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संपादकीय

कश्मीर पर शाह की नई नीति

लोकसभा में आज जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन बढ़ाये जाने और अन्तरराष्ट्रीय सीमा रेखा के निकट रहने वाले नागरिकों को नियन्त्रण रेखा के करीब रहने वाले नागरिकों के समान ही आरक्षण देने के विधेयकों पर जो चर्चा हुई उससे स्पष्ट हो गया कि भारत के इस सबसे संजीदा राज्य में समस्याओं को पैदा करने में लगभग सभी पूर्ववर्ती केन्द्र सरकारों का कुछ न कुछ योगदान रहा है। नये गृहमन्त्री श्री अमित शाह ने कश्मीर समस्या की विवेचना पूरी तरह अपनी पार्टी भाजपा की मूल विचारधारा ‘राष्ट्रवाद’ आइने में पेश करके कई प्रकार की उन भ्रांतियों का निवारण करने में भी सफलता प्राप्त की जो प्रायः कथित मानवतावादियों द्वारा समय- समय पर उठाई जाती रहती हैं। 

उन्होंने अनुच्छेद 370 के सम्बन्ध में यह भी साफ कर दिया कि भारतीय संविधान का अंग बनाते समय इसके साथ  ‘अस्थायी’ शब्द का इस्तेमाल संविधान निर्माताओं ने फिजूल में ही नहीं किया था। परन्तु इतिहास को तो हम नहीं बदल सकते हैं और हकीकत यह है कि 15 अगस्त 1947 तक अपनी पूरी रियासत का भारतीय संघ में विलय न करके इसके शासक महाराजा हरिसिंह ने ही इस समस्या का सूत्रपात किया था जो बाद में प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू की ‘उदारमना’ राजनीति के चलते गहराती चली गई। 

इस बारे में इतिहासकारों में निश्चित रूप से मतभेद भी हैं कि 26 अक्तूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में विलय हो जाने के बाद इस राज्य की भौगोलिक व राजनैतिक परिस्थितियां पूरी तरह बदल गई थीं और तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं नेहरू के हाथ में पूरे अख्तियार आ गये थे कि वह कश्मीर घाटी में घुसी हुई पाकिस्तानी कबायली-फौज को उसकी हदों तक खदेड़ कर ही चैन लें परन्तु पं. नेहरू तब राष्ट्रसंघ में चले गये थे और उन्होंने इस फैसले पर अपने मन्त्रिमंडल में ही कोई सलाह-मशविरा नहीं किया था। 

जबकि  इतिहास में सरदार पटेल एक ऐसे व्यक्ति हैं और कश्मीर पर उनका स्टैंड स्पष्ट था। यदि इसे स्वीकार कर लिया जाता तो हालात ऐसे ना होते जैसे आज हैं। उस समय राष्ट्रसंघ ने हस्तक्षेप करके दोनों पक्षों में युद्ध विराम करके नियन्त्रण रेखा खींच दी थी जिससे कश्मीर घाटी का दो तिहाई हिस्सा पाकिस्तानी कब्जे में चला गया था।  इसी हिस्से को हम ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ कहते हैं। जाहिर है उस समय की भारत सरकार के संवैधानिक मुखिया अन्तिम अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड माऊंट बेटन थे और 26 अक्तूबर को कश्मीर का भारत में विलय उन्हीं की सरपरस्ती में हुआ था। महाराजा हरिसिंह की भारतीय संघ में अपनी रियासत का विलय करने की प्रार्थना पर उन्हीं ने विचार किया था। 

भाजपा अपने जन्मकाल से ही मानती है कि यदि अन्य देशी रियासतों की तरह जम्मू-कश्मीर रियासत का मसला भी पं. नेहरू अपने ही गृहमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल पर छोड़ देते तो आज कश्मीर समस्या जैसी कोई चीज होती ही नहीं किन्तु यह मात्र एक अवधारणा है जिसका इस राज्य की तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों से सीधा तालमेल नहीं बैठता है क्योंकि उस समय पूरी कश्मीरी अवाम पाकिस्तान के निर्माण का पुरजोर विरोध कर रही थी। इसके बावजूद राष्ट्रसंघ में पं. नेहरू के जाने के फैसले को कुछ इतिहासकार भयंकर भूल भी मानते हैं लेकिन पिछले सत्तर सालों में जिस तरह इस राज्य की समस्या कभी कम और कभी ज्यादा होकर देशवासियों को परेशान करती रही है उसमें पाकिस्तान की अहम भूमिका रही है  और राज्य में सक्रिय क्षेत्रीय राजनैतिक दलों ने इस स्थिति का लाभ उठाने में इस तरह पैंतरेबाजी की है आम कश्मीरी भारत से कटता चला गया है। 

श्री शाह ने बहुत तफ्सील में बयान किया कि उनकी सरकार ने किस तरह घाटी में पैदा हुए दशकों से चल रही आतंकवादी समस्या को निपटाते हुए आम लोगों को देश की मुख्य धारा में जोड़ने के प्रयास किये हैं जो कुछ लोगों को बहुत सख्त लग सकते हैं मगर इनका उद्देश्य सिर्फ भारत विरोधियों को उनकी सही जगह दिखाना है। गृहमन्त्री का यह रहस्योदघाटन कि पिछली सरकारें इस राज्य में उन लोगों को सुरक्षा उपलब्ध करा देती थीं जो भारत विरोधी कार्रवाई में संलग्न हो जाते थे। ऐसे कम से कम दो हजार लोगों को सुरक्षा प्राप्त थी जिनमें से 919 की सुरक्षा अब वापस ले ली गई है।

 

सवाल पैदा होना वाजिब है कि भारत को तोड़ने वालों को सुरक्षा की जरूरत क्यों हो? उनका संसद में यह ऐलान हर भारत वासी में विश्वास भरेगा कि उनकी नीति ऐसे भारत विरोधियों में और डर पैदा करने वाली ही होगी जिससे कश्मीर की राष्ट्रभक्त जनता बेखौफ हो सके। लोकतन्त्र में अपनी शिरकत करके खुद को अधिकार सम्पन्न बना सके इस सन्दर्भ में उन्होंने पंचायत चुनावों का होना महत्वपूर्ण बताया जिसके तहत 40 हजार पंच व सरपंच चुने गये हैं और प्रत्येक ग्राम पंचायत को सवा करोड़ से अधिक की धनराशि विकास के लिए पहुंचाई गई है। दोनों विधेयक ध्वनि मत से ही सदन में पारित हो गये जिन्हें अब राज्यसभा में भेजा जायेगा परन्तु इतना तयशुदा है कि मोदी सरकार की कश्मीर नीति के सफल परिणाम आने शुरू हो गये हैं।

 

यह कैसा संयोग है कि कश्मीर समस्या का समाधान सदियों पहले भारत के महान विचारक ‘चाणक्य’ के उस सिद्धान्त के तहत होता नजर आ रहा है जिन्होंने कहा था कि शासक के ‘एक हाथ में आग और दूसरे में पानी’ होना चाहिए जिससे वह आतताइयों के लिए विनाश और प्रजा के लिए शान्ति व सृजन का दूत दिखाई पड़ सके।  लोकतन्त्र में इस सिद्धान्त का पालन करते हुए संविधान की शर्तों पर भी खरा उतरना लाजिमी होता है।

 

अतः श्री शाह को सर्वाधिक सचेत इसी मोर्चे पर रहना है जिससे पाकिस्तान जैसा मुल्क किसी भी प्रकार का भ्रम न फैला सके इस सिलसिले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका कश्मीरी अवाम की ही रहने वाली है क्योंकि राज्य की सत्तर प्रतिशत जनता 40साल से कम उम्र की है और उसके सामने भविष्य है न कि भूतकाल अतः धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक भारत तो उसकी मंजिल होनी ही है और जरूरी नहीं कि राज्य में पुराने जख्मों को हरा करने वाले राजनीतिज्ञों की  रोजी – रोटी चलती ही रहे। 

अतः कश्मीरी संस्कृति का संरक्षण ही भारत की विविधता में एकता को बल देने वाला होगा लेकिन यह भी कम जरूर नहीं कि स्वयं भाजपा के सांसदों को ही इस राज्य के इतिहास की सही जानकारी हो। जिस तरह इस पार्टी की सांसद पूनम महाजन ने यह कहा कि आजादी के समय ही जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ का हिस्सा था उससे उनके  लम्बे वक्तव्य में कहा गया हर शब्द  बेमानी और निरर्थक हो गया।