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संपादकीय

चुनावी बाजी में आरक्षण

आगामी लोकसभा चुनावों में हार-जीत के लिए ताश के पत्तों की बाजी जिस तरह लगाई जा रही है उसका अन्दाजा फिलहाल लगाना इसलिए मुश्किल है क्योंकि ऐसा लग रहा है कि इन चुनावों में आम जनता को प्रभावित करने के लिए उन स्रोतों का भी बखूबी इस्तेमाल होने जा रहा है जो राजनीति से परे माने जाते हैं। इनमें से कुछ का मुजाहिरा तो हम देख ही रहे हैं। अभी तो बात सिर्फ उन पत्तों की हो रही है जो बाजी लगने पर सत्ता और विपक्ष के हाथ में आये हैं मगर बहुत जल्दी ही नहले और दहले का खेल खत्म होकर गुलाम-बेगम-बादशाह तक आ जायेगा और चुनाव वही पार्टी जीतेगी जिसके हाथ में इक्का होगा।

निश्चित रूप से यह चुनाव आखिरी बाजी में मुख्य रूप से भाजपा व कांग्रेस पार्टी के बीच ही होगा। इसी क्रम में आज मोदी सरकार ने आर्थिक निर्बलता के आधार पर दस प्रतिशत आरक्षण देने का जो फैसला किया है वह निश्चित रूप से साहिसक कदम है। देशभर की सवर्ण जातियां आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करती आ रही हैं। भारतीय संविधान में आरक्षण का आधार आर्थिक निर्बलता न होकर सामाजिक भेदभाव व शैक्षणिक पिछड़ापन है। संविधान​ निर्माता बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने हरिजन समाज की जातियों को सूचीबद्ध करके जिस आरक्षण की व्यवस्था की थी वह पूरी तरह से इस समाज के साथ हिन्दू समाज के भीतर सदियों से चले आ रहे पशुवत व्यवहार की तरह था।

यह व्यवहार इतना क्रूर था कि दलित समाज के लोगों को मानवीय अधिकारों से पूरी तरह वंचित रखता था और उन्हें पशु से भी बदतर तीसरे पायदान पर खड़ा करता था। इसी प्रकार संविधान सभा के सदस्य कैप्टन जयपाल सिंह ने आदिवासियों का मामला उठाया था और उनके लिए भी आरक्षण की व्यवस्था करवाई थी। इन तबकों को आरक्षण इसलिए नहीं दिया गया था कि वे आर्थिक रूप से भी सबसे निचले पायदान पर खड़े थे बल्कि इसलिए दिया गया था कि वे हिन्दू समाज के अंग होकर भी उसकी खींची हुई उन लकीरों से बाहर थे जो मनुष्य की जाति देखकर उसके मनुष्य होने का निर्धारण करती थी। यह आरक्षण मुनष्य को मनुष्य का दर्जा देकर मानवीयता का सम्मान स्थापित करने के लिए स्वतन्त्र भारत में किया गया था जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की कांग्रेस पार्टी का अन्ध समर्थन था क्योंकि समाज में छूआछूत का उन्मूलन सिर्फ इसी रास्ते से हो सकता था।

इसके साथ ही संविधान में यह व्यवस्था भी की गई कि सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन को समाप्त करने के लिए भी सरकार ऐसे प्रावधान कर सकती है जिससे वे लोग पिछड़ेपन से उबर सकें जो सामाजिक परिस्थितियों के चलते इसी अवस्था में बने रहने को मजबूर हैं। इसी के आधार पर कई पिछड़ा वर्ग आयोगों का गठन समय-समय पर हुआ और अंत में मंडल आयोग की रिपोर्ट 1989 में लागू की गई। बिना शक पिछड़ी जातियों के अधिसंख्य लोग भी आर्थिक रूप से कमजोर ही थे। यह भी सच है कि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के बच्चों को न शिक्षा में, न नौकरी में कहीं आरक्षण नहीं मिल रहा लेकिन अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण को लागू करने के लिए क्या संविधान को बदला जा सकता है? इसके साथ ही यह सवाल जुड़ा हुआ है कि आरक्षण को लागू करने के दो-दो पैमाने किस प्रकार बनाये जा सकते हैं? यदि आर्थिक आधार को स्वीकार करते हैं तो सामाजिक आधार का क्या होगा और शैक्षणिक पिछड़ेपन का क्या होगा? आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को अगर आरक्षण दिया जाता है तो यह एक अच्छी बात होगी।

उन्हें भी समाज में अपनी जगह बनाने में मदद मिलेगी। जाहिर है इसके लिए संविधान में आमूलचूल आधारभूत परिवर्तन करना होगा। यह कार्य संविधान संशोधन के माध्यम से ही किया जा सकता है और इसके लिए कम से कम छह माह का समय लगेगा क्योंकि संसद को दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत के साथ ही एेसे संशोधन को देश की कम से कम 50 प्रतिशत विधानसभाओं में भी पारित करना पड़ेगा। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय फैसला दे चुका है कि आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता और फिलहाल यह इस सीमा तक पहुंच चुका है परन्तु देखना यह है कि इस फैसले पर अनुसूचित जातियों व पिछड़े वर्गों की क्या प्रतिक्रिया रहती है।