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महिला अधिकारी की हत्या पर उठते सवाल

हर रोज ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जिन्हें देखकर तो ऐसे लगता है कि लोगों में कानून का कोई खौफ नहीं। ऐसी घटनाएं समाज के लिए भी और देश के लिए भी कहीं अधिक अशुभ, घातक और विध्वंसक हैं। राज्य, कानून और नागरिक समाज सकते में है। अपराध, हिंसा, भय और बलात्कार से सभी पहले ही बहुत विचलित हैं। देश में कई तरह के माफिया सक्रिय हैं। भूमाफिया, खनन माफिया, शराब माफिया, बिल्डर माफिया और होटल माफिया। सभी अपने-अपने ढंग से गैर कानूनी धंधों में लिप्त हैं। देश में कई अफसरों की हत्याएं भी हो चुकी हैं, लेकिन हिमाचल जैसे शांत राज्य के एक शहर कसौली में जिस तरह से एक होटल मालिक ने खुलेआम अवैध निर्माण गिराने गई महिला अधिकारी शैल बाला की हत्या कर दी, वह कई सवाल खड़े करती है। पहला सवाल तो यह है कि क्या देश एक नए बर्बर युग में प्रवेश कर रहा है और दूसरा सवाल यह है कि क्या हिमाचल में भूमाफिया आैर होटल लॉबी इतनी दबंग हो गई है कि उसे कानून का कोई खौफ नहीं ?

महिला अधिकारी पर गोली चलाने का आरोपी विजय ठाकुर कोई और नहीं बल्कि बिजली बोर्ड मुख्यालय में निदेशक सिविल के पीए पद पर कार्यरत है। हत्या करने के बाद वह पुलिस की मौजूदगी में फरार भी कैसे हुआ, पुलिस पर भी अंगुलियां उठ रही हैं। करीब 15 दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद हिमाचल सरकार व जिला प्रशासन को होटलों के अवैध हिस्से को तोड़ने के आदेश हुए थे। अवैध निर्माण गिराने के लिए भारी-भरकम अमला कसौली के मांडोधार में नारायणी गैस्ट हाउस पहुंचा तो वहां नगर नियोजन अधिकारी कसौली शैल बाला की गैस्ट हाउस के मालिक विजय ठाकुर से कहासुनी हो गई। इसी कहासुनी के दौरान उसने महिला अधिकारी को गोली मार दी। स्पोक संस्था द्वारा करीब एक वर्ष पहले होटलों के अवैध रूप से निर्माण का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के ध्यान में लाया गया था। उसके बाद करीब 13 होटलों काे तोड़ने के आदेश दे दिए थे लेकिन होटल लॉबी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थी लेकिन वहां भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली। उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 15 दिन के भीतर खुद होटल का अवैध हिस्सा गिराने को कहा था। कुछ होटल मालिकों ने ऐसा किया आैर कुछ ने अवैध निर्माण को छुआ तक नहीं।

हिमाचल हो या उत्तराखण्ड, होटल और रिजॉर्ट बनने वालों ने नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई हैं। कुछ होटलों और रिजॉर्ट को दोमंजिला इमारत बनाने की इजाजत थी लेकिन उन्होंने छह-छह मंजिला इमारतें खड़ी कर लीं। पार्किंग के लिए भी काफी क्षेत्र घेर लिया। एक होटल के परिसर में तो भूस्खलन हुआ लेकिन कोई सुरक्षात्मक पग उठाए ही नहीं गए। पहाड़ों की खुदाई कर-करके बहुमंजिली इमारतें खड़ी हो गईं, जमीन खोखली होती गई। पर्यटकों की भीड़ उमड़ती गई। उन्हें भी रहने के लिए जगह चाहिए। होटल मालिक यात्रा सीजन में करोड़ों की कमाई करते रहे। पैसे के लालच में लोगों की जिन्दगियों से खिलवाड़ किया जा रहा है। उत्तराखण्ड की भयंकर त्रासदी के लिए भी विकास के नाम पर अवैध निर्माण भी जिम्मेदार रहा, जहां नदी के मुहाने पर कंक्रीट की इमारतें खड़ी कर दीं। नदी के जल प्रवाह की दिशा बदलते ही इमारतें धराशायी हो गईं। पर्वतीय स्थलों पर अंधाधुंध अवैध निर्माण से पर्यावरण तबाह हो रहा है लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं।

हिमाचल जैसे प्रकृति से भरपूर राज्य में होटल लॉबी को ताकतवर बनाने के पीछे है भ्रष्टाचार आैर राजनीतिक संरक्षण। पर्वतीय राज्यों में न केवल होटल लॉबी को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है, वहीं अवैध खनन का धंधा भी राजनीतिक संरक्षण में बदस्तूर जारी है। इस बात का आकलन करना होगा कि हिमाचल में किसके शासन में यह लॉबियां उभरीं। माफिया, अफसर आैर राजनीतिज्ञों की सांठगांठ के चलते लॉबियां ताकतवर हुईं। कुछ राजनीतिज्ञों पर इन माफियाओं से सांठगांठ के आरोप भी लगते रहे हैं लेकिन हिमाचल के पर्यावरण को तबाह करके रख दिया गया। पर्यावरण के भीतर भौतिक या प्राकृतिक बायोमास के साथ-साथ सामाजिक वातावरण भी शामिल है। यह अविवेकपूर्ण उखाड़-पछाड़, जो उद्योग व विकास जैसे उच्च अर्थी शब्दों की आड़ में इस समय पहाड़ पर हो रही है, वह पहाड़ के सारे सामाजिक वातावरण, वहां की सुरक्षा, वहां की जीवनचर्या की गुणात्मकता तथा स्थायित्व को नुक्सान पहुंचा रही है। इन गतिवि​िधयों ने पहाड़ की जीवनचर्या को अस्त-व्यस्त कर दिया है। यह कैसा विकास है जहां होटल चलाने वाला हत्यारा हाे जाता है। क्या हम नृशंस, भयाक्रांत, अनैतिक और अमर्यादित देश नहीं बनते जा रहे हैं। क्या हम खतरनाक मोड़ पर तो नहीं खड़े हैं?