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पाकिस्तान में सिख निशाने पर

पाकिस्तान में हिन्दू और सिख समुदाय के लोगों के लिए जिंदगी जीना एक संघर्ष बन चुका है। सत्ता परिवर्तन के बाद भी माहौल अशांत है। पाक के खैबर पख्तूनवा क्षेत्र में स्थित सरबंद इलाके में अज्ञात हमलावरों ने सिख समुदाय के दो लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी। मसालों के दुकानदार सलजीत सिंह और रंजीत सिंह की हत्या से सिखों समेत हर समुदाय आहत है। पेशावर में सिख समुदाय के अधिकतर सदस्य व्यवसाय से जुड़े हैं, जबकि कुछ फार्मेसियां भी चलाते हैं। पाकिस्तान में हिन्दू ​सबसे बड़े धा​र्मिक अल्पसंख्यक हैं, ईसाई दूसरे सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक हैं। अहमदी, सिख और पारसी भी पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों में से हैं। पाकिस्तान में हिन्दुओं और सिखों और अन्य अल्पसंख्क समुदाय पर अत्याचारों की लंबी दास्तान है। पिछले साल सितम्बर में एक प्रसिद्ध सिख पूजारी हकीम सरदार सतनाम  सिंह खालसा की पेशावर में उनके क्लीनिक में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। 2018 में सिख समुदाय के एक प्रमुख सदस्य चरणजीत ​सिंह की पेशावर में ही हत्या कर दी गई थी। 

2019 में पाकिस्तान ने अपनी ओर वैश्विक ध्यान उस समय आक​र्षित किया जब इसने करतारपुर में भारत से आने वाले सिख श्रद्धालुओं के लिए गुरुद्वारा खोला। मगर वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान में सिख समुदाय लगातार भेदभाव को झेल रहा है। पाकिस्तान के अशांत उत्तर-पश्चिमी भाग में मुख्य तौर पर रहने वाले सिख डर के साए में जी रहे हैं। 500 वर्ष पुराने धर्म की स्थापना ननकाना साहिब में हुई थी जोकि सिखों के पहले गुरु श्री गुरु नानक देव जी की जन्मस्थली है और अब यह पाकिस्तान में ​स्थित है। 1947 में भारत के विभाजन के समय पाकिस्तान में 20 लाख से ज्यादा सिख रहते थे और लाहौर, रावलपिंडी और फैसलाबाद जैसे बड़े शहरों में सिख समुदाय की महत्वपूर्ण आबादी रहती थी। भारत-पाकिस्तान की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ज्यादातर सिखों ने पाकिस्तान को भारत के लिए छोड़ा जबकि पाकिस्तान की नैशनल डाटाबेस एंड रजिस्ट्रेशन अथारिटी का दावा है कि पाकिस्तान में 6,146 पंजीकृत सिख हैं। एक एनजीओ सिख रिसोर्स एंड स्टडी सैंटर द्वारा करवाई गई जनगणनता के अनुसार अभी भी वहां पर 50 हजार के करीब सिख रहते हैं। सिखों को 2017 की जनगणना में शामिल नहीं किया गया था इसलिए उनके बारे में कोई वास्तविक आंकड़ा नहीं है। ज्यादातर सिख खैबर पख्तूनवा में रहते हैं उसके बाद सिंध और पिऊर पंजाब की बारी आती है। अमरीकी गृह विभाग सहित अन्य स्रोतों का दावा है कि पाकिस्तान में रहने वाले सिखों की आबादी 20 हजार है।

एक पृथक पहचान के तौर पर गिने न जाने की की गई मांग के बावजूद अभी तक लगातार अदालतों के आदेशों और सरकारी भरोसे के बावजूद आंकड़े ब्यूरो ने पाकिस्तान में रहने वाले सिखों की गिनती जारी नहीं की है। इस कारण पाकिस्तान में सिखों की आबादी का कोई वास्तविक आंकड़ा नहीं है। मगर लोगों का कहना है कि पिछले 2 दशकों के भीतर इस समुदाय का आकार बेहद सिकुड़ कर रह गया है। जहां 2002 में यह गिनती करीब 50 हजार थी अब यह मात्र कुछ हजार रह गई है। चूंकि पाकिस्तान में सिखों की गिनती कम हो गई इस कारण इस समुदाय के अधिकारों में भी गिरावट पाई गई है। एक अलग पहचान होने के कारण सिख समुदाय को बड़ी से बड़ी चुनौती पेश आती है। हिंसा झेलने के अलावा सिख समुदाय को पगड़ी और कड़ा पहनने के कारण भी प्रताड़ना झेलनी पड़ी है। 2011 में नसीरा पब्लिक स्कूल कराची में 2 छात्रों को अपनी पगड़ी और कड़ा कुछ अज्ञात कारणों से उतारने के लिए उन पर दबाव डाला गया था। एक दूसरे मामले के तहत एक सिख व्यक्ति को एक कंपनी ने इसलिए निकाल दिया क्योंकि उस व्यक्ति ने सिख जीवन शैली को अपना रखा था। उसने अपनी कलाई में कड़ा और अपने लंबे केश को ढंकने के ​लिए एक पगड़ी पहन रखी थी। वह हर समय कृपाण को अपने साथ रखता था। इसके नतीजे में सिख युवकों में साक्षरता दर भी कम हो गई।

पाकिस्तान में सिखों का धार्मिक स्थल ननकाना साहिब गुरुद्वारा भी कट्टरपंथी ताकतों के निशाने पर रहा है। एक बार तो कट्टरपंथियों ने गुरुद्वारे को घेर लिया था और उसे ध्वस्त करने की धमकी दे दी थी। कट्टरपंथियों ने गुरुद्वारे का नाम गुलाम-ए-मुस्तफा रखने की चेेतावनी भी दी थी। सिख प्रतिनिधियों का जबरन धर्म परिवर्तन भी सिखों के लिये बड़ा खतरा है। पाकिस्तान के हिन्दू और सिख परिवारों की कहानियां रूला देने वाली हैं। मजहब के आधार पर अत्याचार जारी है और हर साल एक हजार से अधिक महिलाओं काे जबरन धर्म परिवर्तन करने को मजबूर किया जाता है। पाकिस्तान से हिन्दू-सिखों का पलायन जारी है। अनेक परिवार भारत आकर शरण लेते हैं। वर्ष 2019 में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीर-ए-इंसाफ के पूर्व विधायक बलदेव सिंह ने पाकिस्तान में अत्याचारों की पोल खोल दी थी और भारत में आकर शरण मांगी थी।

भारत सरकार ने इन हत्याओं पर पाकिस्तान सरकार से कड़ा प्रोटेस्ट जताया है और दोषियों को दंडित करने की मांग की है। दरअसल पाकिस्तान का अस्तित्व भारत के विरुद्ध घृणा और प्रतिशोध पर आधारित है तो दूसरी तरफ बदलती  हुई दुनिया के अनुरूप वहां के समाज में बदलाव नहीं आया और मध्ययुगीन मानसिकता के कारण वह आज भी हत्याओं में लिप्त है। प्रधानमंत्री शहनाज शरीफ को चाहिए कि वह मृतकों के परिवारों को काम दिलाये और दोषियों को सजा दिलाए।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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