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राखी प्यार का त्यौहार

आज रक्षा बंधन है, भाई और बाहन के पवित्र प्यार का पर्व है। हमारा इतिहास गवाह है अगर एक बार किसी भी महिला ने एक पुरुष को भाई कह ​कर राखी बांध दी तो वह इस पवित्र रिश्ते में बंध जाता है और पूरी उम्र उसे निभाता है। यह एक धागे या मौली का त्यौहार था, जिसमें भाई राखी के बाद अपनी यथा शक्ति या प्यार से बहन को शगुन के तौर पर कुछ देता था और बहन बहुत खुशी-खुशी स्वीकार करती थी, परन्तु आज बदलते समय में जैसे हर बात में दिखावा बढ़ गया है। वैसे ही राखी में दिखावा देखनेे को मिल रहा है। आज उल्टा पहले महंगे से महंगे गिफ्ट लेकर आती हैं फिर भाई उसको महंगा शगुन या गिफ्ट देता है। यानी इस त्यौहार की पवित्रता महंगे गिफ्ट और शगुनों की तरफ जा रही है। मेरा तो एक इकलौता भाई है, परन्तु मेरे राखी भाई बहुत हैं, जिन्हें में सिर्फ सबको मौली धागा ही बांधती हूं और घर में सारा दिन रौनक लगी रहती है। बहुत ही पवित्र वातावरण होता है। मेरे भाई एक से एक बढ़कर हैं। यही नहीं हर साल ब्रह्मकुमारियों की तरफ से भी राखी का आयोजन होता है, वो हमेशा अश्विनी जी को राखी बांधने आती थीं और साथ में मुझे और अब अश्विनी जी के बाद मुझे राखी बांधने आती हैं। इस पवित्र रिश्ते को निभाना और एक बंधन की तरह सहज कर रखना एक संकल्प है जिस पर हम सभी को नाज है। इसी कड़ी में हमारे सैनिक भाइयों को जम्मू और कश्मीर में चाहे वे सीआरपीएफ, बीएसएफ या सेना के जवान हों उन्हें राखी की पूर्व संध्या पर बहनें राखियां बांधकर उनके सदा आगे बढ़ने की कामना करती हैं। ऐसी परम्पराएं हम सब के लिए गौरवशाली हैं।  

मेरा मानना है कि त्यौहारों की पवित्रता उसकी परम्परा के साथ जुड़ी है। उसे दिल से मनाना चाहिए और राखी की पवित्रता तो हमेशा ही होनी चाहिए। एक बार आपने किसी को भाई-बहन कह दिया  तो उस रिश्ते  को दिल से, भावना से ​निभाना चाहिए, क्योंकि रिश्ते बनाने आसान हैं, निभाने बड़े मुश्किल हैं। परन्तु आज जब मैंने अपना ही अखबार खोला तो उसके 5 नम्बर पृष्ठ पर बहुत ही भावनात्मक और सच्चे भाई-बहन की घटना मेरे सामने आई कि रोहतक निवासी राजन ने अपनी बहन प्रिया को किडनी दान कर उसकी जान बचाई। 31 वर्षीय प्रिया लम्बे समय से डायलिसिस पर थी। किडनी फेल होने के बाद जान जाने का खतरा बन गया था। तभी 28 साल के राजन ने एक किडनी अपनी बहन को दे दी, बिल्कुल इसी तरह का किस्सा लगभग 30 साल पहले भी मेरे सामने आया था। जालंधर की एक बहुत ही सभ्य संस्कारी महिला जो अपने पारिवारिक संबंधों की बहू थी, ने अपने जवान भाई को किडनी देकर जान बचाई थी, जिसमें उसके ससुराल वालों का भी बड़ा सहयोग रहा। उस महिला यानी इन्द्रजीत कग की में तो दिल से इज्जत करती हूं।

इन घटनाओं को देखकर लगता है अभी इस रिश्ते में जान बाकी है। भाई-बहन का पवित्र रिश्तें में अभी भी जान है। हां ठीक है दिखावट शो हो गया है, पर सच पूछो तो तरह-तरह की राखियां और गिफ्ट पैक से कई लोगों को रोजगार मिल रहा है। इस बार तो मैंने राखियां एमएसएमई के मैरीडियन फंक्शन पर एक स्पेशल बच्चों का स्टाल लगा था जो उन्होंने बच्चों ने खुद बनाई थीं, वो ही खरीदी हैं। पवित्र राखियों में उन बच्चों की कला, उनकी जरूरत छुपी है। ऐसे ही बहुत सी संस्थाएं हैं जो राखियां बनाती हैं, जिसका पैसा एनजीओ या जरूरतमंदों के लिए इस्तेमाल होता है, तो मैंने निश्चिय कर लिया या तो सिर्फ मौली की राखी होगी या ऐसी संस्था से होगी जो भाई-बहन के रिश्तों की ओर भी प्यार और पवित्रता से बांधेगी। मेरा मानना है कि पुरानी परम्पराएं जरूर जीवित रहनी चाहिए। यहीं से भारतीयता और हमारे संस्कारों पर आधारित संस्कृति आगे बढ़ती है, जिस पर हर भारतीय को नाज है।