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उत्तराखंड और गोवा का महत्व

देश के दो राज्यों गोवा और उत्तराखंड में मतदान पूरा हो चुका है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में भी दूसरे चरण का चुनाव सम्पन्न हो चुका है मगर यहां मतदान के अभी पांच चरण और होने हैं उसके बाद ही राज्य की सभी 403 विधानसभा सीटों का चुनाव पूरा होगा। गोवा और उत्तराखंड छोटे राज्य माने जाते हैं जिनमें विधानसभा की सीटें क्रमशः 40 और 70 हैं। इन दोनों ही राज्यों में फिलहाल भाजपा की सरकारें हैं। ये दोनों ही राज्य अपेक्षाकृत नये पूर्ण राज्य हैं बल्कि गोवा तो 1961 में ही पुर्तगाली शासन से मुक्त हो पाया था और उसके बाद यह केन्द्र शासित क्षेत्र रहने के बाद पहले अर्ध राज्य बना और बाद में पूर्ण राज्य बना जबकि उत्तराखंड का निर्माण 2000 में वाजपेयी शासन के दौरान उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र को काट कर हुआ। दोनों ही राज्यों में सबसे बड़ी विविधता यह है कि गोवा समुद्र तट पर बसा राज्य है जबकि उत्तराखंड पर्वतीय हिमालय की गोद में बसा राज्य है। इन दोनों ही राज्यों की विकास की क्षमताएं अलग-अलग हैं और जरूरतें भी अलग-अलग हैं। गोवा के बारे में उत्तर भारत के लोगों को प्रायः इतनी ही जानकारी रहती है कि यह सैर-सपाटे के लिहाज से उत्तम प्रदेश है मगर इसकी विशिष्टताओं के बारे में कम लोग ही जानते हैं। 

सबसे पहले यह जानने की जरूरत है कि यह देश का सबसे कम क्षेत्रफल वाला प्रदेश है मगर आय के लिहाज से पहले नम्बर पर रहने वाला राज्य है। इसके आम ना​गरिक की औसत आय आम भारतीय से कहीं ज्यादा है और जीवन जीने की गुणवत्ता भी अव्वल है जबकि विकास वृद्धि दर औसत भारत की दर से ढाई गुना है। इसका इतिहास भी गजब का है। ईसा से पूर्व यह सम्राट अशोक महान के साम्राज्य का हिस्सा था मगर बाद में मध्य पूर्व में दक्षिण राजाओं के मातहत आने के बाद यह बीजापुर के नवाब के शासन में चला गया और 1520 के करीब पुर्तगालियों ने गोवा एवं दमन व दीव को अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद भारत में अंग्रेजों का शासन आने के बावजूद इन क्षेत्रों पर पुर्तगालियों का राज्य ही रहा और भारत के 1947 में स्वतन्त्र होने के बावजूद इसकी स्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ा। 

गोवा की स्वतन्त्रता के लिए आजाद भारत में एक नई मुहीम गांधीवादी तरीके से चलाई गई मगर पुर्तगाल सरकार द्वारा कोई ध्यान न देने पर दिसम्बर 1961 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री प. जवाहर लाल नेहरू ने सेना का ‘आपरेशन विजय’  कराया और गोवा तथा दमन व दीव स्वतन्त्र करा लिये गये। इसके बाद इस राज्य की सबसे अग्रणी गोवा आजादी की पार्टी महाराष्ट्रवादी गोमान्तक पार्टी को इसे केन्द्र शासित क्षेत्र बना कर सत्ता पर बैठा दिया गया जिसके नेता स्व. दयानन्द बांदोडकर थे। गोवा एक और मायने में विशिष्ट राज्य भी है कि आजाद भारत में केवल इसी राज्य में जनमत संग्रह कराया गया था और इसके लोगों से पूछा गया था कि क्या वह महाराष्ट्र में विलय करेंगे अथवा अपना स्वतन्त्र अस्तिव रखेंगे। 16 जनवरी 1967 को यह जनमत संग्रह कराया गया था जिसमें लोगों ने अपना अलग वजूद बनाये रखने के पक्ष में राय दी। इसके बाद गोवा को पहले अर्ध राज्य बनाया गया  और दमन व दीव को केन्द्र शासित क्षेत्र बनाया गया और बाद में 1987 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। अर्ध राज्य बने रहने तक इस राज्य में महाराष्ट्रवादी गोमान्तक पार्टी का शासन ही स्व. बांदोडकर के बाद उनकी पुत्री शशिकला काकोडकर के मुख्यमन्त्री रूप में रहा मगर पूर्ण राज्य बनने पर इस राज्य में 1990 से राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस का शासन आ गया और बाद में महाराष्ट्रवादी गोमान्तक पार्टी के भाजपा में विलय के बाद यहां भाजपा शक्तिशाली होती गई और कालान्तर में यह भी सत्ता पर बैठने में सफल होती गई। जबकि इसके विपरीत उत्तराखंड भारत के गरीब राज्यों में से एक है और इसकी सीमाएं चीन से भी मिलती हैं। 

2000 में जब इसका निर्माण किया गया तो इस नये राज्य के मुख्यमन्त्री पद पर बैठने का अवसर श्री नित्यानन्द स्वामी को मिला जो मूल रूप से पर्वतीय जाति के नहीं थे मगर उत्तर प्रदेश में भाजपा का शासन होने की वजह से इस राज्य की नई विधानसभा की संरचना उत्तर प्रदेश के सत्ता समीकरणों की छाया में ही हुई और भाजपा को अपना मुख्यमन्त्री नियुक्त करने का अवसर मिला परन्तु इसके बाद 2002 में जब पहली विधानसभा के चुनाव हुए तो कांग्रेस विजयी हुई और मुख्यमन्त्री के पद पर पार्टी के महारथी कहे जाने वाले स्व. नारायण दत्त तिवारी बैठे। अभी तक स्व. तिवारी ही इस राज्य के एेसे नेता रहे हैं जो अपने पद पर लगातार पांच वर्ष बने रहे हैं। उनके बाद भाजपा विजयी हुई मगर इसका कोई भी नेता पूरे पांच साल तक मुख्यमन्त्री नहीं बना रह सका और पार्टी ने अपने मुख्यमन्त्री बदले। अगली बार फिर कांग्रेस आयी और इसकी हालत भी भाजपा जैसी ही रही। यह भी अपने मुख्यमन्त्री बदलने के लिए मजबूर हुई।  पिछले चुनावों में पुनः भाजपा आयी मगर फिर इसने अपने मुख्यमन्त्री कई बार बदले।

उधर गोवा में दूसरी समस्या दल बदल की पैदा हुई और इस्तीफा संस्कृति के चलते यहां भी मुख्यमन्त्री अदलते-बदलते रहे। एक प्रकार से छोटे राज्यों में पूर्ण बहुमत की सरकारें भी इसी वजह से डावांडोल रहती हैं कि क्षेत्रीय नेतृत्व इतना शक्तिशाली नहीं होता कि उसका दबदबा काबिज हो सके।  यह स्वयं में विरोधाभास ही कहा जायेगा कि छोटे राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय नेताओं का अभाव रहता है जबकि बड़े राज्यों में ‘क्षत्रप’  पाये जाते हैं। इसका हल तो राजनीतिक दल ही निकाल सकते हैं जनता तो पूर्ण बहुमत ही किसी एक पार्टी को दे सकती है। अतः यह देखना बहुत रोचक होगा कि आगामी 10 मार्च को इन राज्यों की जनता किस पार्टी के हक में लाटरी खोलती है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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