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कश्मीर मे फिर मजहबी खून!

यह कैसी विडम्बना है कि जिस स्वतन्त्र भारत का पहला प्रधानमन्त्री स्वयं कश्मीरी ब्राह्मण हो और जिसके नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर रियासत का भारतीय संघ में विलय हुआ हो, आज उसी कश्मीर में पंडितों की चुन-चुन कर फिर से हत्या की जा रही है। यह सनद रहनी चाहिए कि कश्मीरी संस्कृति भारतीयता की वह अविरल धारा है जिसे किसी भी कालखंड में कोई आक्रान्ता नहीं तोड़ पाया। भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का सबसे जीता जागता नमूना कश्मीर में ही नमूदार होता है क्योंकि यहां की संस्कृति मूल रूप से सकल मानवतावाद की पैरोकारी करती है। इसका उदाहरण इस राज्य में बिखरे वे हिन्दू तीर्थ व पूजा स्थल हैं जिनकी सुरक्षा मुसलमान नागरिक सदियों से करते आ रहे हैं परन्तु नामुराद पाकिस्तान ने जब से इस राज्य में आतंकवाद काे पनपाया है तब से इस प्रदेश विशेषकर घाटी में मजहबी नफरत की बेल फैलने लगी और लोगों की पहचान हिन्दू व मुसलमान देखकर होने लगी जबकि मूलतः ये सभी लोग कश्मीरी हैं। अपनी इसी कश्मीरियत का झंडा बुलन्द करते हुए श्रीनगर के मक्खनलाल बिन्दरू ने तब भी घाटी को नहीं छोड़ा जब 1990 में कश्मीरी पंडितों का तलवार के साये  और मजहबी तास्सुब की नफरत में घाटी छोड़ने को मजबूर किया गया था और एक लाख से अधिक कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बना दिये गये थे। ये शेरदिल इंसान मक्खनलाल तब भी अपनी कदीमी दवा की दूकान खोल कर सभी लोगों की सेवा किया करता था परन्तु मंगलवार को आतंकवादियों ने उनकी हत्या कर दी और बुजदिली का पुनः प्रमाण देते हुए कश्मीर की सामाजिक समरसता को भंग करने का प्रयास किया। वास्तव में पाक परस्त आतंकवादियों ने श्री मक्खनलाल की हत्या करके हिन्द को हुकूमत को चुनौती दी है कि धारा 370 को समाप्त करने के बावजूद वे अपने कातिलाना इरादे नहीं छोड़ेंगे।

 केन्द्र की सरकार को इस घटना का संज्ञान लेते हुए आतंकवादियों को ऐसा सबक सिखाना होगा कि आने वाले समय में कोई भी दहशतगर्द तंजीम किसी निरीह नागरिक को निशाना न बना सके।  5 अगस्त 2019 को कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त होने के बाद लगातार यह बात उठती रही है कि घाटी से उजाड़े गये कश्मीरी पंडितों और हिन्दू व सिखों को पुनः वहां बसाया जाये। यह बात दहशतगर्दों से हजम नहीं हो रही है और वह बीच-बीच में अपनी नापाक हरकतों से लोगों में डर फैलाने का काम करते रहते हैं। ऐसी तंजीमों को पाकिस्तान का खुला समर्थन मिला हुआ है जिससे कश्मीर में उसके जेहादी मंसूबे कामयाब हो सकें। मगर जम्मू-कश्मीर भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान की वह कसौटी है जिसे पूरी दुनिया देख कर कह सकती है। भारत एक एेसा गणराज्य है जिसमें धर्म के आधार पर नागरिकों की पहचान नहीं होती है। मुस्लिम बहुल होने के बावजूद जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है जो कि पाकिस्तान के मुंह पर करारे तमाचे की तरह हर समय बजता रहता है। यही वजह है कि इस्लाम के नाम पर बना पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में हिन्दू-मुसलमान के नाम पर जहर के बीज बोना चाहता है। इससे बड़ा और क्या धर्मनिरपेक्षता का पैगाम होगा कि खुद अक्तूबर 1947 में मुस्लिम बहुल रियासत जम्मू-कश्मीर का भारतीय संघ में विलय हुआ था।

 बेशक यह विलय रियासत के तत्कालीन राजा हरिसिंह ने किया था मगर पुख्ता इतिहास यह भी है कि इस विलय पत्र पर पं. नेहरू ने तब रियासत के सबसे लोकप्रिय जन नेता शेख मुहम्मद अब्दुल्ला के भी दस्तखत कराये थे और हकीकत यह भी है कि शेख स्वयं पाकिस्तान के निर्माण के सख्त खिलाफ थे। अतः पाकिस्तान की छाती पर हमेशा कश्मीर अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि के साथ मूंग दलता रहता है। मैं आजादी के बाद के जम्मू-कश्मीर में हुए राजनीतिक घटनाक्रम पर नहीं जा रहा हूं बल्कि केवल इतना कहना चाहता हूं कि जम्मू-कश्मीर केवल अपनी नैसर्गिक सुन्दरता की वजह से ही भारत का मुकुट नहीं है बल्कि संविधान की समग्रता के दायरे में भी यह इसके सर्वोच्च सिद्धान्त का शिखर प्रतीक है। मक्खनलाल बिन्दरू की हत्या से पाकिस्तान के टुकड़ों पर पलने वाले आतंकवादी इस प्रदेश की अन्तरआत्मा को नष्ट नहीं कर सकते क्योंकि यह अन्तरआत्मा पीर-फकीर और ऋषियों के रक्त से संवाहित होती है। आतंकवादियों ने श्रीनगर में ही एक गोलगप्पे बेचने वाले बिहारी नागरिक की भी हत्या की और एक मुस्लिम नागरिक को भी अपना निशाना बनाया। इसका मतलब यही निकलता है कि पाकिस्तान प्रेरित आतंकवादी भारत की उस समन्वित शक्ति से खौफ खाते हैं जो इसकी सड़कों पर उजागर होती है। ये आतंकवादी भोले-भाले कश्मीरियों में जेहादी उन्माद फैलाने के चक्कर में भूल जाते हैं कि आम कश्मीरी अब तरक्की की उस सीढ़ी की तरफ चढ़ रहा है जिसका प्रवाधान भारतीय संविधान में हर प्रदेश के नागरिक के लिए किया गया है। मक्खनलाल बिन्दरू का खून पूरे राज्य में सामाजिक सद्भाव को और बढ़ाने का काम इस तरह करेगा कि हर मुसलमान नागरिक किसी भी हिन्दू नागरिक का पहला प्रहरी बन कर आगे आयेगा। यही भारतीय संस्कृति का मूल विचार है।