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आम आदमी का खास सम्मान!

लोकतंत्र में नागरिक पुरस्कारों का होना बहुत लाजिमी है ताकि सृजनात्मकता को सम्मानित करके और लोगों को प्रेरित किया जा सके कि वे भी उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करने का प्रयास करें। इस दृष्टिकोण के तहत यह काम सरकार से बढ़कर कोई दूसरा नहीं कर सकता। औद्योगिक घराने या निजी संस्थान सिर्फ अपने कार्पोरेट हितों को देखते हैं न कि राष्ट्रीय हित पर जनसेवा में किसी व्यक्ति का योगदान। विडम्बना यह रही कि इन पुरस्कारों का राजनीतिकरण कर दिया गया था। नरेन्द्र मोदी के सत्ता सम्भालने के बाद जमीन से जुड़े लोगों और समाज आैर देश के प्रति समर्पित रहे गुमनाम नायकों को पदम पुरस्कारों से नवाजे जाने का सिलसिला शुरू हुआ और गुमनाम नायकों को अपनी पहचान मिली। पहले राजनीतिक दल दबाव डालकर या प्रभावित करके अपनी पसंद के लोगों को यह अवार्ड दिला देते थे। इससे होता यह रहा कि जो लोग इस अवार्ड के पात्र नहीं होते थे उन्हें तो अवार्ड मिल जाता था लेकिन जिन लोगों ने अपना सारा जीवन देश या अपने विषय से संबंधित सेवा में लगा दिया हो, उसे पुरस्कार दिया नहीं जाता था। ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने हैं कि बहुत लोगों को उचित सम्मान मिला ही नहीं। राष्ट्र के लिए योगदान से ज्यादा इस बात को देखा जाता रहा कि व्यक्ति सत्ता के कितना करीब है। सब अपनो-अपनो को रेवड़ियां बांटने लगे तो 1977 से पहले इन नागरिक पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया पर सवाल उठने शुरू हो गए थे। जनता पार्टी की सरकार ने 1977-1980 तक नागरिक पुरस्कार देना ही ​िनरस्त कर ​िदया था लेकिन 1980 में कांग्रेस सरकार ने इन्हें फिर से शुरू ​िकया था। इन पुरस्कारों के लिए जिन व्यक्तियों को ना​िमत किया जाता है उनसे उम्मीद की जाती है ​िक वे गैर विवादित हों और राष्ट्र या विश्व के हितों के लिए उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की हो। पुरस्कारों को लेकर कई बार विवाद भी उठे। 

कभी कल्पना भी नहीं की थी कि कैमरों के चमकते फ्लैश आैर तालियों की गड़गड़ाहट के बीच राष्ट्रपति भवन के रेड कार्पेट पर नंगे पांव बढ़ने आैर कुछ बहुत ही साधारण से ​िदखने वाले लोग कोई साधारण नहीं बल्कि समाज में असाधारण करने वाले व्यक्तित्व हैं। कर्नाटक के हरकेला हजव्बा पांवों में चप्पल तक नहीं आैर शिक्षा के नाम पर काला अक्षर भैंस बराबर। उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया। ऐसा इसलिए कि उन्होंने ठान लिया था कि वे तो पढ़ नहीं सकी लेकिन गांव का एक भी बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा। संतरे बेच कर पैसे जुटाए आैर गांव में स्कूल खोल दिया। 

72 वर्षीय तुलसी गोड़ा कपड़ों के नाम पर केवल चादर लपेटे हुए आईं। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह जैसी हस्तियों ने हाथ जोड़कर अभिवादन किया तो वे एक पर्यावरण योद्धा का सम्मान कर रहे थे। तुलसी गोड़ा पिछले 6 दशकों से पर्यावरण की अलख जगा रही हैं। आदिवासी परिवार में जन्मी तुलसी गोड़ा कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन जंगल में पाए जाने वाले पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों के बारे में इतनी जानकारी है ​िक उन्हें इनसाइक्लोपीडिया ऑफ फारेस्ट कहा जाता है। अब तक वह करीब 30 पौधों को पेड़ों का रूप दे चुकी हैं। 

पद्मश्र​ी हा​िसल करने वाली महाराष्ट्र के अहमद नगर की साधारण महिला राहीबाई सीमा पोपरे का पेशा खेती किसानी है लेकिन वह नारी सशक्तिकरण की एक सशक्त मिसाल हैं। उन्हें पीड मदर कहा जाता है। उन्हें जैविक खेती में महारत हासिल है। पद्मश्री प्राप्त करने वाली ट्रांसजेंडर मंजम्मा जोगती की जीवन संघर्ष की गाथा है। मजूनाथ से मंजम्मा बनने की कहानी भी आसान नहीं है। समाज की तमाम चुनौतियों से जूझते हुए उसने जोगती नृत्य सीखा। इस पारम्परिक लोक नृत्य को जो महिलाएं करती हैं वह ट्रांस वीमेन होती हैं। नृत्य करके वह अपनी भूख से लड़ती रहीं। उन्हें 2006 में कर्नाटक जनपद अकादमी अवार्ड दिया गया था। आज वह कर्नाटक जनपद अकादमी की पहली ट्रांसजेंडर अध्यक्ष हैं। यह संस्था राज्य में लोक कला को आगे बढ़ाती है। कुछ साल पहले तक ऐसा माना जाता था कि यह पुरस्कार उन्हीं लोगों को मिलते हैं जिनकी कोई हैसियत हो और वह विमानों में बिजनेस क्लास में सफर करते हों लेकिन पिछले कुछ वर्षों से आम आदमी भी इन पुरस्कारों से नवाजे जाने लगे। इस बार लावारिस शवों का अं​ितम संस्कार करने वाले मोहम्मद शरीफ को भी पुरस्कार से नवाजा गया है। ऐसे लोगों को सम्मान मिलने से पद्म सम्मान की भी आभा बढ़ी है और यह धारणा ध्वस्त हो चुकी है कि नागरिक पुरस्कार केवल सत्ता के गलियारों तक पहुंच रखने वालों को ही ​िमलता है। इसका श्रेय नरेन्द्र मोदी की सरकार को जाता है। नागरिकों को प्रेरित करने वाले इन सम्मानों को उन लोगों को दिया जा रहा है जो वास्तव में इसके हकदार हैं। ऐसी प्रतिभा सम्मान समाजसेवियों, कला, साहित्य और संस्कृति विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और उद्योगपतियों आैर देश कोे सामाजिक आैर आर्थिक क्षेत्र में उन्नति दिलाने वालों का उचित मंच पर ​िनष्पक्ष और सही मूल्यांकन होना ही चाहिए, ताकि देश आैर समाज हर मोर्चे पर समृद्ध बन सके।