गुजरात चुनाव से उठे सवाल ?


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भारत के चुनावी इतिहास का सर्वाधिक चर्चित और गहन राजनीतिक प्रतिद्वन्दिता का गुजरात विधानसभा का चुनाव प्रचार आज समाप्त हो गया। यह चुनाव भविष्य के इतिहासकारों के लिए इसलिए दर्ज करने वाला होगा कि इसके परिणामों में भारत की राजनीति की दिशा बदलने की अभूतपूर्व क्षमता छिपी हुई है। गुजरात के चुनाव परिणामों को केवल भारत के लोग ही नहीं बल्कि दुनिया के लोकतान्त्रिक देशों के लोग भी दिलचस्पी से इसलिए देख रहे हैं क्योंकि ये भारत की पिछले साढ़े तीन साल से चली आ रही राजनीति के पुट के तेवरों को भी बदलने की क्षमता रखते हैं। अतः ये साधारण चुनाव नहीं हैं और इन्हें केवल एक राज्य के चुनावों के दायरे में बन्द करके नहीं देखा जा सकता है। इन चुनावों में स्वयं प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी है तो दूसरी तरफ देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस ने भी राहुल गांधी को इनके परिणामों के आने से पहले अपना अध्यक्ष बनाकर अपनी समूची साख को दांव पर लगा दिया है। इसके बावजूद ये चुनाव इन दोनों नेताओं के बीच में नहीं हैं बल्कि दोनों द्वारा चुनाव प्रचार में रखे गये राजनीतिक विमर्श (एजेंडे) के बीच में हैं। निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि यह लड़ाई राष्ट्रवाद के उग्रवादी तेवरों और नव बाजारवाद के मानवतावादी तेवरों के बीच हो रही है। यही वजह है कि इन चुनावों को समग्र राजनीतिक दर्शन के आइने में देखा जा रहा है।

बिना शक इन चुनावों के केन्द्र में गुजरात का विकास का माडल रहा है जिसके आधार पर 2014 में भाजपा ने पूरे देश में विजय प्राप्त की थी और लोकसभा की 280 सीटें जीती थीं किन्तु आश्चर्यजनक यह रहा है कि गुजरात में भाजपा अपने इस विकास के माडल को हाशिये पर धकेलती सी दिखाई दी और इसके स्थान पर उसने कथित राष्ट्रवाद के उन बिन्दुओं पर ज्यादा जोर दिया जो मतदाताओं को धार्मिक-सांस्कृतिक आधार पर गोलबन्द करते हैं। यह भी कम हैरत की बात नहीं है कि कांग्रेस ने भी इस पक्ष को छूने में कोई गुरेज नहीं बरता किन्तु उसका जोर सामाजिक असमानता और अन्याय को दूर करने पर ज्यादा रहा। इसके साथ ही राहुल गांधी ने बाजारवाद की अर्थव्यवस्था में उत्पन्न आर्थिक विसंगतियों को केन्द्र में रखकर भाजपा सरकार की नीतियों को निशाने पर लेने में भी किसी प्रकार का संकोच नहीं किया। मसलन गुजरात में शिक्षा के व्यावसायीकरण से गरीब तबके के लोगों के जीवन में आयी विपन्नता को उन्होंने चुनावों में गांधीवादी नजरिये से पेश करने की कोशिश की। दूसरी तरफ श्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के महानायक सरदार पटेल का मुद्दा उठाकर उसे गुजराती अस्मिता से जोड़ने का प्रयास किया। इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस व उसके समर्थकों द्वारा अपने ऊपर किये गये व्यक्तिगत हमलों को मुद्दा बनाया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि श्री मोदी गुजरात के अस्तित्व में आने के बाद से सबसे लम्बे समय 12 वर्ष तक मुख्यमन्त्री रहे हैं परन्तु प्रधानमन्त्री बन जाने के बाद उनका कार्यक्षेत्र पूरा देश हो गया जिसका गुजरात भी एक हिस्सा है।

जाहिर तौर पर उनका रुतबा गुजरात में भी भारत के प्रधानमन्त्री का ही आंका जायेगा। राजनीतिक तौर पर यही वजह रही कि उन्होंने चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर विवादित विषयों को उठाने में ज्यादा जोर दिया। मसलन अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण के मामले को उठाकर उन्होंने राहुल गांधी व कांग्रेस को घेरना चाहा। इसके बावजूद उनकी कोशिश यह रही कि पूरा चुनाव व्यक्तित्व केन्द्रित हो सके जिससे गुजराती अस्मिता का स्रोत मतदाताओं को सराबोर कर सके। ऐसा नहीं है कि भारत में व्यक्तित्व केन्द्रित चुनाव नहीं हुए हैं। 1971 में स्व. इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव अपने व्यक्तित्व के बूते पर ही जीता था और 2014 में नरेन्द्र मोदी ने यही कमाल ठीक 44 साल बाद किया मगर दोनों के राजनीतिक विमर्श में मूलभूत अन्तर था। इन्दिरा जी समाजवाद के उद्घोष के साथ विजयी रही थीं और श्री मोदी राष्ट्रवाद के उद्घोष के साथ। कुछ लोग केरल को राजनीतिक प्रयोगशाला मानते हैं मगर हकीकत यह है कि वास्तव में गुजरात यह भूमिका मौन होकर निभाता रहा है क्योंकि इस राज्य की सामाजिक व आर्थिक बनावट भारत की उस ‘पंचमेल’ संस्कृति का आइना है जिसमें धर्म और अर्थ (पैसा) दोनों की महत्ता को लोग बखूबी पहचान कर उसे अपने जीवन में उतारते हैं। अतः इन चुनावों में गुजरात की धरती पर पुनः राजनीतिक प्रयोग हो रहा है। 1995 से इस राज्य में राष्ट्रवाद की धारा ने फूट कर पूरे देश को 2014 तक अपने आगोश में ले लिया था। इसके पहले 1975 में इसी गुजरात ने केन्द्र की इन्दिरा सरकार की समाजवादी विचारधारा को दरकिनार करके समतावादी विचारधारा को प्रश्रय दिया था। इन चुनावों में नव बाजारमूलक मानवतावादी विचारधारा 1995 से चली आ रही विचारधारा को चुनौती देने की मुद्रा में आकर खड़ी हो गई है। गुजरात के लोग जो भी फैसला करेंगे, उसका प्रभाव सर्वव्यापी हुए बिना नहीं रह सकता।