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युग दृष्टा स्टेट्समैन को नमन

आज फिर पापा (पिता जी) की याद झिझोड़ रही है क्योंकि वह एक निष्पक्ष पत्रकार थे और उनके हर राजनीतिक पार्टी के शीर्ष नेताओं से संबंध थे। उनका कईयों से प्यार और सम्मान का बहुत बड़ा रिश्ता था। उस लिस्ट में सबसे ऊपर नाम प्रणव दा का था जिनको वह बहुत मानते थे।

अक्सर लंच-डिनर उनके साथ होते थे। लम्बी बातचीत होती थी और वापस घर आकर वह उनके बुद्धि कौशल का हमेशा गुण गाते थे और कहते थे वह एक स्टेट्समैन हैं। आज जब उनके निधन का समाचार ​सुना तो अहसास हुआ कि पूर्व राष्ट्रप​ति भारत रत्न श्री प्रणव मुखर्जी के निधन से मौजूदा दौर का सबसे प्रतिभाशाली युगदृष्टा राजनेता (स्टेट्समैन) देवलोक सिधार गया।

आजादी के बाद की भारतीय राजनीति का ऐसा अध्याय आज समाप्त हो गया जिसने भारत के विकास की उन सीढि़यों को बनाने में स्वयं भी निर्णायक भूमिका निभाई थी जिसमें राजनैतिक दलों की पहचान के स्थान पर केवल राजनीति ही अपनी अमिट छाप छोड़ती थी।

स्व. इंदिरा गांधी द्वारा राजनीति में ऐसे विद्वान व कुशाग्र व्यक्ति को कांग्रेस की धरोहर के रूप में स्थापित करना सत्तर के दशक में आश्चर्य के रूप में देखा गया था। सामाजिक व राजनैतिक क्षेत्रों में प्रणव दा के नाम से जाने जाने वाले श्री मुखर्जी दलगत दायरे से ऊपर उठ कर जहां एक ओर सभी समकालीन नेताओं में परम आदरणीय थे वहीं समाज के गरीब से गरीब तबके के लोगों के बीच उनके हमदर्द थे।

अपने प. बंगाल के वीरभूमि जिले के मिराती गांव की धूल-मिट्टी में खेल कर बड़ा हुआ यह बालक भारत के सर्वोच्च राजपद राष्ट्रपति तक जब पहुंचा तो अमीर से लेकर गरीब आदमी ने चैन की सांस लेते हुए कहा कि भारत स्वयं में और महान हो गया है।

बचपन में अपने स्कूल पैदल जाने वाला बालक जब बड़ा हुआ तो उसने अपनी विद्वता की धाक एक पत्रकार से लेकर प्राध्यापक के पद पर कार्य करते हुए इस प्रकार छोड़ी कि 1969 में प. बंगाल के तत्कालीन मुख्यमन्त्री स्व. अजय मुखर्जी ने उन्हें राज्यसभा में भेजा। यहां पहुंच कर जब प्रणव दा अपने सदन में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के मुद्दे पर बोले तो उनका भाषण सुनने के लिए स्वयं प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी लोकसभा छोड़ कर राज्यसभा में आयीं और उन्हें ध्यान से सुनती रहीं। इंदिरा जी को वह ‘हीरा’ मिल गया था जिसके भरोसे वह कांग्रेस के वैचारिक पक्ष को जगमगा सकती थीं।

इसके बाद प्रणव दा कांग्रेस पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाने लगे। वह अपने सिद्धान्तों के प्रति इस प्रकार निष्ठावान थे कि कभी भी राजनीति में समरसता पर चोट न आ पाये। यही वजह रही कि वह मनमोहन सिंह सरकार के दौरान संकट मोचक कहलाये और सरकार के कर्णधार बने रहे।

बेशक वह प्रधानमन्त्री के पद से दूर रहे मगर यूपीए की दोनों सरकारों में उनकी सहमति की कीमत इस कदर थी कि यह जुमला प्रचलित हो गया था कि ‘तेरी मर्जी, मेरी मर्जी-आगे जानें प्रणव मुखर्जी।’ वह लोकसभा में 2004 से लेकर 2012 में राष्ट्रपति बनने तक ही रहे और इससे पूर्व लगातार 1969 से राज्यसभा में रहे मगर लोकसभा में दिये गये उनके भाषणों की तुलना पं. जवाहर लाल नेहरू के भाषणों से की जा सकती है। इसमें अतिश्योक्ति का अंश इसलिए नहीं है क्योंकि प्रणव दा किसी भी विषय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से लेकर उसके वर्तमान महत्व की समीक्षा किसी वैज्ञानिक की भांति करते थे। देश के वाणिज्य मन्त्री, रक्षामन्त्री, विदेश मन्त्री व वित्त मन्त्री जैसे उच्च पदों पर रहते हुए प्रणव दा का हर कार्य देशहित के लक्ष्य से प्रेरित रहता था।

2008 में जब उन्होंने अमेरिका से परमाणु करार किया तो इस पर संसद विशेष कर लोकसभा की सहमति लेने का कार्य यूपीए की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने प्रणव दा पर सदन का नेता होने के लिहाज से छोड़ा। इस विषय पर उनके द्वारा लोकसभा में दिया गया वक्तव्य भारतीय संसदीय इतिहास का स्वर्ण अध्याय बन चुका है।

विपक्ष द्वारा इस करार का विरोध किये जाने पर उन्होंने जो कहा उसे आज के राजनीतिज्ञ सुनें और मनन करें। दादा ने कहा-हमें खुद पर विश्वास होना चाहिए। हमें लोगों ने चुन कर इस सदन में भेजा है। हममें यह आत्मविश्वास होना चाहिए कि हम जो भी कार्य कर रहे हैं वह आने वाली पीढि़यों का जीवन बेहतर बनाने के लिए कर रहे हैं। यही प्रणव दा थे जो विदेश मन्त्री की हैसियत से अमेरिका में वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश से दो टूक तरीके से कह कर आ गये थे कि ‘भारत तब तक परमाणु करार नहीं कर सकता जब तक कि इसकी संसद मंजूरी न दे दे।’

 इतना ही नहीं प्रणव दा ने अमेरिका की तत्कालीन विदेश मन्त्री को तब बैरंग स्वदेश लौटा दिया था जब वह बिना अमेरिकी सीनेट की मंजूरी के ही करार पर भारत के हस्ताक्षर लेने आयी थीं। निडरता, बेबाकी और सौम्यता का ऐसा अद्भुत संगम प्रणव मुखर्जी में यथा नाम तथा गुण के सम्मान था। प्रणव का अर्थ ओंकार शब्द  होता है। उनमें सभी को साथ लेकर राजनीति में जनता के हितों के लिए सर्वस्व अर्पण करने की हुंकार भरी हुई थी।

रक्षामन्त्री के रूप में चीन की धरती पर खड़े होकर यह चेतावनी देना कि ‘आज का भारत 1962 का भारत नहीं है’ प्रणव दा जैसा स्टेट्समैन ही दे सकता था। उनके इन आठ शब्दों ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के सभी पेंचों को खोलकर रख दिया था। वित्त मंत्री के रूप में 2008 में विश्व मन्दी के असर से भारत जैसे विकास करते देश को अछूता रखना उन्हीं की दूरदृष्टि का कमाल था। आज केवल भारत ही नहीं समूचा एशिया महाद्वीप उनके निधन से शोकमग्न है।

1984 में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ वित्त मन्त्री के तमगे से नवाजे गये इस महामानव को श्रद्धा सुमन। पंजाब केसरी परिवार की ओर से शत्-शत् नमन और विनम्र श्रद्धांजलि।