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संपादकीय

लोकतन्त्र में उठते-गिरते सवाल?

लोकतन्त्र की पहली शर्त यह होती है कि यह सत्ता की जवाबदेही तय करते हुए विपक्ष को अधिकार देता है कि वह हर मसले की बाल की खाल इस तरह निकाले कि कुछ भी बेपर्दा न रहे। लोकतन्त्र इसीलिए लोकलज्जा से चलने वाली प्रणाली कही जाती है कि जनता ने जिन लोगों को बहुमत देकर शासन करने का अधिकार दिया था वे उन्हीं लोगों को एक-एक पाई का पूरा नकद हिसाब-किताब दें जिन्होंने उन्हें शासन करने की लियाकत बख्शी थी। कोई भी चुनाव विपक्ष और सामान्य मतदाता को यह हक देता है कि वह हुकूमत की कुर्सियों पर बैठे लोगों से जमकर जवाब-तलबी करे और उनके कामकाज का हिसाब-किताब ले और इस तरह ले कि वे कोई भी बहाना बनाकर बच कर न निकल सकें।

जायज सवाल यह बनता है कि भारत कितने अध्यापकों को अब तक विदेश में भेजने में सफलता प्राप्त कर सका है? जायज सवाल यह बनता है कि भारत अब तक कितनी शीतल पेय कम्पनियों को इस बात के लिए राजी कर सका है कि उनकी बोतलों में बन्द ड्रिंक्स में फलाें का कितना रस है जिसका वादा पिछले लोकसभा चुनावों में किया गया था। कितने किसानों के खेतों की मेढ़ पर ऐसे पेड़ लगाये जा चुके हैं जिनके बड़ा होने पर उनकी लकड़ी काट कर वे अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं? नौकरियों का मतलब सुनिश्चित भविष्य के रोजगार से होता है, फड़ लगाकर सामान बेचने से नहीं। इसके लिए किसी सरकार की जरूरत नहीं होती।

यह काम तो जिन्दगी चलने के साथ खुद ही होता रहता है मगर ये सवाल ऐसे नहीं हैं जिनका सामना मौजूदा सरकार को ही चुनावी मौसम में करना पड़ेगा बल्कि पिछले हर चुनावों में विपक्ष ठीक ऐसे ही सवाल सत्ताधारी दल से पूछता आ रहा है। इन सवालों के सही जवाब से ही पता चलता है कि देश ने तरक्की का कितना सफर तय किया है। ये ही एकमात्र पैमाना है जिससे किसी भी सरकार की सफलता या असफलता की सनद जनता खुद लिखती है। असली लोकतन्त्र वही होता है जिसमें बहुमत की जोर-जबर्दस्ती न चलकर अल्पमस्त की भावनाओं का आदर किया जाता है और पूरे देश की एकता को माला में पिरोये गये धागों की तरह मजबूत रखा जाता है।

अहमदाबाद में कांग्रेस महासचिव श्रीमती प्रियंका गांधी ने सिर्फ इतना ही कहा है कि इस देश को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी हम सबकी है जिसे सिर्फ नफरत समाप्त करके ही किया जा सकता है। इस देश के लोगों में ही यदि आपस में नफरत फैलाने की राजनीति को किसी भी वाद या सिद्धान्त के नाम पर फैलाने की कोशिश की जायेगी तो इसका नतीजा सिर्फ देश का कमजोर होना ही निकलेगा। इसलिए चुनावों में वे मुद्दे उठाये जायें जिनका आम लोगों की जिन्दगी से सरोकार है मगर ऐसे किसी भी सवाल का जवाब व्यक्तिगत हमला या निजी निन्दा नहीं हो सकता। राजनीति में निजी हमला वे लोग ही करते हैं जिनके पास कोई सैद्धान्तिक तर्क या माकूल जवाब नहीं होता।

मुझे अच्छी तरह याद है कि 1971 के लोकसभा चुनावों में जब श्रीमती इन्दिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी को तोड़कर अपनी अलग नई कांग्रेस पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा था तो विपक्षी पार्टियां उन पर ही यह कहकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने लगी थीं कि उन्होंने अपने बेटे स्व. संजय गांधी को मारुति कार बनाने की फैक्टरी लगाने का लाइसेंस दे दिया था। तब यह नारा भाजपा ने अपने पोस्टर निकाल कर चस्पा किया था कि ‘बेटा कार बनाता है-मां बेकार बनाती है’ परन्तु विपक्ष भूल गया था कि इंदिरा जी किसकी बेटी थीं और उनका पालन-पोषण किन परिस्थितियों और किन हालात में हुआ था। राष्ट्रभक्ति और सर्वस्व न्यौछावर करने की परंपरा में पली इंदिरा गांधी के वंशजों पर भी एेसे आरोप लगाने वाले भूल रहे हैं कि संस्कार किसे कहते हैं?

लोगों ने विपक्ष के इस आरोप को हवा मंे उड़ाते हुए विपक्षी नेताओं की जमानतें जब्त करा दी थीं। अतः मौजूदा राजनीतिक हालात में विपक्ष की तरफ से यदि सत्तारूढ़ दल के नेताओं पर हुकूमत में रहते हुए बेइमानी या अमानत में खयानत करने के आरोप लगाये जा रहे हैं तो उसका उत्तर व्यक्तिगत आरोप नहीं हो सकता। क्योंकि इस देश के लोग इतने बुद्धिमान तो हैं कि वे समझ सकें कि इस तरह के जवाबी हमले क्यों किये जा रहे हैं और उनका लक्ष्य क्या है? चुनाव आचार संहिता लगने का मतलब यह कतई नहीं है कि विपक्ष सरकार से उन सवालों का जवाब मांगना छोड़ दे। लोकतन्त्र इस मानसिकता का तिरस्कार इस तरह करता है कि ऐसे ही सवालों को केन्द्र में लाकर लोगों को राजनीतिक रूप से जागरूक बना देता है। इन सवालों को उठने से चुनाव आयोग किस तरह रोक सकता है जबकि उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी प्रत्येक राजनैतिक दल को एक समान व बराबरी का वातावरण देने की है।