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75 वर्ष बाद दलितों की स्थिति

सत्ता पक्ष हो या विपक्ष कोई भी राजनीतिक दल खुद को दलितों के खिलाफ नहीं दिखाना चाहता और इसकी वजह भी है। देश की राजनीति में दलित समुदाय बड़ी ताकत है। 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में दलितों की आबादी करीब 17 फीसदी है। देश की कुल जनसंख्या में 20.14 करोड़ दलित  हैं। 31 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में अनुसूचित जातियां अधिसूचित हैं। 1241 जातीय समूहों को अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया है। चुनावों में दलित मतदाताओं की काफी अहम भूमिका रहती है। दलितों की सियासी ताकत को देखते हुए सभी राजनीतिक दल उन्हें अपने पाले में लाने की कवायद में लगे रहते हैं। हम यह उदाहरण बार-बार देते हैं की  श्रीराम ने समाज में समता और समरसता स्थापित करने के लिए किसी से भेदभाव नहीं किया। शबरी के झूठे बेर खाये, जटायुराज से प्रेम किया और हनुमान को गले लगाया, लेकिन हम वास्तविकता भूल जाते हैं कि दलित समाज आज भी शोषित और अन्याय का शिकार है। दलित समाज आज भी तड़पता रहता है और प्रशासन और पुलिस मौन रहती है। दलितों के अथाह दुखों का कोई अंत निकट दिखाई नहीं दे रहा।

अनुसूचित जाति के लोगों का किसी अत्याचार के कारण मरना या उसके साथ अन्याय  होना नियमित होने वाला और लगभग स्वीकार हो चुका मामला बन गया है। दलित आज भी विषमता और विद्वेष का शिकार हैं। इसका जीता जागता प्रमाण ओडिसा के पुरी जिले के गांव नथापुर के दलित परिवारों को पलायन कर 20 किलोमीटर दूर अपनी झोपड़ियां बनानी पड़ीं। दलित पलायन को इसलिए विवश हुए क्यों​िक उन्होंने उच्च जाति के ग्रामीणों के आदेश मानने से इंकार कर दिया। परम्पराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार उच्च जाति के परिवारों की शादियों में दलित समुदाय के लोग पालकी लेकर आगे चलते हैं और दूल्हे या दुल्हन की गांव तक अगवानी करते हैं। 

2013 में दलित समाज के युवाओं ने पालकी उठाने से इंकार कर दिया था। उसके बाद दलित समाज के लिए मछली पकड़ने के सभी रास्ते बंद कर दिए गए। उनसे जीने के साधन छीने जाने लगे। स्कूलों से पढ़-लिखकर निकले युवा चेन्नई, बेंगलुरु को पलायन कर गए। अनेक लोगों ने निकटवर्ती गांवं में खेतों में मजदूरी शुरू कर दी है। मामला शांत हो गया लेकिन फरवरी 2021 में एक दलित 25 वर्ष बाद अपने गांव लौटा और उसने एक हॉकर से मिठाई खरीदी तो इस पर उच्च जाति के व्यक्ति ने आपत्ति की। दलितों के लिए राशन की दुकानें बंद कर दी गईं। दलितों का गांव में प्रवेश वर्जित कर दिया गया। गांव के तालाब में उनके नहाने और कपड़े धोने पर रोक लगा दी गई। दबंगों ने केवल यही शर्त रखी कि दलित पहले की तरह पालकी उठाना शुरू करें। दलितों की नई पीढ़ी शिक्षित है, उन्हें पालकी उठाना स्वीकार्य नहीं है।

 स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी जाति आधारित भेदभाव खत्म नहीं हुआ। अधिकांश दलितों को इस बात का डर है कि गांव में लौटे तो भी दबंगों द्वारा उनका सामाजिक बहिष्कार जारी रहेगा। कुछ गांव में लौटे तो उनके घरों में तोड़फोड़ की गई। आज भी बिना परमर्षिक दिए या फिर साल में 15 किलो चावल की एवज में दलितों से बंधुआ मजदूरी कराई जाती है। आज भी ऊंची जाति की युवती से प्रेम करने या शादी करने पर दलित युवकों की हत्या कर दी जाती है। सवर्ण जातियों के मुहल्लों में दलित युवक घोड़े पर सवार होकर बारात नहीं निकाल सकता। आज भी ऊंची जाति के लोगों द्वारा श्मशानघाटों पर उन्हें अंतिम संस्कार नहीं करने दियाजाता। एक सामाजिक अध्ययन में कहा गया है कि दलित अभी भी भारत के गांवों में कम से कम 46 तरह के बहिष्कारों का सामना करते हैं, जिसमें पानी लेने से लेकर मंदिरों में घुसने तक के मामले शामिल हैं।

1950 में जब हमने संवैधानिक गणतंत्र को अपनाया था, तब सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और धार्मिक रूप से बहिष्कृत जाति के लोगों को मौलिक और कुछ विशेष अधिकार मिले थे। धारा 335 के तहत उन्हें सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में प्रतिनिधित्व दिया गया। उन्हें शैक्षणिक संस्थानों में दाखिला लेने की छूट दी गई। हालां​िक सामाजिक रूप से प्रताड़ना झेलने के अलावा दलितों को संस्थानों में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। दलित अत्याचार में उत्तर प्रदेश का स्थान टॉप पर है। मध्य प्रदेश दूसरे नम्बर पर है। हरियाणा में भी दलित अत्याचार के मामले बढ़े हैं। बिहार, राजस्थान में भी ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं। इस तरह की घटनाओं के पीछे मनोवैज्ञानिक पहलु भी है। इस तरह की वारदातें दलित समाज को आतंकित करने के लिए की जाती हैं ताकि समाज डर जाए और ऊंची जातियों का दबदबा बना रहे। सरकारों को ऐसी घटनाएं रोकने के लिए इच्छाशक्ति दिखानी होगी और अपराध को अपराध समझना होगा और कानून को सख्ती से लागू करना होगा।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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