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संपादकीय

सेंगर, उन्नाव और भाजपा

भारतीय जनता पार्टी ने उन्नाव (उत्तर प्रदेश) जिले के अपने बलात्कार के आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को पार्टी से निष्कासित कर दिया है। इस जेल में बन्द विधायक की करतूतों के सामने आने पर संभवतः पार्टी को यह कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा है परन्तु उसका असली चेहरा तो पिछले साल ही तब जगजाहिर हो गया था जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद एक नवयुवती की शिकायत पर उसके खिलाफ बाकायदा मुकदमा दर्ज किया गया था और उसे जेल भेजा गया था। 

उत्तर प्रदेश विधानसभा में तीन चौथाई बहुमत रखने वाली भाजपा को उसे बाहर का रास्ता दिखाने में इतना वक्त क्यों लगा, इसका उत्तर तो पार्टी का प्रादेशिक नेतृत्व ही देगा परन्तु केन्द्रीय नेतृत्व ने जिस तरह पिछले दिनों उत्तराखंड के अपने एक विधायक को बाहर का रास्ता दिखाने में चुस्ती-फुर्ती दिखाई थी संभवतः सेंगर पर फैसला उसी से प्रभावित लगता है। उत्तराखंड का विधायक तो सरेआम बन्दूक की गोलियां चलाते हुए एक भद्दे फिल्मी गाने पर नृत्य कर रहा था और खुद को ‘शेर’ बता रहा था। उसका यह वीडियो सार्वजनिक हो जाने पर पार्टी ने उसे 6 साल के लिए अपनी सदस्यता से मुअत्तिल कर दिया। 

राजनीति में जिस तरह अपराधी प्रवृत्ति के लोग पाले-पोसे जाते हैं उसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्य हैं। यदि गौर से देखें तो इन दो विस्तारित प्रदेशों (उत्तराखंड व झारखंड को मिलाकर) से ही लोकसभा के एक चौथाई से ज्यादा सांसद चुने जाते हैं। इनमें से भी अकेले उत्तर प्रदेश से ही 80 सांसद आते हैं और इस प्रदेश की राजनीति का पिछले 30 वर्षों के ही भीतर ही अपराधीकरण जिस सिलसिलेवार ढंग से हुआ है उसमें जातिगत व समुदायगत दबंगई ने केन्द्रीय भूमिका निभाई है।

सबसे हैरानी की बात यह है कि इन दबंगों का किसी विशेष राजनैतिक दल से कोई विशिष्ट लगाव नहीं रहा है। ये हवा को सूंघ कर अपनी पार्टियां अदलते-बदलते रहते हैं परन्तु इस राजनीति की सूत्रधार राज्य की अभी तक की प्रमुख मानी जाने वाली समाजवादी पार्टी रही है जिसने दबंगई और कानून को जेब में रखने वाले को राजनैतिक चोला पहनाकर इज्जत बख्शने का काम किया और कानून-व्यवस्था को दुरुस्त रखने की संवैधानिक जिम्मेदारी से बन्धी पुलिस को ही राजनैतिक चोला पहना डाला। 

दुर्भाग्य से यह प्रक्रिया उत्तर प्रदेश की राजनीति की प्रमुख शर्त बनती गई और परिणामतः कोई भी पार्टी इससे अछूती नहीं रह सकी। अपराधी प्रवृति के राजनीतिज्ञ टोपियां बदल-बदल कर सत्ता में रहने वाली पार्टी से चिपकने लगे। इनसे बेशक बहुजन समाज पार्टी व भारतीय जनता पार्टी भी नहीं बच सकीं। अतः सेंगर भाजपा का उत्पादन नहीं है बल्कि सत्ता का उत्पादन है। यह बात और है कि आजकल भाजपा का राज्य में शासन है किन्तु मूल प्रश्न यह है कि कुलदीप सिंह सेंगर को राज्य सरकार किस वजह से विशेष रियायतें देती रही कि वह जेल में ही उन लोगों के साथ बैठकें करता रहा जो उसके खिलाफ बलात्कार के मुकदमे में नामजद थे? 

यहां सबसे महत्वपूर्ण यह तथ्य है कि राज्य की इस अपराधजनित राजनीति ने पुलिस बल का ‘मनोबल’ पूरी तरह तोड़ डाला है। यह उस राज्य की स्थिति है जहां कभी स्व. चन्द्रभानु गुप्ता और चौधरी चरण सिंह जैसे मुख्यमन्त्री पुलिस को राजनीतिज्ञों की चिरौरियां करने पर फटकार लगाते थे और अपना काम पूरी निष्पक्षता से करने के निर्देश देते थे। अतः राज्य की जेलों से लेकर पुलिस थानों तक में जो विसंगतियां हम देखते हैं उसकी जड़ में इस राज्य की ‘मुजरिमी’ राजनीति ही है। 

इसी वजह से सेंगर जैसा व्यक्ति राजनैतिक चोला पहन कर समाजसेवक बनने का ढोंग रचता रहा और जनता द्वारा उनका प्रतिनिधि भी चुना जाता रहा किन्तु इसमें जनता को दोष देना गैर-तार्किक है क्योंकि जनता चुनावों में उन विशेष सन्दर्भों के दायरे में ही चयन करती है जो उसके सामने फौरी तौर पर उसके सामूहिक सम्मान और गौरव से जोड़ दिये जाते हैं और इस खांचे में अपराध प्रवृत्ति आसानी से शान-ओ-शौकत पा लेती है। उसके साथ उसकी बहादुरी के वे किस्से जोड़ दिये जाते हैं जो मूलतः अपराधजन्य ही होते हैं।

यह उत्तर प्रदेश की बदकिस्मती है कि इसकी राजनीति अब किसान या मजदूर अथवा सामाजिक बराबरी के बोध से निर्देशित न होकर जाति, वर्ग या समुदाय बोध से निर्देशित हो रही है जिसमें अपराध को सहजता से अपना लिया गया है। सेंगर मामले का सतही विश्लेषण करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है क्योंकि राजनीति सेंगरों की ‘सौदागर’ हो चुकी है मगर भारत का लोकतन्त्र जीवन्त लोकतन्त्र है और इसकी व्यवस्था हमारे संविधान निर्माता इस प्रकार करके गये हैं कि जब इसका कोई एक स्तम्भ अपना रास्ता भटकने लगे तो तुरन्त दूसरा स्तम्भ उसे सही राह पर डालने के लिए आगे आ जाता है। 

अतः सर्वाेच्च न्यायालय ने लखनऊ में जीवन-मृत्यु से जूझती उस नवयौवना के हकों की रक्षा के लिए ही उसके साथ हुए बलात्कार से सम्बन्धित सभी पांचों मुकदमों को उत्तर प्रदेश से बाहर स्थानान्तरित करने के आदेश जारी कर दिये हैं। यही लोकतन्त्र की खासियत है। वास्तव में न्यायपालिका की यह गंभीर टिप्पणी प्रदेश की राजनीति के बारे में ही है। यह नहीं भूला जाना चाहिए कि उन्नाव से जब साक्षी महाराज ने भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीता था तो वह जेल में सेंगर से मुलाकात करने और मिजाज-पुर्सी के लिए गये थे!