पर सदन के भीतर के वे नियम तुरन्त लागू हो जायेंगे जिनके संरक्षक अध्यक्ष होते हैं। अर्थात सरकार के खिलाफ जाने पर उन पर दलबदल कानून लागू हो जायेगा और वे छह वर्ष के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित हो सकते हैं जबकि सरकार के पक्ष में मत देने से उनके दिये हुए इस्तीफे की हैसियत बाकायदा बरकरार रहेगी। ऐसी सूरत में वे सर्वोच्च न्यायालय में दिये गये अपने बयान से फिरे हुए माने जायेंगे और मुफीद सजा के मुस्तफिक भी समझे जायेंगे।

 इसलिए जो पेंच आकर फंसा है उसका आखिरी नतीजा यही निकलता है कि कुमारस्वामी सरकार के दिन पूरे हो चुके हैं क्योंकि इस्तीफा देने वाले विधायक सर्वोच्च न्यायालय की चौखट पर जाने के बाद दोनों तरफ से फंस चुके हैं। जिस सरकार को एक साल सवा महीना पहले कर्नाटक की आम जनता ने चुना था वह कानूनी पेंचों के चुनाव में फंस चुकी है। लोकतन्त्र में सम्मान के साथ गद्दी छोड़ना भी एक ‘सम्मान’ होता है, जब अपने दगा देने लगें तो समझना चाहिए कि चुप रहने में ही बेहतरी है।