श्रीश्री : दरकता जा रहा है अक्स


हमने हमेशा कुछ इन्सानों को भगवान का दर्जा दिया। देखते ही देखते इन्सान देव हो गए लेकिन हमारी आस्थाएं बार-बार टूटीं। इन्सानों द्वारा बनाए गए देवों ने लड़कियों से बलात्कार किया, यौन रैकेट चलाए। करोड़ों, अरबों का व्यापार किया, अरबों रुपए की सम्पत्ति अर्जित की और अंततः जेल गए। ऐसी स्थिति में आस्था तो टूटनी ही थी। पहले प्रतिमान टूटे, फिर प्रतिमाएं। आस्था की ऐसी प्रतिमाओं का टूटना कभी अच्छा नहीं रहा। इन्सान को देवता बनाता है समाज, जब समाज की आस्था टूटती है तब समाज भीतर से टूट जाता है। समाज सोचने लगता है कि जिसे उसने देव बनाया उसी ने छल किया तो फिर किसी के प्रति आस्था, निष्ठा रखने का क्या औचित्य? पिछले वर्ष श्रीश्री रविशंकर के आर्ट ऑफ लिविंग की ओर से आयोजित तीन दिवसीय विश्व संस्कृति महोत्सव को लेकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने यमुना खादर की पारिस्थिितकी को नुक्सान पहुंचाए जाने के मामले में 5 करोड़ का जुर्माना लगाया।

एनजीटी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘‘हम आर्ट ऑफ लिविंग को यमुना खादर को क्षतिग्रस्त करने के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं और इसलिए उसे दुरुस्त करने के लि​ए धनराशि देनी ही होगी। हरित न्यायालय ने दिल्ली विकास प्राधिकरण से भी खादर क्षेत्र में मरम्मत कार्य के लिए लगने वाली धनराशि के ताजा मूल्यांकन कर अनुमानित लागत बताने को कहा है। प​र्यावरणविद् इस महोत्सव के आयोजन काे लेकर पहले से ही विरोध में थे। इस महोत्सव के दौरान यमुना खादर के एक हजार एकड़ क्षेत्र का इस्तेमाल किया गया था जिसमें 35 हजार संगीतकार आैर नर्तकों के लिए 7 एकड़ का मंच बनाया गया था। हैरानी होती है आर्ट ऑफ लिविंग की प्रतिक्रिया देखकर। आर्ट ऑफ लिविंग इस बात से इन्कार कर रहा है कि उसने कोई नुक्सान पहुंचाया है। उसने हरित न्यायालय के फैसले को गलत करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की ठान ली है। आर्ट ऑफ लिविंग के प्रमुख श्रीश्री रविशंकर भी वि​नम्रता से इस फैसले को स्वीकार करने की बजाय कानूनी लड़ाई लड़ने पर आमादा दिखाई दे रहे हैं।

एनजीटी ने आर्ट ऑफ लिविंग के अलावा ​दिल्ली विकास प्राधिकरण को भी जिम्मेदार माना है। डीडीए ने इस कार्यक्रम को करने की अनुमति दी थी। हरित न्यायालय ने डीडीए को कोई जुर्माना नहीं लगाया। इस पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं लेकिन न्यायालय का कहना है कि डीडीए यमुना खादर में बायोडायवर्सिटी बनाने का काम शुरू करने जा रहा है। श्रीश्री के निजी कार्यक्रम में सरकारी मदद पर सवाल उठ खड़े हुए थे जिसका आज तक कोई उत्तर नहीं मिला है। गौतमबुद्धनगर के लाेक निर्माण विभाग ने करीब 4 करोड़ की लागत से 400 मीटर लम्बा एक पंटून पुल बनाया था। ऐसा केन्द्र सरकार के अनुरोध पर उत्तर प्रदेश सरकार ने किया था। दूसरा पुल भारतीय सेना ने बनाया था। लोक निर्माण विभाग और सेना का किसी निजी आयोजन से क्या लेना-देना था। आयोजन के लिए​ किए गए निर्माण में लोक निर्माण विभाग और सैन्य बलों ने किसी आधिकारिक प्रावधान के तहत मदद की थी? दिल्ली विकास प्राधिकरण के अनुमति पत्र से भी स्पष्ट है कि आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन न तो उत्सव का आयोजक था आैर न ही उसने उत्सव के लिए जमीन उपयोग की अनुमति के लिए आवेदन किया था।

आयोजक एक अन्य ट्रस्ट व्यक्ति विकास केन्द्र था और उसने ही अनुमति के लिए आवेदन दिया था। अनुमति देते समय डीडीए ने कई शर्तें लगाई थीं कि आयोजन स्थल पर वह कोई मलबा नहीं डालेगा, कोई कंक्रीट का निर्माण नहीं होगा। नदी से सुरक्षित और पर्याप्त दूरी बनाकर रखी जाएगी। इसके बावजूद कोई सावधानी नहीं बरती गई। आयोजन के लिए कुछ किसानों की फसल बर्बाद कर दी गई। श्रीश्री रविशंकर मौके पर गए भी थे और उन्होंने कहा था कि उन्हें नहीं मालूम कि किसानों की फसल बर्बाद हुई है। उन्होंने वादा किया था कि किसानों को हर्जाना दिया जाएगा लेकिन कोई नहीं आया। अपने नाम के आगे दो बार श्रीश्री लगाने वाले रविशंकर को चाहिए कि हरित न्यायालय द्वारा उनकी संस्था को दोषी ठहराए जाने का फैसला स्वीकार कर यमुना खादर की पारिस्थितिकी को सही बनाने के लिए प्रशासन के साथ मिलकर काम करते व आयोजक होने के नाते वह कोई संजीदा पश्चाताप करते, सृजनात्मक ढंग से सोचते लेकिन उन्होंने तो अपने कुतर्कों से आयोजन को सही ठहराने का प्रयास ही किया। इससे उनकी छवि को नुक्सान पहुंचा है। यमुना खादर को नुक्सान पहुंचाने वाले राम मंदिर मामले में मध्यस्थ बनने चले थे। अक्स दरकता है तो फिर दरकता ही चला जाता है। उसे रोकना आसान नहीं होता। कौन थे वे लोग जिन्होंने इस आयोजन के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया। नाम तो उनके भी सामने आने चाहिएं।