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रूल और उसूल

चुनावों की घोषणा होते ही पूरे देश में सियासत की लहर दौड़ने लगी है। राष्ट्रवाद, समाजवाद अथवा साम्यवाद को अपना ईमान कहने वाली पार्टियों की हमारे देश में कमी नहीं है परन्तु देखने वाली बात यह होगी कि इस देश की मिट्टी में रचे-बसे गांधीवाद की कसौटी पर कौन सी पार्टियां खरी उतरेंगी क्यों​कि अकेले गांधीवाद में ही वह जज्बा है कि वह इस देश की विविधता में फैली उस खूबसूरती को अपना ताज बना सके जिससे यह हिन्दोस्तान बना है मगर एक नेता ने जिस अंदाज में कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी की पूरी पारिवारिक जन्मपत्री निकाल कर उनसे ‘ब्राह्मण’ होने का सबूत पेश करने की दलील रखी है उसने इस मन्त्री को किसी कबीले का नाजिम सिद्ध कर दिया है।

21वीं सदी के दौर में वे लोग किस ‘वाद’ को अपना सिद्धान्त बनायेंगे जो अपने मुखालिफों से उनकी जात और नस्ल पूछने की हिमाकत कर रहे हैं। लोकतन्त्र में हर नागरिक मतदाता होता है और उसकी न कोई जाति होती है और न धर्म। चुनावी मैदान में सभी पार्टियां अपने-अपने फलसफे या सिद्धान्त रखकर लोगों से उन पर मुहर लगाने की गुजारिश इसलिए करते हैं कि वे उस रास्ते से देश की तरक्की की तहरीर लिखना चाहते हैं। इसमें बुरा कुछ नहीं है क्योंकि उनकी राय में उनके सिद्धान्तों पर चलते हुए ही देश तरक्की कर सकता है। देश की तरक्की का पैमाना इसमें रहने वाले लोगों की तरक्की से ही मापा जाता है।

मुल्क की मजबूती के लिए ही फौजों को रखा जाता है जिससे वे उसकी सरहदों पर आने वाले किसी भी संकट का हर समय डटकर सामना कर सकें। इस फौज का मनोबल देशवासी ही ऊंचा रखते हैं क्योंकि उनकी शिरकत से ही फौज बनती है। अतः जैसे-जैसे देशवासी मजबूत होगा वैसे-वैसे ही देश भी मजबूत होगी। अतः पाकिस्तान के बालाकोट में भारतीय वायुसेना की कार्रवाई में हलाक आतंकवादियों की संख्या गिनना या उसका ब्यौरा देकर उसे विवादास्पद बना देना वायुसेना के शौर्य का अपमान करने से कम नहीं है क्योंकि वायुसेना का लक्ष्य आतंकवाद के अड्डे को ध्वस्त कर देना था।

इस कार्रवाई में जितने भी दहशतगर्द हलाक हुए यह उनकी अपनी किस्मत, बात समझने वाली यह है कि लोकतन्त्र रूल (नियम) और उसूल से चलता है। ये उसूल हर वक्त और हर परिस्थिति में राजनैतिक तन्त्र को सावधान करते रहते हैं कि वे अपनी उन सीमाओं में रहें जिनका वास्ता लोगों द्वारा उन्हें सौंपी गई सत्ता के रूल (नियम) से है। यह रूल यह है कि हुकूमत मुल्क पर हुक्मरानी नहीं बल्कि निगेहबानी करेगी और इस तरह करेगी कि एक मजदूर से लेकर मिल मालिक को अपने हकों की पैरवी करने का पूरा अधिकार होगा और दोनों को ही खुशगवार माहौल देने के वादे से सरकार बन्धी रहेगी।

चुनावों मे विभिन्न पार्टियां लोगों से और क्या वादे करती हैं? ये ही वादे तो करती हैं कि वे रोजगार के अवसर बढ़ायेंगी, किसानों को उनकी फसल का जायज और लाभप्रद मूल्य मिलेगा, शिक्षा के क्षेत्र में मेधावी छात्राें के सामने अर्थ संकट को नहीं आने दिया जायेगा और गरीबों की औलादों के लिए भी अच्छे स्कूलों की व्यवस्था होगी, गांवों की हालत में सुधार होगा, यानि देश का विकास होगा। इसके लिए पूरे देश में मजबूत आर्थिक ढांचा खड़ा किया जायेगा जिनमें सड़क से लेकर उद्योग शामिल होते हैं। समन्वित विकास के जरिये ही ऐसा विकास संभव है जिसे समावेशी विकास कहा जा सकता है।

इसका उदाहरण साठ के दशक में पंजाब राज्य के मुख्यमन्त्री सरदार प्रताप सिंह कैरों ने प्रस्तुत किया था और उन्होंने अपने राज्य को कृषि के क्षेत्र में शिखर पर पहुंचा कर औद्योगिक क्षेत्र में बुलन्दी देते हुए इसे भारत के ‘स्विट्जरलैंड’ की संज्ञा से नवाज दिया था। हर गांव पक्की सड़क से जुड़कर बिजली से चमचमा गया था। हर जिले में आईटीआई और सुविधा सम्पन्न अस्पताल बना दिया गया था। यह नजीर 1963 में ही स्व. कैरों ने पेश कर दी थी। बात रूल और उसूल की थी तो कैरों साहब का रास्ता बहुत सरल था मगर मंजिल बहुत मुश्किल थी। ठीक यही रास्ता मध्य प्रदेश में मुख्यमन्त्री श्री कमलनाथ ने जिस नये अन्दाज से पकड़ा है वह दूसरे राज्यों के लिए एक नई नजीर बनकर जल्दी ही पेश हो सकता है। राज्य विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौर में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से उन्होंने किसानों का ऋण माफ करने का वादा किया था।

उसे भोपाल की गद्दी संभालने के 48 घंटों में ही पूरा करते हुए उन्होंने ऐलान किया कि राज्य में कृषि संसाधन उद्योगों का जाल बिछाया जायेगा। स्थानीय कच्चे माल से उत्पादन के केन्द्र बनाये जायेंगे। यह काम जिस गति के साथ पिछले तीन महीने से हो रहा है उसे देखकर विपक्षी पार्टी को भी मानना पड़ रहा है कि हुकूमत को उसूलों की जरूरत होती है। लोकतान्त्रिक सरकार को रूल से ज्यादा उसूल का पाबन्द होना पड़ता है क्योंकि केवल इसी रास्ते से मुल्क के लोगों को उनके अधिकार मिल सकते हैं। अतः श्री कमलनाथ ने जिस हौसले के साथ यह ऐलान किया है कि राज्य के नये उद्योगों में 70 प्रतिशत नौकरियां प्रादेशिक बेरोजगारों को मिलेंगी वह काबिले तारीफ इसलिए है कि किसी भी राज्य के आत्मनिर्भर हुए बिना पूरे देश की आत्मनिर्भरता संभव नहीं है।

बेशक यह आत्मनिर्भरता दूसरे राज्यों में सुलभ स्रोतों से ही प्राप्त की जाती है, जिस प्रकार पंजाब ने दूसरे राज्यों से मिलने वाले श्रम साधनों से प्राप्त की थी मगर कृषि क्षेत्र की सम्पन्नता ने ही इस राज्य की निवेश समस्या को बहुत हद तक समाप्त किया था। मध्य प्रदेश में थोड़ा घुमाकर यही काम किया जा रहा है जिसमें निवेश की आवक के बाहरी स्रोतों को लाकर स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार देकर राज्य की सकल विकास वृद्धि दर को बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं मगर यह सब तभी संभव है जब पूरे देश में शान्ति, अमन व भाईचारे का माहौल हो और यह जिम्मेदारी राजनैतिक दलों की ही बनती है कि वे राष्ट्रीय विकास की इस पहली शर्त के पालन में सिर्फ गांधी बाबा को ही याद करते हुए हिन्दोस्तान की अजमत का कलमा पढ़ते रहें। आखिरकार चुनावों का और मतलब क्या है?