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संपादकीय

चुनावों में जनता के मुद्दे?

आतंकवाद, माओवाद, नक्सलवाद, कश्मीर, पाकिस्तान और राष्ट्रीय सुरक्षा, इनमें से कौन सा विषय या मुद्दा ऐसा है जिसका सम्बन्ध सीधे तौर पर देश की आम जनता से जुड़ा हुआ है? इनमें से किसी का भी प्रत्यक्ष सम्बन्ध भारत के किसी शहर या गांव में रहने वाले किसी नागरिक से नहीं है। ये सभी विषय और मुद्दे ऐसे हैं जिनका सीधा और पक्का सम्बन्ध देश पर शासन करने वाली किसी भी सरकार से होता है, अर्थात ये सभी विषय किसी भी चुनी हुई सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होती हैं। यह सरकार किसी भी राजनैतिक दल की हो सकती है।

पिछले सत्तर सालों में देश की लगभग सभी प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां कम्युनिस्ट पार्टी से लेकर क्षेत्रीय पार्टियां द्रमुक व तृणमूल कांग्रेस, यहां तक कि केरल की इंडियन मुस्लिम लीग और कट्टरपंथी हिन्दुत्ववादी पार्टी शिवसेना तक किसी न किसी गठबन्धन सरकार में शामिल रह चुकी हैं जबकि कांग्रेस व भाजपा तो ऐसी गठबन्धन सरकारों का नेतृत्व करती रही हैं। अतः स्पष्ट है कि ये सभी विषय सभी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय पार्टियों के लिए एक समान महत्व रखते हैं क्योंकि इनका सम्बन्ध भारत राष्ट्र की ‘संप्रभु’ सत्ता से जुड़ा हुआ है।

देश की सत्ता संभालने वाली हर पार्टी ने इन विषयों को अपनी-अपनी नीति के अनुसार सुलझाने का प्रयास किया है। इसके बावजूद इन विषयों से जुड़े हुए सवाल अपनी जगह खड़े हुए हैं ? इसका मतलब क्या यह मान लिया जाये कि हर सरकार इस मामले में विफल रही है? यदि एेसा है तो फिर किस आधार पर इन विषयों को चुनावी मुद्दा बनाया जा सकता है और लोगों से इनके नाम पर वोट मांगे जा सकते हैं? जाहिर है कि इनके हल न होने का मतलब सरकार की विफलता से ही निकाला जायेगा। अतः फिर किस प्रकार कोई भी राजनैतिक दल इन विषयों से जुड़ी समस्याओं का हल खोजने के लिए लोगों से वोट मांग सकता है? लोकतन्त्र में हर पांच वर्ष बाद आम मतदाता जब अपने एक वोट की ताकत से अपनी मनपसन्द सरकार को सत्ता सौंपता है तो वह यह मानकर चलता है कि सरकार अपने उन राष्ट्रीय कर्तव्यों में किसी प्रकार की कोताही नहीं बरतेगी जो भारतीय राष्ट्र की सार्वभौमिकता और सत्ता की संप्रभुता से जुड़े हुए हैं।

इसका मतलब यही होता है कि इन सभी विषयों के सुलझाने का दायित्व स्वाभाविक तौर पर हर सरकार के कन्धों पर स्वतः ही जाता है। आजाद भारत के इतिहास में केवल पं. नेहरू की सरकार के अतिरिक्त किसी भी अन्य कांग्रेसी या गैर कांग्रेसी सरकार का कार्यकाल एेसा नहीं रहा जिसमंे पाकिस्तान के साथ भारत के सम्बन्धों में कशीदगी न रही हो। अतः पिछले पांच साल की भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार इस मोर्चे पर कोई एेसा काम नहीं कर सकी जिससे पाकिस्तान को रास्ते पर लाया जा सके। इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर का मसला लगातार बद से बदतर होता चला गया जबकि अब कहा जा रहा है कि अनुच्छेद 370 और 35(ए) को हटाने के लिए जनता समर्थन दे।

आतंकवाद और माओवाद को समाप्त करने के बारे में सरकार की इच्छा शक्ति सबसे ज्यादा महत्व रखती है। प. बंगाल के ‘जंगल महल’ इलाके में ममता दी के राज की पहली सरकार के दौरान माओवादियों का राज चला करता था मगर ममता दी ने इस मसले को जिस खूबी के साथ निपटाया उससे सत्ता की इच्छा शक्ति का ही पता चला। इससे पहले आन्ध्र प्रदेश में स्व. वाईएसआर रेडड्डी की सरकार ने भी नक्सलवादी समस्या का अन्त अपनी इच्छाशक्ति के बूते पर ही किया था। ममता दी ने तो कश्मीर समस्या को भी चन्द दिनों में ही सुलझाने का दावा एक हालिया टीवी साक्षात्कार में किया है।

उन्होंने एक ही शर्त रखी कि लोकतन्त्र में हर समस्या का समाधान तभी निकलता है जब उस समस्या को झेल रहे आम लोगों की शिरकत भी उसमें पक्की की जाये मगर विभिन्न राजनैतिक दल इस समस्या को फुटबाल बनाये रखना चाहते हैं और आम जनता को उलझाये रखना चाहते हैं। इसके बावजूद ये सभी विषय ऐसे हैं जिन्हें राजनीति में घसीट कर राजनैतिक दल आम जनता की नजरों में अपनी अलग पहचान बनाते हैं।

1947 में हिन्दू महासभा में वीर सावरकर जैसा व्यक्ति था और उनकी पार्टी ‘राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दुओं के सैनिकीकरण’ की अलख जगाया करती थी। हिन्दुओं ने ही इस विचार को कूड़ेदान में इसलिए डाला था क्योंकि हथियार कभी भी हाथ की शोभा नहीं होते बल्कि वे डर या खौफ अथवा आतंक पैदा करने का प्रतीक होते हैं और तब भारत ने एक बूढे़ आदमी महात्मा गांधी के शरीर पर लिपटी एक धोती और हाथ में सहारे के लिए पकड़ी लाठी के सहारे ही अंग्रेजों की शक्तिशाली फौज को परास्त करके अपने देश को आजाद कराया था मगर देखिये हिन्दू अस्मिता का क्रूर अट्टहास कि एक हिन्दू गांधी की हत्या एक अन्य हिन्दू नाथूराम गोडसे ने ही कर डाली और उस पाशविक मानसिकता से हिन्दू अस्मिता को कलंकित कर डाला जिसने गांधी की हत्या को ‘गांधी वध’ का नाम दिया।

ये चुनाव भारत की अस्मिता को सतह पर लाने के ऐसे चुनाव हैं जिसे देखकर पूरी दुनिया के लोग कह सकें कि यह देश उस ‘चाणक्य’ की विरासत संभालने वाले ‘नीतिपुरुष’ का देश है जिसने मगध के ‘नन्द साम्राज्य’ का विनाश करने के बाद ‘चन्द्रगुप्त’ को आदेश दिया था कि वह जाये ‘नन्द’ के उस प्रधान अमात्य ‘राक्षस’ को राज्य छोड़ने से रोके और अपने दरबार का ‘रत्न’ बनाये जिसकी नीतियों का अनुसरण करते हुए नन्द ने ‘मगध विजय’ को कठिन बना दिया था।