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जाधवपुर में ‘सुप्रियो’ पर बवाल

प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच चल रही राजनीति लोकतन्त्र की सुपरिभाषित मर्यादाओं को न केवल भंग कर रही है बल्कि ऐसी परंपरा भी स्थापित कर रही है जिसमें असहमति और मतभेद को अस्वीकृत करने की घृष्टता छिपी हुई है। किसी भी लोकतन्त्र की शक्ति मतभिन्नता और असहमति के लिए ‘सर्वसम्मत सहमति’ ही होती है। लोकतन्त्र की बुनियाद इसी ‘असहमति’ का सम्मान करना ही होता है और उसे खत्म करने का प्रयास जनतन्त्र में व्यक्ति या नागरिक अथवा मतदाता को अधिकारविहीन और सम्मान रहित बनाना ही होता है। 

अतः प. बंगाल के कोलकाता में स्थित ‘जाधवपुर विश्वविद्यालय’ में केन्द्रीय राज्य मन्त्री बाबुल सुप्रियो के साथ वहां मौजूद कुछ छात्रों ने जिस प्रकार का अभद्र व्यवहार किया है और उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा बुलाये गये समारोह में बोलने से रोका है, उसकी घनघोर निन्दा की जानी चाहिए। विश्वविद्यालय लोकतन्त्र की भी प्रयोगशाला होते हैं जिनसे होनहार राजनीतिज्ञ बाहर निकलते हैं। मगर दूसरी तरफ यह भी हकीकत है कि भारत की संघीय व्यवस्था में केन्द्रीय मन्त्री से लेकर राज्य स्तर के मन्त्री और राष्ट्रपति से लेकर राज्यपाल तक के लिए ऐसी लोकाचार व शिष्टाचार प्रणाली व नियमावली स्थापित है जिस पर आचरण करके ही चुने हुए प्रतिनिधियों से लेकर संवैधानिक पदों पर आसीन  व्यक्तियों की गरिमा का संरक्षण हमारी बहुदलीय राजनैतिक प्रशासनिक प्रणाली में बहुत करीने और अनुशासन के साथ होता है। 

मगर जाधवपुर विश्वविद्यालय में हुई घटना ने इस सुस्थापित प्रणाली को भी तार-तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। विद्यार्थी परिषद के समारोह का निमन्त्रण स्वीकार करने के तुरन्त बाद श्री सुप्रियो को विश्वविद्यालय अधिकारियों व राज्य सरकार को सूचित करना चाहिए था। संभवतः उन्होंने इसका पालन करना जरूरी नहीं समझा। यदि उन्होंने यह किया होता तो विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी सुरक्षा के पुख्ता इन्तजाम करने के लिए बाध्य होता। यह कोई साधारण घटना नहीं है कि एक केन्द्रीय मन्त्री को लगातार पांच घंटे तक विश्वविद्यालय परिसर में ही विरोध का सामना करना पड़े और वह प्रदर्शन करते छात्रों से इस तरह उलझा रहे कि दोनों तरफ से दुर्व्यवहार करने के आरोप-प्रत्यारोप लगाये जायें। 

साथ ही एक मन्त्री को परिसर से सुरक्षित बाहर निकालने के लिए उस राज्य का राज्यपाल ही स्वयं वहां पहुंच जाये। राज्यपाल ओ.पी. धनखड़ विश्वविद्यालय में पदेन कुलाधिपति होने की वजह से वहां गये परन्तु ऐसा करते समय क्या उन्होंने स्थापित नियमावली और शिष्टाचार का पालन किया। इस पर भी विवाद पैदा हो गया है। राज्य में चुनी हुई सरकार के होते हुए पहला कर्त्तव्य राज्य सरकार का ही बनता था कि वह विश्वविद्यालय परिसर में हो रही घटना का संज्ञान लेते हुए तुरन्त हरकत में आती परन्तु वह राज्यपाल के वहां पहुंचने पर हरकत में आयी और उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उसने व्यापक पुलिस बल परिसर में भेजा। 

यह पूरी तरह कानूनी मसला है कि किस तरह राज्यपाल स्वयं एक ‘सुरक्षा अधिकारी’ की भूमिका में आ गये कुलाधिपति के रूप में उनके अधिकार सुपरिभाषित हैं। विश्वविद्यालय परिसर में व्यवस्था देखने का अधिकार कुलपति का होता है मगर उलझन तब और पैदा हो गई जब श्री बाबुल सुप्रियो कुलपति श्री सुरंजन दास से ही उलझ गये और उन्होंने कहा कि एक केन्द्रीय मन्त्री का स्वागत करने के लिए उन्हें  द्वार पर ही मौजूद होना चाहिए था। जाहिर है कि समारोह छात्र संगठन की तरफ से आयोजित था न कि विश्वविद्यालय की तरफ से। 

अतः श्री सुप्रियो को भी  शालीनता का दायरा नहीं तोड़ना चाहिए था  और  स्थिति को बिगड़ता देख कुलपति को भी शासन की मदद लेने से गुरेज नहीं करना चाहिए था परन्तु सबसे महत्वपूर्ण यह है कि विश्वविद्यालयों के भीतर ही अगर विभिन्न मतों और विचारधाराओं के अर्थ नहीं खुलेंगे तो फिर कहां खुलेंगे? विद्यार्थी परिषद के समारोह में यदि बाबुल सुप्रियो शान्तिपूर्वक अपनी बात कह कर चले जाते और फिर उसके बाद उनके मत से असहमति की बात लोकतान्त्रिक तरीके से होती तो नयी पीढ़ी के तैयार होने वाले होनहार युवकों के सामने विचारों का नया आलोक फैलता किन्तु इससे पहले ही किसी को भी अपनी बात कहने से रोकना और अभद्रता पर उतर जाना स्वयं के अभद्र होने का ही प्रमाण देता है जिसे बंगाल का ‘भद्रलोक’ कभी स्वीकार नहीं कर सकता। 

संयोग से बाबुल सुप्रियो वन और पर्यावरण परिवर्तन राज्य मन्त्री हैं। उन्हें सब्र से काम लेते हुए विश्वविद्यालय में व्याप्त पर्यावरण का संज्ञान लेते हुए ही उसे अनुकूल बनाने का प्रयास करना चाहिए था। राजनीतिज्ञ तो वही होता है जो अपने विरोधियों से भरी खचाखच सभा में भी तालियां बजवा कर घर लौटता है क्योंकि वह जानता है कि उसके विचारों का विरोध होगा। अतः वह अपने विचारों के ‘सतरंगी’ प्रकाश से उसी ‘रंग’ को चुनता है जिसमें विरोधियों को भी चमक दिखाई दे परन्तु इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मतभेद या विचारभेद को त्याग कर अपने सिद्धान्तों से समझौता किया जाये बल्कि अर्थ यह है कि विरोधियों को साझा विचार के आलोक में लाकर छोड़ दिया जाये। लोकतन्त्र इसी आधार पर तो चलता है। यकीनन प. बंगाल जैसे सांस्कृतिक रूप से श्रेष्ठ राज्य में राजनीति के हिंसक होने का कोई कारण नहीं बनता है।