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मोटर से दबे किसानों की चीख

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में जिस तरह चार किसानों की वाहनों के नीचे लाकर हत्या की गई है उसकी कोई दूसरी मिसाल स्वतन्त्र भारत में नहीं मिलती है। ये वाहन केन्द्रीय गृह राज्यमन्त्री अजय मिश्रा के मोटर काफिले का हिस्सा थे। कहा जा रहा है की इस काफिले में कुल तीन वाहन थे जिनमें से एक में अजय मिश्रा स्वयं सवार थे जिसे उनका पुत्र आशीष मिश्रा चला रहा था। यह काफिला मिश्रा के पुश्तैनी गांव बनवीरपुर से लौट रहा था जहां हुए वार्षिक समारोह में भाग लेने राज्य के उपमुख्यमन्त्री केशव प्रसाद मौर्य आने वाले थे और किसान कृषि कानूनों को लेकर उनके विरोध में एक प्रमुख रास्ते पर एकत्र हुए थे और काले झंडे दिखाना चाहते थे। गांव में समारोह सम्पन्न हो जाने के बाद वहां से लौटते अजय मिश्रा के मोटर काफिले को किसानों द्वारा रुकवाने के प्रयासों के दौरान यह बर्बर व दर्दनाक घटना घटी जिसमें चार अन्य लोगों की मृत्यु भी हो गई। सवाल यह है कि यदि यह मामला स्वयं गृह राज्यमन्त्री से सम्बन्धित है तो उन्हें स्वयं ही सबसे पहले कानून-व्यवस्था की स्थापना करने हेतु राज्य की योगी सरकार से सम्पर्क साध कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का कदम उठाना चाहिए था। मगर उल्टे अजय मिश्रा सफाई दे रहे हैं कि घटनास्थल पर न तो वह मौजूद थे और न उनका बेटा। योगी सरकार और किसानों के मध्य समझौता हो गया है और मामले की जांच भी रिटायर्ड जज से करवाई जाएगी।

लखीमपुर खीरी जाने से विपक्ष के नेताओं को जिस तरह पुलिस ने रोका उससे यह स्पष्ट हो गया कि प्रशासन सच को बाहर नहीं आने देना चाहता। कांग्रेस की नेता श्रीमती प्रियंका गांधी को लखीमपुर जाने से रोकने के लिए जिस तरह पुलिस अधिकारियों ने उनसे व्यवहार किया और बिना किसी लिखित आदेश के उन्हें गिरफ्तार करके सीतापुर के एक सरकारी गेस्ट हाऊस में रखा गया, वह पूरी तरह कानून के शासन की धज्जियां उड़ाता है। लोकतन्त्र में जितनी जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की होती है उतनी ही विपक्ष की भी होती है। दोनों की जवाबदेही जनता के प्रति होती है।

कोई भी राजनैतिक दल सत्ता में आने के बाद विपक्षी पार्टियों को दुश्मन या शान्ति भंग करने वाली शक्तियां नहीं मान सकता है क्योंकि जनता के दुख-दर्द में सहभागी बनने का उनका मूल अधिकार होता है। हमारी संवैधानिक बहुदलीय प्रशासन प्रणाली इस बात की गारंटी देती है कि प्रत्येक वैध व मान्य राजनैतिक दल को सरकार की हर कार्रवाई की जांच-परख करने का वैधानिक अधिकार है। अतः श्रीमती प्रियंका गांधी को लखीमपुर जाने से रोकने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को वह कारण बताना चाहिए था जो कानून के नजरिये से उनकी यात्रा को अवांछित बताता। मगर ऐसा  कुछ भी नहीं हुआ और कुछ पुलिस अधिकारियों ने उनके व उनके साथियों के साथ अभद्र व्यवहार करते हुए उन्हें हिरासत  में डाल दिया। याद रखने की जरूरत है कि प्रियंका उन इन्दिरा गांधी की पोती है जिन्हें 1978 में तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने सड़क से उठा कर गिरफ्तार करने की हिमाकत तो कर डाली थी मगर उसके बाद पूरे देश की राजनीति का माहौल पलट गया था। यह मामला उत्तर प्रदेश का है अतः बदलती फिजां का अन्दाजा लगाया जा सकता है। मगर यह कैसे स्वीकार किया जा सकता है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमन्त्री भूपेश बघेल और पंजाब के मुख्यमन्त्री चरणजीत सिंह चन्नी के हवाई जहाजों को भी लखनऊ में उतरने की इजाजत न दी जाये? ये दोनों नेता भी किसानों के दुख में शरीक होना चाहते थे। इसी प्रकार सपा के अखिलेश यादव को लखनऊ में ही घर के बाहर रोक दिया गया और लोकदल के जयन्त चौधरी को गढ़ मुक्तेश्वर में ही पकड़ लिया गया। इन सभी नेताओं के लखीमपुर खीरी जाने से केवल किसानों को भी सान्त्वना मिलती और उन्हें एहसास होता कि सच को सामने लाने के लिए उनके साथ पूरा देश खड़ा हुआ है।

दूसरी तरफ किसान यूनियन के राकेश टिकैत ने लखीमपुर जाकर किसानों व सरकार के बीच समझौता कराया है जिसके अनुसार प्रत्येक मृतक किसान के परिवार को 45 लाख रु. की धनराशि का मुआवजा दिया जायेगा।  जनता द्वारा चुनी हुई सरकार में किसी घटना के लिए जिस किसी भी चुने हुए प्रतिनिधि की जिम्मेदारी हो उसका मुचलका कटना इसलिए जरूरी होता है जिससे आम जनता में विश्वास जमा रहे कि यह उन्हीं की सरकार है। यह बेवजह नहीं होता कि इस प्रणाली में प्रत्येक नागरिक की जान-ओ-माल की गारंटी सरकार देती है। हालांकि लखीमपुर खीरी की घटना में पुलिस ने गृह राज्यमन्त्री के बेटे आशीष मिश्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है। हालांकि किसान नेता राकेश टिकैत के अनुसार मंत्री अजय मिश्रा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली है। मगर यह सवाल अपनी जगह खड़ा हुआ है कि स्वयं अजय मिश्रा की संदिग्ध संलिप्तता का संज्ञान किस कोण से लिया जायेगा? याद रखा जाना चाहिए कि भारत का लोकतन्त्र इतना शक्तिशाली है कि 80 के दशक में राजस्थान के ‘डीग’ के पूर्व महाराजा मानसिंह की भरतपुर के हवाई पैड पर पुलिस की गोली से हत्या हो जाने पर तत्कालीन मुख्यमन्त्री शिवचरण  माथुर से तब के प्रधानमन्त्री स्व. राजीव गांधी ने इस्तीफा ले लिया था। लखीमपुर में तो कुल आठ निरीह लोगों की जान गई है।