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संपादकीय

एनआरसी पर घमासान

असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की अंतिम सूची जारी होने के बाद इस पर घमासान जरूरी है। इस सूची से 19 लाख से ज्यादा लोगों को बाहर कर दिया गया है। इससे पहले पिछले वर्ष 30 जुलाई को जारी की गई एनआरसी रिपोर्ट में 40 लाख लोग सूची से बाहर किये गये थे। हंगामा मचने पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम सूची तैयार करने की कवायद अपनी निगरानी में कराने का फैसला किया था और सूची से बाहर रखे हुये सभी लोगों को खुद को भारतीय नागरिक साबित करने का मौका दिया गया। अब सवाल यह है कि क्या एनआरसी की अंतिम सूची जारी होने के बाद अवैध घुसपैठियों का मुद्दा समाप्त हो गया है। 

क्या अंततः उन्हें देश से बाहर खदेड़ दिया जायेगा? सवाल यह भी है कि क्या असम में बहुत बड़ा मानवीय संकट तो खड़ा नहीं हो जायेगा? यद्यपि राज्य सरकार और मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने लोगों को आश्वस्त किया है कि जिन लोगों के नाम अंतिम सूची में नहीं हैं उन्हें डिटेन्शन कैम्प में नहीं भेजा जायेगा और न ही उन्हें तुरंत विदेशी घोषित किया जायेगा। ऐसे लोग 120 दिनों के भीतर विदेशी ट्रिब्यूनल में अपील कर सकते हैं। हो सकता है सूची से बाहर हुये लोग विदेशी ट्रिब्यूनल से लेकर ऊंची अदालतों तक लम्बी लड़ाई लड़ें लेकिन रोजाना कमाकर अपना पेट पालने वाले लोग क्या अदालतों में लम्बी लड़ाई जारी रख पायेंगे? 19 लाख लोगों को बाहर करना एक बड़ी चुनौती है। 

बांग्लादेश भी इन्हें स्वीकार नहीं करेगा। सवाल यह भी है कि क्या इतने लोगों को डिटेन्शन कैम्पों में रखना आत्मघाती नहीं होगा? केन्द्र और राज्य सरकार के लिये अवैध घोषित किये गये नागरिकों के मुद्दे से निपटना आसान नहीं होगा। इस मुद्दे पर अब सियासत भी होने लगी है। असम भाजपा भी एनआरसी की अंतिम सूची से खुश नहीं है। उसे अवैध नागरिकों की संख्या 40 लाख से घट कर 19 लाख हो जाने पर हैरानी हुई है। असम स्टूडेंट यूनियन भी नाखुश है और वह इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट ले जाने को तैयार है। सरकार में शामिल असम गण परिषद ने भी इस सूची पर कई सवाल उठा दिये हैं। कुल मिलाकर अंतिम सूची से हर वर्ग नाराज है। भाजपा लगातार घुसपैठियों को बाहर करने की बात कहती है और उसके नेताओं का कहना है कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है।

काश ! देश की पूर्व की सरकारों ने वोट बैंक की सियासत नहीं की होती तो शायद यह चुनौती पैदा ही नहीं होती। असम की जातीय हिंसा की जड़ें काफी गहरी हैं। दंगों की आग में असम कई बार जला। 1979 में जब असम से बंगलादेशियों को खदेड़ने के लिये असम गण परिषद और असम स्टूडेंट यूनियन ने आंदोलन शुरू किया था, तभी कांग्रेस इस मुद्दे को गंभीरता से लेती तो आज यह स्थिति आती ही नहीं। यह आंदोलन 6 वर्ष तक चला। शुरूआत के समय असम आंदोलन को मुस्लिम खदेड़ो आंदोलन ही समझा गया। कांग्रेस अपने वोट बैंक के चलते राज्य में एक भी बंगलादेशी न रहने देने की बात करती रही। 1991 में असम विधानसभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया ने यह स्वीकार किया था कि राज्य में 30 लाख से अधिक बंगलादेशी रहते हैं। 

जब मुस्लिम नेताओं ने उन्हें गद्दी से उतारने की धमकी दी तो सैकिया अपने बयान से पलट गये। असम में आंदोलन करने वालों के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1985 में समझौता किया। असम समझौते के बाद नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन कर एक जनवरी 1966 से पहले असम में आये बंगलादेशियों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया गया जबकि 25 मार्च 1971 के बाद आये बंगलादेशियों को विदेशी मानकर वापिस भेजने का प्रावधान किया गया था। कांग्रेस द्वारा 1983 में लागू किए गए विवादित आईएमडीटी एक्ट से भी घुसपैठियों को बाहर करना मुश्किल हो गया था। यह कानून मुसलमानों को परेशानी से बचाने के लिये लाया गया था। 

इस एक्ट में प्रावधान था कि शिकायत करने वाले व्यक्ति को ही यह प्रमाणित करना पड़ेगा कि वह जिस पर आरोप लगा रहा है वह बंगलादेशी है। इसके चलते कोई शिकायत लेकर आता ही नहीं था। 1985 से लेकर 2019 तक कितने ही बंगलादेशी पूरे देशभर में फैल गये होंगे, किस-किस राज्य में बस गये होंगे, इसका कोई निश्चित अनुमान लगाया ही नहीं जा सकता। 1951 से 2001 के बीच असम की मुस्लिम जनसंख्या में 6 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई और हिन्दुओं की जनसंख्या में 7 फीसदी गिरावट आई। 2011 की जनगणना से भी पता चलता है कि राज्य के कई क्षेत्र मुस्लिम बहुल हो गये। 

धुब्री, मोरीगांव, ग्वालपाड़ा, बारपेटा, नौगांव की जनसंख्या में 20-24 फीसदी की भारी बढ़ाैतरी हुई। बंगलादेशी घुसपैठिये राज्य के संसाधनों पर कब्जा करते रहे और मूल निवासी अल्पसंख्यक होते गये। यही नहीं असम को मुस्लिम बहुल राज्य बनाने के षड्यन्त्र भी सामने आ चुके हैं। अवैध बंगलादेशियों के प्रवाह से असम की आबादी का  स्वरूप बदल चुका है। एनआरसी की अंतिम सूची आने के बाद स्थितियां क्या बनती हैं, इसे अभी देखना होगा।