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निर्वाचन आयोग की साख पर सवाल !

गुजरात के कानून एवं शिक्षा मंत्री भूपेन्द्र सिंह चूडासमा का चुनाव गुजरात हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया है। 2011 को हुए  विधानसभा चुनावों में ढोलका सीट से उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी अश्विन राठौड को मात्र 327 वोटों से पराजित किया था। मतगणना के दौरान 429 पोस्टल बैलेट रद्द किए गए थे। जिस कारण चूडासमा जीत गए थे। अश्विन राठौड ने चूडासभा पर अनुचित तरीके से चुनाव जीतने का आरोप लगाते हुए उनके निर्वाचन को चुनौती दी थी। गुजरात हाईकोर्ट ने पोस्टल बैलेट रद्द करने के फैसले को असंवैधानिक करार देते हुए चूडासमा का निर्वाचन रद्द कर दिया है। इससे सवाल रिटर्निंग आफिसर पर तो उठ ही रहे हैं साथ ही चुनाव आयोग भी सवालों के घेरे में है। हाईकोर्ट ने इन तथ्यों को सही पाया कि चुनाव में नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए पोस्टल बैलेट की गिनती  पहले करने की बजाय आखिर में की गई। यही नहीं 1356 पोस्टल बैलेट में से कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में जाने वाली वोटों को रद्द कर ​दिया गया। रिटर्निंग आफिसर चुनाव के दौरान निर्वाचन आयोग के अधीन होता है, इस कारण आयोग अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। पूर्व में भी ऐसा कई बार देखा गया है कि जहां उम्मीदवार कम मतों के अंतर से आगे-पीछे होते हैं वहां ऐसा ही खेल कर सत्ता पक्ष के उम्मीदवार को ​जिता दिया जाता है।

देश के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने के लिए दांव-पेच खेल कर संस्थाओं का दुरुपयोग किया जाता है। अब सवाल यह है कि  क्या चुनाव आयोग लोकतंत्र को कमजोर करने के षड्यंत्र में शामिल था या नहीं या फिर इसकी जिम्मेदारी एक रिटर्निंग आफिसर पर डाली जाए?

विडम्बना यह है कि भारत में चुनाव आयोग की सत्ता को राजनीतिक दलों ने कमतर आंकने की कोशिश की। चुनावों में बाहुबलियों और आपराधिक तत्वों का प्रभुत्व बढ़ता चला गया। ऐसा क्यों हुआ यह गहन विश्लेषण का विषय है। बहुचर्चित पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टी.एन. शेषण से पहले तो चुनाव आयोग एक दंतविहीन संवैधानिक सत्ता थी। राजनीति में बहुत परिवर्तन आ चुका है। उसकी साख पर बार-बार बट्टा लगता रहा है। निर्वाचन आयोग की सत्ता में किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं आया है। इसके पास राजनीतिक दलों की आंतरिक लोकतांत्रिक  व्यवस्था से लेकर उनके सत्ता में पहुंचने के रास्ते चुनावों को पूरी तरह संविधान सम्मत, स्वतंत्र, निर्भीक, निडर और प्रलोभन मुक्त बनाने के अधिकार सुरक्षित हैं। निर्वाचन आयोग व्यक्तिगत और सामूहिक संगठनात्मक स्तर पर किसी भी व्यक्ति या राजनीतिक दल के विरुद्ध नियमों को तोड़ने के लिए कार्रवाई कर सकता है। हमारी संसदीय बहुदलीय चुनाव प्रणाली के तहत वोटों के आधार पर ही विजय सुनिश्चित होती है। लेकिन यदि वोटों की गणना में भी घपलेबाजी हो तो चुनावों को​ निष्पक्ष कैसे माना जा सकता है। इसे एक तरह से जनादेश चुराने का षड्यंत्र ही कहा जा सकता है, जैसे कि चूडासमा के चुनाव में हुआ।

निर्वाचन आयोग ने गुजरात हाईकोर्ट द्वारा चूडासमा का निर्वाचन रद्द करने के आदेश का अध्ययन करने के लिए तीन सदस्सीय समिति बनाई है। अमेरिका गए मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा ने चुनाव आयोग के महासचिव उमेश सिन्हा से बातचीत कर समिति बनाने का निर्णय किया है। समिति अपनी अध्ययन रिपोर्ट आयोग के सामने पेश करेगी।

चुनाव आयोग की कार्यशैली को लेकर कई बार मुद्दे उछाले गए, उस पर पक्षपात के आरोप भी लगे। आदर्श आचार संहिता के खुले उल्लंघन पर भी आयोग कई मामलों में खामोश रहा। क्या आयोग नहीं जानता कि राज्य सरकारें चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर प्रमुख पदों पर तैनात योग्य अधिकारियों का तबादला क्यों करता है। चुनाव शतरंज पर हाथी, घोड़े, प्यादे सब सैट कर दिए जाते हैं जो सत्ता के पक्ष में काम करते हैं। यह धारणा आम है कि चुनाव आयोग कार्यपालिका के दबाव में काम करता है। सत्ताधारी दल के पक्ष में निचले स्तर पर अधिकारियों की मिलीभगत आयोग के सामने बड़ी चुनौती है। आयोग के जनादेश और जनादेश का समर्थन करने वाली प्रक्रियाओं को और अधिक कानूनी समर्थन प्रदान करने की जरूरत है। मतदान और मतगणना के दौरान ईमानदारी से काम करने वाले लोगों की जरूरत है। वैसे भूपेन्द्र सिंह चूडासमा के पास हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने का अधिकार है, वह सुप्रीम कोर्ट जाएंगे भी। लेकिन हाईकोर्ट के फैसले से चुनावों की निष्पक्षता को लेकर जो संदेह का वातावरण सृजित हुआ है उससे निर्वाचन आयोग की साख जरूरत प्रभावित हुई है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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