भगवान श्रीराम हमारी आस्था के सबसे बड़े प्रतीक हैं। इस ब्रह्मांड में चप्पे-चप्पे पर भगवान श्रीराम का वजूद है और दुनिया के नक्शे पर पूरब के रूप में भारत नाम से स्थापित देश में जिस स्थान पर श्रीराम का जन्म हुआ है, वहां मंदिर बनाने को लेकर यह हंगामा क्यों है? जो इसका विरोध करता है उसे साइड लाइन कर आगे अगर नहीं बढ़ा जा रहा है तो संभवत: इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट में इसी से जुड़ा केस हो सकता है लेकिन हमारा सवाल यह है कि इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने के लिए जिम्मेवार कौन है? ऐसे में जवाबदेही उस भारतीय जनता पार्टी की बनती है, जिसने यूपी में सत्ता पाने के लिए श्रीराम लहर को जन्म दिया और फिर इसका राजनीतिक लाभ उठाया।

यह बात सत्ता के गलियारों में कही जा रही है। हमारा यह मानना है कि मंदिर का विरोध करने वाले लोग श्रीराम के वजूद को चुनौती नहीं दे सकते। अगर भारतीय जनता पार्टी ने यूपी और देश की जनता के बीच मंदिर निर्माण का संकल्प अपनी सहयोगी संस्थाओं के दम पर लिया है तो फिर इसके बनाने में या फिर इसके निर्माण की पहल में दिक्कतें क्यों आ रही हैं? जिस समय बाबरी मस्जिद गिराई गई और हिन्दू संगठनों ने पुरानी बाबरकालीन बड़ी-बड़ी ईंटें अपने यहां प्रतीकों के रूप में रख लीं तो फिर पिछले 20 साल से ज्यादा का वैक्यूम भरा जाना चाहिए था। आज यह सवाल इसलिए प्रासंगिक है कि केंद्र और यूपी के अंदर भाजपा की सरकार धड़ल्ले से चल रही है।

प्रधानमंत्री मोदी दुनिया के लोकप्रिय लोगों में से एक हैं और यूपी में हिन्दू शासन की मजबूती के लिए योगी आदित्यनाथ प्रसिद्ध हैं तो फिर अयोध्या में श्रीराम की जन्मस्थली पहले से है, वहां मंदिर बनाने में अब देर क्यों की जा रही है? मंदिर को लेकर बिना मतलब की ड्रामेबाजी की जा रही है। कहने वाले कह रहे हैं कि भाजपा की पहचान मूल रूप से हिन्दू पार्टी और श्रीराम भक्त के रूप में हुई है। यूपी में तो कम से कम यही स्थापित हो चुका है। प्रचंड बहुमत के बावजूद अगर शासन और प्रशासन श्रीराम का मंदिर नहीं बना सकता और उसके नाम पर पूरे देश में एक विवाद खड़ा कर दिया जाता है तो फिर यह गीत उभरते हैं- देखो ओ दीवानो तुम ये काम न करो राम का नाम बदनाम न करो।

पिछले दिनों उस यूपी में जहां खुद गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ पांच बार जीत चुके हैं और डिप्टी सीएम केशव मौर्या 2014 में तीन लाख से ज्यादा वोटों से जीते, केवल चार साल में भाजपा ने ये दोनों सीटें गंवा दीं? इसी कारण लोग कहने लगे हैं कि अगर मंदिर बना दिया जाता तो बसपा-सपा को एक होने का मौका न मिलता। अगर 2019 में भाजपा ने सत्ता पानी है और तब तक अगर मंदिर के लिए ईंटें लगनी शुरू हो गईं तो समझ लो देश के लोग एक बार फिर से सत्ता प्लेट में परोसकर मोदी और योगी सरकार को सौंप देंगे, लेकिन कष्ट की बात यह है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है।

कई मुस्लिम संगठनों को अपनी ठेकेदारी दिखाने का मौका इसलिए मिल गया, क्योंकि सत्ता में चाणक्य बनने के शौक में श्रीश्री रविशंकर अपने आप ही मध्यस्थ के रूप में उभर गए और उनसे बातचीत की पहल करने लग गए। लिहाजा सारा माहौल बिगड़ गया और सरकार की नीयत पर शक करने की बात कहकर लोग एक-दूसरे से साेशल साइट्स पर शेयरिंग करने लगे हैं। अजीब स्थिति है कि सुप्रीम कोर्ट की नजर में केवल तीन पक्ष इस समय मौजूद हैं, जो कि रामलला न्यास बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के रूप में हैं।

कहते हैं कि जमीन पर कब्जा सुन्नी वक्फ बोर्ड का था। कितनी अजीब बात है कि दस्तावेजों के प्रमाणीकरण को लेकर कोर्ट में बीस वर्ष से ज्यादा का वक्त बीत गया। कोर्ट-कचहरी का मतलब यही है कि किसी केस को वर्षों-वर्ष तक लंबा खींचने के लिए तारीख पर तारीख की व्यवस्था निभाते चले गए। सबसे बड़ा पक्ष यह होना चाहिए कि मंदिर है, जिसे सब मानते भी हैं, तो फिर मंदिर निर्माण को महज मकसद मानकर इसकी ईंट रखने के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट से अपील की जानी चाहिए।

कभी विश्व हिन्दू परिषद और साधू-संतों ने आरएसएस की पहल पर मंदिर निर्माण को भाजपा के एक संकल्प के रूप में जोड़कर इसे सत्ता दिलवाई, लेकिन अब कोर्ट-कचहरी में लेट-लतीफी का चलन और परिणाम हर कोई जानता है। ऐसे में जितनी जल्दी हो सके मंदिर निर्माण होना चाहिए, तभी लोगों का भारतीय जनता पार्टी पर भरोसा बना रह सकता है। अगर मंदिर पर लोगों का भाजपा से भरोसा उठ गया तो फिर सत्ता भाजपा के हाथ में कभी नहीं आ सकती। दुर्भाग्य से अगर दिल्ली के परिदृश्य में देखें तो 1993 के बाद से लेकर 1998 तक कभी भाजपा को विधानसभा में सत्ता नहीं मिली।

वह इसलिए क्योंकि जब कांग्रेस का 15 साल बाद विदाई का मौका आया तो लोगों के विश्वास पर पहली बार वजूद में आई आम आदमी पार्टी खरी उतरी। अब देश और यूपी में अगर अपना विश्वास बनाना है तो भाजपा को श्रीराम मंदिर बनाना ही होगा। सुप्रीम कोर्ट में जिस तरह से इस केस की पैरवी हो रही है वह काले कोट वाले जानें। हम तो इतना जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट हो या ऊपर वाले की कोर्ट, केवल मात्र मंदिर निर्माण के लिए पहली ईंट रखने की ही बात हो। इस इजाजत के बाद पूरा देश कारसेवा में जुट जाएगा।

इसका इंतजार हमें और यकीनन रूप से श्रीराम प्रेमियों को रहेगा। अगर आपने कहा है ‘सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे’ तो फिर इसे निभाने का वक्त आ गया है। भाजपा के हाथ में परमानेंट सत्ता के ताले की चाबी इसी तरीके से आएगी। इसके लिए किसी रणनीति या तर्क-वितर्क की जरूरत नहीं। मंदिर निर्माण की पहल अगर भाजपा ने कर दी और जनता का दिल जीत लिया तो लोग हमेशा के लिए इसे अपने दिलो-दिमाग पर बैठा लेंगे।