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रामलीलाएं!

आज दिल्ली के कोने-कोने में छोटी-बड़ी रामलीलाएं शुरू हो रही हैं या यूं कह लो कि देश के हर कोने, मुहल्ले में रामलीलाएं शुरू हो रही हैं। मुझे भी दिल्ली की कई बड़ी रामलीलाओं का निमंत्रण है। मैं अक्सर हर साल कई रामलीलाओं में जाती हूं अगर मैं जा सकती हूं। दिल्ली की बहुत सी रामलीलाएं बहुत मशहूर हैं जैसे लवकुश, लालकिला मैदान, सुभाष मैदान, अशोक विहार की प्रसिद्ध रामलीला, लवश्री धार्मिक कमेटी गांधी मैदान, पीतमपुरा आदि। इस बार गुजरांवाला टाऊन भी बहुत से फिल्मी एक्टरों को लेकर मैदान में उतर रही है। 

मैं अक्सर यही कहती हूं कि हमारी भारतीय संस्कृति अगर जीवित है तो कुछ त्यौहारों और रामलीलाओं के कारण है, जो हमारे देश की धार्मिक संस्कृति को आने वाली पीढ़ी को दर्शाती हैं। इससे बहुत से लोगों को कमाई होती है जैसे टैंट, लाइट, स्टाल लगाने वाले, झूले लगाने वाले, छोटी-छोटी दुकानें सजाने वाले आदि और आम लोगों का एक संस्कारी मनोरंजन  का साधन भी है। घर से अच्छे कपड़े पहन कर अपने परिवार, बच्चों के साथ इस तनाव भरी जिन्दगी में परिवर्तन भी होता है। चारों तरफ त्यौहार का माहौल होता है। कई कलाकारों को भी अवसर प्रदान होता है। मुझे आज भी याद है जब टीवी में रामानंद सागर की रामायण शुरू हुई थी तो लोगों को इतना क्रेज था कि उस समय सड़कें खाली होती थीं, घर की गृहणियां अपना काम निपटा लेती थीं और सारा परिवार टीवी के साथ चिपक कर रामायण देखता था। 

शुरू में लोग खुद उत्साहित होकर रामलीला करते थे। कुछ घरों के बच्चे भी इकट्ठे होकर करते थे, परन्तु आजकल तो इसे पेशेवर कलाकार करते हैं। समय के साथ-साथ सब कुछ बदल रहा है। आज का माहौल देखते हुए लग रहा है कि आज रामलीलाओं का असर आम जनमानस पर कम हो रहा है। राम-लक्ष्मण जैसे बेटों की कमी आ रही है। दशरथ जैसे ​पिता की कमी आ रही है। राम-लक्ष्मण जैसे भाई तो बहुत कम नजर आएंगे। हनुमान जैसे भक्त की कमी आ रही है, जो अपने स्वामी के लिए कुछ भी कर सके। आज रामलीला ज्यादा से ज्यादा पैसे खर्च करने वाला शो हो गया है। अभी कुछ दिन पहले एक बिल्डर से मुलाकात हुई। शायद वो रामलीला का निमंत्रण देने आए थे। 

जब मैंने पूछा कि कैसे रामलीला करते हो तो उन्होंने कहा- सब लोगों से पैसा इकट्ठा करके और उसमें हम जैसे को ही पकड़ा जाता है। हम हरेक का शिकार हैं। अगर टैक्स देना हो तो हमारे जैसे, अगर चंदा इकट्ठा करना हो तो हमारे जैसे, कुछ स्पोंसर करना हो तो हमारे जैसे, हमसे सभी उम्मीद रखते हैं। यही नहीं पीतमपुरा की मशहूर रामलीला में जब लोग आमं​त्रित करने आए तो मैंने पूछा कि आपकी शानदार रामलीला का राज क्या है तो उन्होंने बताया कि 50 लाख टैंट का खर्च, बाकी और खर्चे जैसे आर्टिस्ट बुलाने का, बड़े लोगों को बुलाने का तो मैंने कहा कि इतना खर्च करते हो, इसमें से एक थोड़ा सा गरीबों की सहायता या बुजुर्गों की सहायता का भी कोना बना लो तो उन्होंने बहुत अच्छे से हामी भरी, परन्तु आज भी मुझे उनके द्वारा इस तुच्छ से कार्य का इंतजार है। 

सो यूं लगता है यह सिर्फ शो ऑफ और एंटरटेनमैंट या अपने आप को आगे लाने का ही एक ढंग रह गया है, न रामलीला से कुछ कोई सीख रहा है। रामलीला वैसी होनी चाहिए जहां लोग कुछ सीखने, अपनाने को जाएं, अपनी भारतीय संस्कृति को समझें। यदि हर व्यक्ति अपने-अपने धर्म और भारतीय संस्कृति को समझ ले और अपना ले तो सबमें शांति-सद्भाव मजबूत होगा। क्योंकि लोग धर्म से भटक रहे हैं, धर्म का ठीक से पालन करते हुए स्वयं को पहचानना ही समाज के प्रत्येक इंसान की पहली जिम्मेदारी है। जैसे हिन्दू धर्म में भारतीय संस्कृति का संदेश छिपा है। सिख धर्म में एक आैंकार, सतनाम, गुरुबाणी भी एक ईश्वर का संदेश देती है, जैन धर्म जीओ और जीने दो, परोपकार करो का संदेश देता है, कुरान शरीफ शांति-सद्भाव का संदेश देती है। 

ब्रह्मकुमारी कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के पास देने के लिए कुछ न कुछ है, व्यक्ति को सबसे सीखने के लिए मिलजुल कर आत्मस्वरूप को जानना चाहिए। ऐसे ही रामलीलाएं भी वही जो लोगों के ​दिलों को छू जाएं और उन्हें कुछ करने के लिए प्रेरित करें, जिससे दर्शक अपनी संस्कृति और धार्मिक परम्परा को याद करें। जैसे पिछले दिनों एकल द्वारा भागवत यज्ञ का आयोजन हुआ, उसमें भारतीय संस्कृति, रीति-रिवाजों का मिश्रण देखने को मिला। सभी लोगों ने शगुनों के साथ बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। मैंने भी उनकी क्लश यात्रा में बड़े मन से हिस्सा लिया। क्योंकि किसी भी शुभ काम घर प्रवेश, व्यापार या अन्य शुभ कार्य का आरम्भ कलश यात्रा से होता  है तो इसकी महत्ता को जानते हुए मैंने इसमें हिस्सा लिया। वहां एक-एक के चेहरे पर भक्ति भाव, भारतीय संस्कृति देखी। 

सबसे बड़ी बात तो देखी कि आयोजकों ने ऐसी सुन्दर व्यवस्था की कि सब दिन नया उत्साह था और जाे सबसे अच्छी मुझे बात लगी कि वहां लोगों ने खुलकर एकल विद्यालयों के लिए राशि इकट्ठी की। सूत्रों के अनुसार लगभग 60, 65 करोड़ रुपया इस पुण्य काम के लिए एकत्र हुआ, जो देश की नींव को मजबूत करेगा और मोदी जी के साथ वायदा कि इस वर्ष तक 1 लाख एकल विद्यालय को भी पूरा करेगा। मैं भी एकल विद्यालय की सलाहकार समिति में हूं तो इस काम को जानती हूं कि कितनी जरूरत है। 

सो वैसे ही मैं देश की हर रामलीला के आयोजकों से प्रार्थना करती हूं कि रामलीला भक्ति भाव, संस्कृति और सेवा के रूप में होनी चाहिए। रामलीला अगर एकल की तरह कुछ धनराशि जरूरतमंदों के लिए एकत्रित करे तो रामलीला का आयोजन सफल होगा। मुझे दिल्ली की करीबन सभी रामलीलाओं से आमंत्रण है। कोशिश होगी ​जहां जा सकूंगी जरूर जाऊंगी, परन्तु जो रामलीला साथ में सामाजिक काम के लिए प्रेरित करे, वहां तो अवश्य जाऊंगी।