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शी जिनपिंग का माओ अवतार

चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी अपने इतिहास के सौ साल पूरे कर चुकी है। यद्यपि पार्टी शताब्दी समारोह पहले ही मना चुकी थी लेकिन केन्द्रीय समिति के अधिवेशन में जो ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किए गए उसमें साफ है कि राष्ट्रपति शी जि​नपिंग माओ त्से तुंग का अवतार ले चुके हैं। केन्द्रीय समिति ने शी जिनपिंग को पार्टी के कोर लीडर के रूप में स्वीकार किया। ऐसा दर्जा 1945 में माओ त्से तुंग और 1978 में देंग शियाओपिंग को दिया गया था। पीपुल्स रि​पब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना के बाद चीन में जन्मे राजनेताओं में यह दर्जा पाने वाले शी जिनपिंग अकेले हैं। 

पिछले दिनों ग्लासगो में हुए जलवायु सम्मेलन में भी शी जिनपिंग शामिल नहीं हुए थे। शी इसलिए शामिल नहीं हुए क्योंकि चीन खुद सबसे बड़ा प्रदूषण फैलाने वाला देश है। पूरी दुनिया की आलोचना का सामना करने की बजाय उन्होंने देश में रहकर अपनी राजनीतिक शक्ति और बढ़ाने में लगे रहना ही उचित समझा। चीन कम्युनिस्ट पार्टी ने 1945 में जो प्रस्ताव पारित ​कराया गया था, जिसका उद्देश्य यह था कि माओ अपने आलोचकों का सफाया करना चाहते थे। इस प्रस्ताव के जरिये पार्टी ने माओवादी विचारधारा को ही पार्टी के लिए सही रास्ता मानते हुए उन्हें पार्ट का निविर्वारदी नेता स्वीकार कर लिया गया था। माओ ने इसके बाद अपने हजारों विरोधियों को खत्म कर दिया था। हैरानी इस बात की है ​की बुद्धिजीवियों की हत्याएं, विरोधियों को जेलों में डालना, अराजकता और बदहाली के बावजूद माओ को निर्विवाद नेता कैसे बना दिया गया। इस सबके लिए माओ को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया गया बल्कि चीन की क्रांति में उनके योगदान को देखते हुए उनका महिमामंडन किया गया। एक प्रस्ताव देंग शियाओ​पिंग द्वारा पारित कराया गया था, जिसका उद्देश्य उदारीकरण और सुधारों की नीति को पक्का करना था। इसलिए माओ की दिवालिया करने वाली नीतियों को खत्म करना और माओ के ग्रेट लीप और सांस्कृतिक क्रांति को भूलों में स्वीकार भी किया गया था। अब शी जि​नपिंग जो प्रस्ताव लाए जिसका उद्देश्य चीन को और शक्तिशाली बनाना और हर तरफ खुशहाली लाना है। जिनपिंग के प्रस्ताव में अतीत की भूलों का कोई जिक्र नहीं किया गया, बल्कि उनका सम्मान करने और देश को नए युग का प्रवर्तन करने की बातें कहीं गईं। शी जि​नपिंग ने आजीवन पद पर रहने का पूरा इंतजाम कर लिया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि चीन का दुनया में टकराव बढ़ा है। शी जि​नपिंग के दूसरे कार्यकाल में दुनिया के साथ कई बिन्दुओं पर टकराव बढ़ा। कोरोना महामारी हो या पर्यावरण और आतंकवाद की खेती करने वाले पाकिस्तान की मदद करना हो या अफगानिस्तान को लेकर उसकी भूमिका को लेकर चीन दुनिया में काफी अलग-थलग पड़ा है लेकिन शी जि​नपिंग पहले से कहीं अधिक मजबूत हो रहे हैं। इसके एक नहीं अनेक कारण हैं। हर क्षेत्र में चीन दुनिया में या तो टॉप पर है या फिर दूसरे नम्बर पर। चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका को टक्कर दे रही है। 

चीन लगातार सकल घरेलु बाजार के विकास पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। विज्ञान और तकनीक में भी वह काफी आगे है। कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा में चीन को दूसरी शताब्दी में आधुनिक समाजवादी देश बनाने का संकल्प निहित है। कम्युनिस्ट देश की बंदिशों के बावजूद अधिकांश लोगों ने इस संकल्प को स्वीकार कर लिया है। देश को 2049 तक पूर्ण विकसित, अमीर और ताकतवर देश बनने की चीन के नेतृत्व की बेकरारी दुनिया के बड़े देशों के लिए चिंता का ​कारण बनी हुई है। दुनिया का अतिश​क्तिशाली देश बनने की नीति से चीन पहले से कहीं अधिक आक्रामक हो रहा है।

भारत के साथ सीमा विवाद, दक्षिण चाइना सी में कृत्रिम द्वीपों के जरिये सागर को कब्जाने की कोशिश, हांगकांग में लोगों के लोकतांत्रिक प्रतिरोध को दबाना और ताइवान को लेकर अमेरिका से टकराव इसी आक्रामकता के अलग-अलग रूप हैं। यही कारण है कि चीन के खिलाफ नई तरह की गोलबंदी हो रही है और विदेश मामलों के ​विशेषज्ञ इसे एक नए शीत युद्ध की शुरूआत मान रहे हैं। शी जि​नपिंग के प्रस्ताव एक तरह से उनकी सत्ता और विरासत को ही पक्का नहीं कर रहे बल्कि चीनी जनता को ताइवान, हांगकांग, तिब्बत और भारत से हो रहे विवाद जैसे मुद्दों पर जनता को समर्थन देने के लिए तैयार कर रहे हैं। शी का सपना चीन को एक बलशाली और स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में तैयार करना है। दुनिया के सामने चुनौती यह है कि चीन की आक्रामकता कैसे कम हो। फिलहाल शी का माओकरण हो चुका है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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