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संपादकीय

‘शिवसेना-कांग्रेस’ मिलन

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महाराष्ट्र में जिस ‘सिद्धान्तहीन सत्तामूलक राजनीतिक गठबन्धन’ का प्रयोग किया गया है उसका अन्तिम परिणाम सिवाय सिद्धान्वादी राजनीतिक समीकरणों के जमीनी विस्तार के कुछ नहीं हो सकता क्योंकि सत्तावादी गठबन्धन का बिखराव सत्ता के लोभ से उपजा स्वार्थ व मोह स्वयं ही करता है। 1967 के बाद से भारत में शुरू हुई गठबन्धन सरकारों का इतिहास यही प्रमाणित करता है। 

अतः महाराष्ट्र की शिवसेना नीत कांग्रेस व राकांपा सरकार का पतन भी जिस दिन होगा उस दिन इसका मूल कारण भी यही सत्ता के लाभांश का बंटवारा होगा किन्तु अभी तो इसका सत्तारोहण हुआ है और इसके बिखराव की बात करना केवल ईर्ष्या या बैरभाव ही कहा जा सकता है अतः हमें उन कारणों पर ध्यान देना चाहिए जिनकी वजह से शिवसेना व कांग्रेस पार्टी एक मंच पर आयी है और इनमें सत्ता का बंटवारा संभव हुआ है। 

कांग्रेस के सत्ता में शामिल होने की असली वजह इसकी अपनी कमजोरी है और अपने अस्तित्व को संभाले रखने की मजबूरी है क्योंकि इसके विजयी 44 विधायकों के लिए शिवसेना-भाजपा गठबन्धन का टूटना किसी वरदान से कम नहीं था। पिछले पांच साल के भीतर शिवसेना व भाजपा गठबन्धन की फड़णवीस सरकार ने कांग्रेस की जमीन साफ करनी शुरू कर दी थी। 

यह जमीन उसी तरह साफ की जा रही थी जिस तरह उत्तर प्रदेश में बसपा व सपा ने मिल कर कांग्रेस को ‘बीज रहित’ बनाया था। भाजपा ने प्रत्येक जिले में चुन-चुन कर कांग्रेस के प्रभावशाली नेताओं को निष्क्रिय बनाने के लिए सत्ता का डंडा चलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी परन्तु शिवसेना भी सत्ता में रहने के बावजूद इस खेल को देख रही थी और अपने जनाधार को बचाने के लिए अपने जमीनी नेताओं को अति सुरक्षाभाव से पाल-पोस रही थी जिसकी वजह से शिवसैनिकों के भीतर असुरक्षित भाव पैदा हो रहा था मगर सत्ता में रहने की वजह से उनमें मजबूरी का भाव भी भर रहा था। 

केवल मात्र श्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ऐसी थी जिसकी जमीन हिलाने के लिए पिछली फड़णवीस सरकार ने इसके बड़े नामदार नेताओं को हिलाना शुरू किया और उन्हें भाजपा में शामिल करने तक की मुहीम चलाई मगर इसमें उसे आंशिक सफलता ही हाथ लगी।  अतः जैसे ही चुनाव परिणामों के बाद श्री पवार ने शिवसेना व भाजपा में कलह मचते देखी उन्होंने चुनी हुई सरकार न बनने का दोष शिवसेना पर डालना उचित नहीं समझा और भाजपा के रुख के विपरीत रुख लेते हुए शिवसेना को भाजपा के साथ गठबन्धन जारी रखने के कर्त्तव्य से मुक्त करने का सिद्धान्त प्रतिपादित करना शुरू कर दिया जिससे यह पार्टी पाला बदलने पर अपने हक के लिए लड़ती हुई दिखाई पड़े। 

वास्तव में यह सत्ता के लिए ही लड़ाई थी और सत्ता का लोभ ही इसका मुख्य कारण था जिसकी वजह से शिवसेना को कांग्रेस का समर्थन लेने में भी कोई पाप होता दिखाई नहीं पड़ा। दूसरी तरफ कांग्रेस को भी ऐसा ही आभास हुआ क्योंकि उसके कुल 44 विधायकों को लग रहा था कि यदि सत्ता में आने का यह मौका छूट गया तो अगले पांच सालों में भाजपा का शासन उसकी जमीन बहुत आसानी के साथ साफ कर देगी औऱ शिवसेना के साथ सरकार बना कर वह उत्तर प्रदेश को दोहरा देगी। यही वजह रही कि कांग्रेस के मुस्लिम विधायकों ने सबसे पहले शिवसेना के साथ गठबन्धन बनाने की वकालत की और इसे जरूरी बताया। 

इसमें किसी प्रकार के आश्चर्य की जरूरत नहीं है क्योंकि शिवसेना भी हिन्दुत्व की वकालत करती है और भाजपा भी परन्तु शिवसेना का हिन्दुत्व केवल सत्ता में हिस्सेदारी से सन्तुष्ट होता है जबकि भाजपा का हिन्दुत्व समग्र राजनीतिक कायाकल्प से। इस हकीकत को शरद पवार ने भी कई बार पहचाना और पूर्व में स्वयं राज्य का मुख्यमन्त्री रहते हुए उन्होंने सत्तावादी हिन्दुत्व की ताकत को भी तोला। अतः यह संयोग नहीं कहा जा सकता कि जिस दिन 23 नवम्बर को राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने श्री देवेन्द्र फड़णवीस को राकांपा के अजित पवार के समर्थन के बूते पर पुनः मुख्यमन्त्री पद की शपथ दिलाई थी उसी दिन शिवसेना के नवनियुक्त मुख्यमन्त्री उद्धव ठाकरे अयोध्या जाकर राम मन्दिर में माता टेकने वाले थे। 

उन्होंने यह कार्यक्रम क्यों रद्द कर दिया? वजह साफ थी कि उनका अयोध्या जाना मुम्बई में नई सरकार के गठन से जुड़ा हुआ था परन्तु बाजी पलटा खाने से उन्होंने अपने इस हिन्दुत्व को भी थोड़ा ढीला कर दिया। जाहिर है कि कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ आने पर उद्धव ठाकरे को अपने हिन्दुत्व में संशोधन करने से कोई गुरेज नहीं हो सकता क्योंकि उसका सीधा सम्बन्ध सत्ता से जुड़ा हुआ है। 

रांकपा व कांग्रेस भी आश्वस्त हैं कि ठाकरे अपने उस हिन्दुत्व को भाजपा के साथ टूटे गठबन्धन की गांठ में ही खोल कर आ गये हैं जिसे देख कर भाजपा माथा पीट रही है और बार-बार उद्धव ठाकरे को  सिद्धान्तों की दुहाई दे रही है लेकिन यह तो ठाकरे ही जानते हैं कि सिद्धान्तों की गठरी सत्ता के सिर रख कर ही राजनीतिक दल अपनी शोभा गठबन्धन काल के शुरू होने के बाद से बढ़ाते रहे हैं अतः उन्हें कांग्रेस के साथ जाने में कैसी हिचक हो सकती थी और कांग्रेस को उनके साथ जाने में।  इन  उलझे हुए समीकरणों के चलते और इनके और ज्यादा उलझने पर ही सिद्धान्तवादी राजनीति की जमीन उर्वरक बनी है इसका प्रमाण 1990 के बाद की भारत की राजनीति है।