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महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन !

महाराष्ट्र में लोकतन्त्र का जो फजीता हुआ है उससे स्पष्ट है कि राजनैतिक दलों के अपने हित राज्य की जनता के हितों से इस प्रकार ऊपर हो चुके हैं कि उन्होंने चुुनावों में मिले जनादेश को धत्ता बताना उचित समझा। महाराष्ट्र में संभवतः ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब चुनावों में किसी गठबन्धन को मिले जनादेश का इतने खुले रूप से निरादर और अपमान किया गया। वैसे गौर से देखा जाये तो राज्य में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा फौरी तौर पर गलत नहीं है क्योंकि चुनावों में कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, भाजपा और शिवसेना जिस एजेंडे और विचारधारा के साथ जनता के बीच गये थे उसका अनुपालन करने से उन्होंने स्वयं ही इंकार कर दिया। स्पष्ट है कि भाजपा और ​​शिवसेना राज्य की जनता को यह ​िवश्वास दिलाने में सफल रहे कि उनका महायुति नाम से गठजोड़ स्थायी सरकार देने में समर्थ रहेगा। 

वहीं दूसरी ओर कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस का महाअघाडी नाम से बना गठबन्धन महायुति के विरोध में सिद्धान्ततः विपरीत विचारधारा के साथ सार्थक विकल्प प्रस्तुत करने के वादे के साथ मैदान में उतरा था, परन्तु चुनावों के बाद शिवसेना और भाजपा के बीच जिस प्रकार सत्ता के बंटवारे को लेकर विवाद पैदा हुआ उससे इन दोनों दलों के सांझा सैद्धान्तिक गठजोड़ का पर्दाफाश हो गया। इस मामले में शिवसेना को ज्यादा दोषी माना जा सकता है क्योंकि उसने विगत लोकसभा चुनावों के समय भाजपा के साथ बने गठबन्धन की शर्तों को आगे रखकर विगत माह हुए विधानसभा चुनावों में आये परिणामों को तोलते हुए अपनी भूमिका में परिवर्तन को ज्यादा लाभकारी समझा। जाहिर है इससे राज्य की जनता का विशेष लेना-देना नहीं था। यही वजह रही कि शिवसेना राज्यपाल से मिलने के बाद सरकार बनाने के दावे को पूरा करने में असमर्थ रही और यही हाल राष्ट्रवादी कांग्रेस का भी हुआ।

बेशक त्रिशंकू विधानसभा गठित होने पर विभिन्न राज्यों में ऐसे  अवसर भी आये हैं जब कोई भी दल सरकार बनाने में सफल नहीं रहा है और मजबूरी में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा है। ऐसा  90 के दशक में उत्तर प्रदेश में हुआ था जब चुनावों के बाद राज्य को राष्ट्रपति शासन में रहना पड़ा था, परन्तु महाराष्ट्र पर यह फार्मूला इसलिए लागू नहीं होता क्योंकि यहां राज्य की जनता ने चुनाव पूर्व बने दो सियासी पार्टियों के गठजोड़ को पूर्ण बहुमत प्रदान किया। लोकतन्त्र में राष्ट्रपति शासन का लगना किसी भी मायने में लोकमत के हक में नहीं माना जाता है। इस व्यवस्था में जनमत की सरकार ही लोगों का सच्चा प्रतिनिधित्व करती है परन्तु जब राज्यपाल के समक्ष लोकप्रिय सरकार गठित करने का विकल्प स्वयं राजनैतिक दल ही समाप्त कर दें तो क्या किया जा सकता है?

राज्यपाल का प्रथम कर्त्तव्य किसी भी राज्य में स्थायी सरकार के गठन का होता है परन्तु यह सरकार इस प्रकार गठित होनी चाहिए कि उसके गठन में विधायकों के मोलतोल की किसी भी प्रकार की मंभावना न हो, संविधान के पालन करने और इसकी शुचिता को बरकरार रखने की जिम्मेदारी से राज्यपाल बिना किसी राजनैतिक राग-द्वेष के बन्धे रहते हैं। अतः महाराष्ट्र के राज्यपाल श्री भगत सिंह कोश्यारी ने बारी-बारी से उन सभी दलों को सरकार बनाने का अवसर प्रदान किया जो इस मंशा के साथ उनसे मिले थे, परन्तु राज्यपाल किसी भी दावा करने वाले दल को आवश्यक बहुमत जुटाने के लिए असीमित और मन मांगे समय की मोहलत भी नहीं दे सकते हैं।

इस बारे में पिछले वर्ष का कर्नाटक का उदाहरण हमारे सामने है जब वहां के राज्यपाल श्री वजू भाईवाला ने चुनावों के बाद विधानसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर भाजपा नेता श्री बी.एस. येदियुरप्पा को अपना बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय दे दिया था और इसके विरुद्ध  विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगा दी थी। उसने श्री येदियुरप्पा को 24 घंटे के भीतर अपना बहुमत साबित करने का निर्देश दिया था। लोकतन्त्र केवल लिखित कानून से ही नहीं बल्कि सुस्थापित परंपराओं से भी चलता है और इस मामले में तो सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश मौजूद है। अतः श्री कोश्यारी का फैसला किसी भी दल को पक्षपातपूर्ण नहीं लग सकता। इसीलिए जब उन्होंने सारे विकल्पों को तलाश लिया और उन्हें स्थायी सरकार बनने की कोई संभावना नजर नहीं आयी तो उन्होंने राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर दी। राज्यपाल महोदय ने संविधान में निहित अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए यह अनुशंसा केन्द्र से की है जिस पर मोदी मन्त्रिमंडल कल ही मुहर लगा चुका है। 

अब राष्ट्रपति अध्यादेश जारी करके इसे लागू कर देंगे। जाहिर है कि संसद का सत्र आगामी 18 नवम्बर से शुरू हो रहा है। अतः राज्यपाल शासन के अध्यादेश को इसके दोनों ही सदनों में पारित कराना सरकार की जिम्मेदारी होगी हालांकि राज्यसभा में मोदी सरकार का बहुमत नहीं है परन्तु विपक्षी दल भी नैतिक रूप से राष्ट्रपति शासन का विरोध संसद के उच्च सदन में नहीं कर सकते हैं क्योंकि राज्यपाल ने उन्हें भी महाराष्ट्र में सरकार बनाने का अवसर देने से मना नहीं किया। किन्तु मुख्य सवाल लौटकर फिर वहीं आता है कि राज्य में राज्यपाल शासन लगाने की नौबत ही क्यों आयी? यदि शिवसेना अपना पिछला इतिहास भूल कर हिन्दुत्व के विचार को त्याग कर भाजपा से तलाक लेने का मन बना चुकी है तो उसे सबसे पहले राज्य की जनता से इजाजत लेनी होगी। कांग्रेस पार्टी ने शिवसेना व राष्ट्रवादी कांग्रेस के गठबन्धन की सरकार को समर्थन देने से हाथ खींच कर निश्चित रूप से अपने विचारों व सिद्धान्तों पर डटे रहने का परिचय दिया है। यह लोकतन्त्र में स्वागत योग्य है।