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शाह की दक्षिण रणनीति

बिहार विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष व गृहमन्त्री श्री अमित शाह ने अपनी पार्टी का विजय अभियान दक्षिण भारत में चलाने की रणनीति तैयार कर ली है। उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हिन्दी भाषी इलाकों की पहले नम्बर की उनकी पार्टी द्रविड़ भाषी राज्य तमिलनाडु में किस प्रकार उत्तर से दक्षिण के संगम को चित्रित करेगी। तमिलनाडु की राजनीति प्रारम्भ से ही द्रविड़ उप राष्ट्रीयता के आवेश से अभिप्रेरित रही है, परन्तु श्री शाह ने अपने हाल के तमिलनाडु दौरे में जिस प्रकार राज्य की अन्ना द्रमुक पार्टी से गठबन्धन करने की घोषणा की है उससे साफ है कि भाजपा इस राज्य में अपनी पहचान अन्नाद्रमुक के सहारे मजबूती से बनाना चाहती है। अमित शाह वर्तमान दौर के राजनीति की चाणक्य माने जाते हैं और वह कभी शांत नहीं बैठते। उनका लक्ष्य विजय प्राप्त करना होता है। इसीलिए वह पश्चिम बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु में भी सक्रिय हो गए हैं। जबकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा भी उत्तराखंड से चुनावी शंखनाद करने जा रहे हैं।  भाजपा की यह काल पारखी रणनीति है जिसके सहारे वह आज राष्ट्र व्यापी पार्टी बनी है। बिहार इसका सबसे ताजा उदाहरण है जहां इसने क्षेत्रीय दल जद (यू) को इन चुनावों में पीछे करके स्वयं अग्रणी भूमिका ले ली है। इससे पहले उत्तर-पूर्व के विभिन्न राज्यों में भी भाजपा ने स्थानीय दलों के साथ गठबन्धन करके ही अपनी पकड़ मजबूत की थी।

 राजनीतिक हकीकत यह भी है कि भाजपा ने कांग्रेस पार्टी की शिथिल पड़ती यथास्थितिवादी राजनीति के विरुद्ध क्षेत्रीय दलों की अपेक्षाओं को इस प्रकार उभारा कि उन्हें भाजपा के साथ जाने में अधिक लाभ दिखाई दिया। इसका ज्वलन्त उदाहरण असम राज्य भी है जहां 80 के दशक तक जनसंघ या भाजपा का कोई वजूद नहीं था मगर इसने असम गण संग्राम परिषद के साथ गठबन्धन करके इस राज्य में अपनी पहचान को मजबूत किया। इसी प्रकार छोटे से राज्य त्रिपुरा में भाजपा ने विभिन्न छोटे-छोटे दलों से सहयोग करके पिछले चुनावों में अपनी सरकार बनाई। यह तर्क कुछ लोग दे सकते हैं केन्द्र में श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार गठित होने के बाद भाजपा ने विभिन्न राज्यों में अपनी बढ़त सत्ता के साथ समीकरण बैठाते हुए बनाई मगर यह अर्ध सत्य है क्योंकि राजनीति का दसवीं कक्षा का छात्र भी इस हकीकत से वाकिफ है कि केन्द्र में  विपक्षी पार्टी कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद भाजपा व जद(यू) ने मिल कर इस राज्य के 2005 व 2010 के चुनाव भारी बहुमत से जीते थे। इसी प्रकार  कर्नाटक जैसे दक्षिण के मुहाने पर बैठे राज्य में इसने अपनी बढ़त कमोबेश अपने बलबूते पर बनाई थी। बेशक श्री मोदी की लोकप्रियता का पार्टी को लाभ 2014 के बाद हुए लगभग हर चुनाव में मिला है परन्तु यह भी सच है कि लगभग हर चुनाव में ही भाजपा ने क्षेत्रीय या स्थानीय राजनीतिक गणित को समझते हुए गठबन्धन करने में कभी कोताही नहीं बरती। इसमें कोई शक नहीं है कि श्री शाह चुनावी राजनीति के जमीनी समीकरणों के कुशल और चौकस खिलाड़ी हैं।

 बिहार में लगभग हारी हुई बाजी उन्होंने इन्हीं जमीनी समीकरणों की बदौलत जीतने में सफलता प्राप्त की है जबकि वह चुनाव प्रचार करने बिहार में गये तक नहीं। लोकतन्त्र में इसे श्री शाह का ‘चुनाव चातुर्य” माना जायेगा, परन्तु तमिलनाडु के मामले में श्री शाह जो प्रयोग करने जा रहे हैं उसे पिछले अनुभवों से अलग रख कर देखा जायेगा क्योंकि भाजपा की छवि प्रखर राष्ट्रवादी पार्टी की इस तरह है कि इसमें दक्षिण की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का समावेश प्रतीकात्मक ही रहा है। तमिल या द्रविड़ उपराष्ट्रीयता के लिए भाजपा अपनी सकल राष्ट्रीयता में कितना स्थान बना पाती है। इससे उसके सहयोगी दल  अन्नाद्रमुक को निश्चित रूप से जूझना पड़ सकता है मगर श्री अमित शाह की रणनीति को देखते हुए यह जरूर कहा जा सकता है कि वह अपनी पार्टी के समावेशी स्वरूप को मुखर रखने का प्रयास करेंगे और श्री मोदी की लोकप्रियता को आवरण के रूप में प्रयोग करेंगे। इसके बावजूद तमिलनाडु की राजनीति व्यक्तिमूलक व भक्ति मूलक होने के साथ ही सामाजिक न्याय के जातिपरक मूल्यों की राजनीति रही है। द्रमुक के स्व. अन्ना दुरै के समय से साठ के दशक से शुरू हुई सामाजिक गैर बराबरी दूर करने और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का एेलान करने वाली राजनीति का अन्त सत्तर के दशक के अंत में फिल्म अभिनेता स्व. एम.जी. रामचन्द्रन ने अन्ना दुरै की ही पार्टी द्रमुक से विद्रोह करके किया और इस राज्य को द्रविड़ उपराष्ट्रीयता की प्रयोगशाला बना दिया जिसकी वजह से कांग्रेस पार्टी हांशिये पर खिंचती चली गई। 

राज्य में जातिगत समूह मूलक जितने भी क्षेत्रीय दल हैं वे तमिल समाज की अन्तर्मुखी द्वन्दात्मक परिस्थितियों की ही उपज हैं। इनका वजूद राज्य की दो प्रमुख पार्टियों द्रमुक व अन्ना द्रमुक के बीच चलने वाली प्रतिद्वन्द्रिवता पर ही निर्भर करता है। भाजपा के इस युद्ध में कूदने पर अन्ना द्रमुक को वह बैसाखी जरूर मिलेगी जिसके सहारे वह केन्द्र सरकार की नीतियों को अपना आसार बना सकती है मगर तमिलनाडु के मिजाज को देखते हुए इसकी कोई गांरटी भी नहीं दी जा सकती है क्योंकि अन्ना द्रमुक के शासन के खिलाफ लोगों मे रोष होना स्वाभाविक है। मगर श्री शाह ने तीसरे विकल्प कांग्रेस के रास्ते में कांटे तो बो ही दिये हैं क्योंकि कांग्रेस अब केन्द्र में सत्तारूढ़ नहीं है।  राज्य में कांग्रेस पार्टी के फिलहाल सबसे कद्दावर नेता श्री पी. चिदम्बरम हैं, उनकी कोशिश है कि उनकी पार्टी का मजबूत गठबन्धन एम.के. स्टालिन की द्रमुक पार्टी से बने मगर स्टालिन के बड़े भाई अलागिरी ने जिस प्रकार अपनी अलग पार्टी बनाने की घोषणा की है उसका नुकसान द्रमुक को होना लाजिमी है।

 गौर से देखा जाये तो दो क्षेत्रीय दल द्रमुक व अन्नाद्रमुक दो राष्ट्रीय दलों कांग्रेस व भाजपा के साथ मिल कर अगले वर्ष मई में होने वाले विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं। इस वजह से इन चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दों का गरमाना भी अस्वाभाविक नहीं होगा। इसे देखते हुए श्री शाह ने जो राजनीतिक चौसर बिछाई है उसमें भाजपा के राज्य में पैर जमने से नहीं रोके जा सकते।