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जनता का एजेंडा ही सर्वोच्च !

अक्सर राजनीतिक दल जो सबसे बड़ी गलती करते हैं वह स्वयं को लोक इच्छा और लोक शक्ति से ऊपर समझने की करते हैं। जनतन्त्र में लोक शक्ति से ऊपर कोई भी शक्ति नहीं हो सकती और लोक इच्छा से ऊपर कोई भी नीति नहीं हो सकती। यही लोक शक्ति राजनीति में नायकों और महानायकों को जन्म देती है मगर राजनीतिक दल गफलत में पड़ जाते हैं कि वे अपनी सत्ता की ‘धमक’ या विपक्ष की ‘कर्राहट’ से जनता को निर्देशित कर सकते हैं। यह सिवाय ‘मृग मरीचिका’ की माया के अलावा दूसरी चीज नहीं होती क्योंकि जनता किसी भी चुनाव में अपना एजेंडा स्वयं तय करती है और फिर देखती है कि उस पर कौन सी राजनीतिक पार्टी चलने की कोशिश कर रही है। जब यह कहा या सोचा जाता है कि चुनाव केवल वही राजनीतिक दल जीतता है जो एजेंडा तय करता है और दूसरा पक्ष उसी एजंडे पर रक्षात्मक होकर जवाब देने लगता है तो इसका अर्थ यही होता है कि एजेंडा तय करने वाले राजनीतिक दल ने जनता की इच्छा को गहराई से समझ कर चुनावी मैदान में सवालों को उछाला है।

ऐसा हमने 2014 के लोकसभा चुनावों में देखा था। इन चुनावों में भाजपा की विजय केवल इसीलिए हुई थी कि उसने आम जनता के ‘मन की भाषा’ को पढ़कर अपना एजेंडा तय किया था मगर तब की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी भाजपा द्वारा उठाये गये सवालों का जवाब इतिहास की कब्रें खोद कर देने की कोशिश कर रही थी और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के लिए भाजपा या संघ को दोषी बताकर अपने शासन में उठे मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही थी। अतः इस हकीकत से कोई इंकार नहीं कर सकता कि लोक इच्छा की तृप्ति केवल वही राजनीतिक पार्टी करती है जो जनता के मन में उठ रहे तात्कालिक सवालों को सतह पर लाकर अपना हल प्रस्तुत करने की कोशिश करती है। फिलहाल देश में जो माहौल बन रहा है उसके केन्द्र में गुजरात विधानसभा के चुनाव इस तरह आ गये हैं कि जैसे इन्हीं के परिणाम से पूरे देश की दशा और दिशा तय होगी जबकि यह अवधारणा तकनीकी रूप से सही नहीं है मगर स्वयं सत्ताधारी पार्टी भाजपा ऐसा माहौल बना रही है। इसका प्रमाण उसकी देश के विभिन्न राज्यों में चल रही सरकारों द्वारा हाल-फिलहाल की गई राजनीतिक घोषणाएं और उठाये गये मुद्दे हैं। यह भी स्वयं में विस्मयकारी है कि केन्द्र की सरकार ने संसद का शीतकालीन सत्र गुजरात के लिए होने वाले मतदान के बाद ही केवल 20 दिन का बुलाने का निश्चय किया है और मुश्किल से एक दर्जन भर बैठकों वाले सत्र के लिए भारी-भरकम और मोटा कार्य भी घोषित करना शुरू कर दिया है।

तीन तलाक के लिए नये कानून से लेकर पिछड़ी जाति आयोग से सम्बन्धित विधेयकों को भी इसी सत्र मंे लाने की घोषणा हो रही है। मसलन संसद का सत्र शुरू होने से पहले ही मानों इसके समापन का इंतजाम बांधा जा रहा है। ऐसा मेरा कहना नहीं है बल्कि कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है और उनका मानना है कि यह सब गुजरात चुनावों को केन्द्र में रखकर किया जा रहा है। इन्हीं विपक्षी नेताओं को यह भी ध्यान मंे रखना चाहिए कि जब 2014 मंे मनमोहन सरकार के दिन पूरे होने वाले थे तो किस तरह खाद्य सुरक्षा कानून से लेकर सब्सिडी सीधे लाभार्थियों के खातों तक पहुंचाने के लिए नियम बनाये जा रहे थे मगर नतीजा जो निकला वह हमारे सामने है। यह सब इसी वजह से हुआ कि जनता विभिन्न घोटालों का जवाब मांग रही थी और महंगाई की वजह पूछ रही थी जबकि उसे जवाब इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ कर दिया जा रहा था।

अतः बहुत साफ है कि आज जनता के सामने नोटबन्दी और जीएसटी से उठे सवाल मुख्य हैं जिनका जवाब किसी भी तौर न तो राम मन्दिर निर्माण का मुद्दा और न ही गाैहत्या निषेध या सांस्कृतिक उग्रवाद (पद्मावती फिल्म) हो सकता है। जाहिर तौर पर आर्थिक मुद्दों का जवाब न तो राष्ट्रवाद है और न ही सांस्कृतिक उग्रवाद और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण लेकिन गफलत का कोई इलाज नहीं है क्योंकि पार्टियां समझती हैं कि उनके प्रचार की आंधी से जमीन के मुद्दों को बदला जा सकता है। इसके लिए वे सभी प्रकार के हथकंडे इस्तेमाल करती हैं मगर सबसे बड़ी गलती चुनावों को किसी व्यक्ति विशेष की प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर करती हैं। चुनावों में अगर किसी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी होती है तो वह केवल उस मतदाता की लगी होती है जिसके पास एक वोट का अधिकार होता है। इसी एक वोट के अधिकार से तो जनता लोकतन्त्र में अपने ‘राजा’ होने का सबूत देती है।

अतः प्रतिष्ठा अगर किसी की दांव पर लगी होती है तो वह उसी की होती है। स्वतन्त्र भारत का इतिहास इसका जीता-जागता गवाह है। सबसे बड़ा उदाहरण तो स्वयं गुजरात है जहां 1975 के जून महीने में हुए विधानसभा चुनावों में विपक्षी दलों के गठबन्धन ‘जन मोर्चे’ की सरकार तब बन गई थी जब स्व. इंदिरा गांधी जैसी हस्ती देश की प्रधानमन्त्री थीं और उन्होंने इस राज्य के चुनाव प्रचार में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। इसकी एक ही वजह थी कि इन्दिरा जी ने तब लोक इच्छा के विरुद्ध अपना एजेंडा जनता पर थोपना चाहा था। बात सिर्फ इतनी सी है कि लोकतन्त्र में मतदाता के मन की बात ही यत्र-तत्र-सर्वत्र बोलती है। ऐसा हमने इसी वर्ष हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी देखा जिसमें उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के लोगों का एजेंडा पंजाब , गोवा व मणिपुर के लोगों के एजेंडे से अलग रहा था क्योंकि इन राज्यों में कांग्रेस को भाजपा पर बढ़त मिली थी। जाहिर है कि इन पांच राज्यों के चुनाव परिणामों की सीख भी यही है कि जीवन्त लोकतन्त्र का असली बादशाह मतदाता ही है और उसी के एजेंडे की अन्तिम विजय होती है।