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संपादकीय

प्रियंका चली अपनी दादी की चाल !

आज भारत में एक बहस शुरू हो चुकी है। बहस का केन्द्रबिन्दु है कांग्रेस। जिस कांग्रेस ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम लड़ा और देश को स्वतंत्र कराया। आज कांग्रेस को सशक्त नेतृत्व की तलाश है। अब सवाल सबके सामने है कि ऐसा कौन-सा जुझारू व्यक्तित्व होगा जो कांग्रेस को पुनर्जीवित कर दे? ए.ओ. ह्यूम की कांग्रेस नेताजी सुभाष चन्द्र की कांग्रेस, पंडित जवाहर लाल नेहरू की कांग्रेस, लाल बहादुर शास्त्री की कांग्रेस, इन्दिरा गांधी की कांग्रेस का नेतृत्व कौन करेगा? सन् 1884 में इंडियन नेशनल पार्टी अस्तित्व मेें आई थी। 25 दिसम्बर 1885 को पूना में इसकी बैठक होनी तय हुई थी परन्तु पूना में महामारी फैल जाने के चलते इसकी बैठक 28 दिसम्बर से 31  दिसम्बर तक मुम्बई में हुई। 

श्री डब्ल्यू.सी. बनर्जी ने इसकी अध्यक्षता की। इसमें पूरे देश से 72 नेताओं ने भाग लिया। दादा भाई नौरोजी की सलाह पर इसका नाम अन्ततः इंडियन नेशनल कांग्रेस रख दिया गया। जिस पार्टी का इतिहास इतना पुराना हो, आज वह सिमट कर रह गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की खामोश सुनामी ने कांग्रेस को उखाडू फैंका है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसका लम्बा इतिहास है। 

दरअसल समय बीतने के साथ-साथ कांग्रेस ने अपनी विरासत में दादा भाई नौरोजी, सर ह्यू, ऐनीवेसेंट, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, पंडित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री के उसूलों से सत्ता की लालसा में समझौते करती रही और इसके परिणाम उसके लिए सुखद नहीं रहे। कांग्रेस में जुं​डलियां जन्म लेती रहीं, चमचों और भ्रष्टाचारियों की भरमार हो गई और  पार्टी सैद्धांतिक और वैचारिक स्तर पर खोखली होती गई। अन्ततः 2019 चुनावों से पहले कमजोर होती कांग्रेस को देखते हुए राजीव गांधी की बेटे राहुल गांधी को कांग्रेस में उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाकर सक्रिय राजनीति में उतारा गया लेकिन नरेन्द्र मोदी के सामने हार स्वीकार करते हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और  कहा कि पार्टी कार्यसमिति को बैठक बुलाकर नया अध्यक्ष चुनने की चुनौती भी फैंक दी। 

पार्टी नेतृत्व नए अध्यक्ष को लेकर क्या सोचता है या किसे कमान सौंपना चाहता है। यह पार्टी का आंतरिक मामला है। पराजय के बावजूद प्रियंका गांधी वाड्रा राजनीति में सक्रिय है। उसके चेहरे पर कोई तनाव भी नजर नहीं आता। उत्तर प्रदेश की हर घटना पर वह ट्वीट कर रही है। अखबारों की सुर्खियों में रहना भी उन्हें आता है और साथ ही उसमें जुझारूपन भी दिखाई दे रहा है। 

शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के सोनभद्र नरसंहार के पीड़ितों से मिलने जा रही कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को जिस तरह से उत्तर प्रदेश की पुलिस द्वारा रास्ते में रोके जाने पर उसने कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर धरना दिया। उससे पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल जरूर बढ़ा है और उनमें नए रक्त का संचार हुआ है। प्रियंका ने कहा कि हम झुकने वाले नहीं, हम पीड़ित परिवार  वालों से मिलेंगे। उन्होंने प्रशासन से तीन-चार लोगों के साथ पीड़ितों से मिलने जाने का आग्रह भी किया लेकिन प्रशासन ने इसकी भी अनुमति नहीं दी। फिलहाल सोनभद्र नरसंहार को लेकर सियासी बवाल जारी है। प्रियंका ने सोनभद्र पर संग्राम छेड़ दिया है। 

कांग्रेसियों की नई पौध को शायद इस बात की जानकारी भी नहीं होगी कि जुलाई 1977 में बिहार के बेलची में उच्च जातियों के एक समूह ने कई दलितों की हत्या कर दी थी। श्रीमती इन्दिरा गांधी उस समय विपक्ष में थीं।  इमरजेंसी के पश्चात श्रीमती इन्दिरा गांधी और कांग्रेस पार्टी को जे.पी. और जनता पार्टी के समक्ष करारी हार का सामना करना पड़ा था उस समय कांग्रेस की स्थिति ऐसी ही थी जैसी आज है। 

आज की कांग्रेस की स्थिति तो 1977 की कांग्रेस की स्थिति से भी बदतर है। कम से कम उस समय कांग्रेस की नेता स्व. इन्दिरा गांधी तो थीं, आज राहुल गांधी के त्यागपत्र के पश्चात कांग्रेस के पास कोई नेता ही नहीं बचा जो उसे सम्भाल सके। ऊपर से भारी-भरकम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह देशभर में हावी हो चुके हैं। भाजपा का परचम देश में चहुंआेर फहर रहा है। उधर 1977 में जनता पार्टी और  सत्तापक्ष बेलची के सम्बन्ध में सोच ही रहा था कि श्रीमती इन्दिरा गांधी दलितों से मिलने बेलची पहुंच गई थीं। 

श्रीमती गांधी ने पहले ट्रेन से यात्रा की, फिर जीप से, उसके बाद जब वर्षा होने लगी तो उन्होंने किसी के ट्रैक्टर पर सवार होकर यात्रा की और अन्त में वह हाथी पर सवार होकर बेलची पहुंच गई थीं और दलितों का दुःख-दर्द बांटा था। बाद में श्रीमती इंदिरा गांधी की बेलची यात्रा ही उनकी राजनीति  में नई पारी की शुरूआत बनी। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को एक ऐसे व्यक्तित्व की जरूरत है जो जनता का दुःख-दर्द बांट सके और उनसे सीधे संवाद स्थापित कर सके। सब जानते हैं कि प्रियंका गांधी की छवि केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। वह जनता से अपनी दादी इन्दिरा गांधी की शैली में सीधा सम्पर्क साध सकती है। वह उत्तर प्रदेश से भी अपरिचित नहीं। 

अब पूर्व राष्ट्र​पति प्रणव मुखर्जी के बेटे और पूर्व सांसद अभिजीत मुखर्जी, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे और पूर्व केन्द्रीय मंत्री अनिल शास्त्री समेत कई नेताओं के प्रियंका गांधी वाड्रा के पक्ष में खुली अपील जारी की है और उन्हें पार्टी की कमान सम्भालने का आग्रह किया है। इन नेताओं का कहना है कि पार्टी नेतृत्व के लिए प्रियंका गांधी से बेहतर व्यक्तित्व कोई और हो ही नहीं सकता। 

प्रियंका इस सम्बन्ध में क्या सोचती हैं, यह तो वह ही जानें? लेकिन मेरी व्यक्तिगत राय है कि प्रियंका को पार्टी में रहकर अभी पांच या दस वर्ष तक मेहनत करनी होगी। उन्हें पार्टी की सैद्धांतिक और वैचारिक नीतियों पर खरा उतरना होगा। जनहित के मुद्दों को लेकर उन्हें सड़कों पर जूझना होगा। उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि सभी राज्यों में कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद स्थापित कर पार्टी की जड़ों को सींचना होगा। उन्हें भारत की खोज करनी होगी, भारत को समझना होगा और  अपना जनाधार बढ़ाना होगा। पार्टी में ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ कार्यकर्ताओं को तरजीह देकर नए रक्त का संचार करना होगा। उन्हें एक संग्राम नहीं, कई संग्राम लड़ने होंगे। उन्हें लम्बे संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा।