फ्रांस-भारत में रणनीतिक साझेदारी


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भारत और फ्रांस के बीच रिश्ते काफी पुराने और घनिष्ठ हैं। ये पारंपरिक होने के बावजूद बहुत व्यावहारिक हैं। विशेष बात यह है कि दोनों देशों ने अपने संबंधों को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बदलते हालातों के अनुकूल बनाया है। फ्रांस के प्रधानमंत्री इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा से स्पष्ट हो जाता है कि वह भारत को महत्वपूर्ण सांझीदार मानते हैं। कुछ माह पहले उन्होंने चीन यात्रा की थी। वह चीन जाने से पहले भारत आना चाहते थे लेकिन कुछ कारणों से ऐसा नहीं हो सका। मैक्रों की यात्रा के समय राफेल डील को लेकर मोदी सरकार पर आरोप लगाए जा रहे हैं। इसके बावजूद इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट कर दिया है कि मोदी सरकार चाहे तो विपक्ष को राफेल डील की जानकारी दे सकती है।

एक समय भारत को विकासशील देशों का फ्रांस कहा जाता था क्योंकि दोनों देशों की विदेश नीति स्वतंत्र और एक जैसी है। यद्यपि फ्रांस बहुत छोटी अर्थव्यवस्था है। फ्रांस की वजह से ही भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच संबंध अच्छे हुए हैं और इनके बीच संबंध प्रगाढ़ भी हुए हैं। मैक्रों और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच बातचीत के बाद दोनों देशों में रक्षा, सुरक्षा और परमाणु ऊर्जा समेत 14 महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण और अहम दोनों देशों के बीच एक-दूसरे के सैनिक अड्डों का इस्तेमाल करने का समझौता है। अब दोनों देश रणनीतिक और कूटनीतिक तौर पर एक-दूसरे को हरसंभव मदद करेंगे। दोनों देशों में 10.4 लाख करोड़ के समझौते किए गए। फ्रांस की कंपनियों की तरफ से करीब 20 करोड़ यूरो के नए निवेश का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है। फ्रांस भारत में नौवां सबसे बड़ा विदेशी निवेशक है।

अप्रैल-2000 से अक्तूबर 2017 के बीच इसने भारत में लगभग छह बिलियन डालर का निवेश किया है जबकि 2016-17 के बीच दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 11 बिलियन अमेरिकी डालर तक पहुंच गया है। जिस तरह से रक्षा , अंतरिक्ष सुरक्षा, ऊर्जा से जुड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ रहा है, उसे देखते हुए यह माना जा सकता है कि फ्रांस आज उसी भूमिका की ओर बढ़ रहा है जहां कभी रूस हुआ करता था। बदलते हालातों में दोस्त भी बदलते हैं और संबंधों का विस्तार भी होता रहता है। चीन अपनी वन बैल्ट वन रोड परियोजना के तहत एशिया और अफ्रीका के कई देशों में अपनी सेना की मौजूदगी बढ़ा रहा है। इससे फ्रांस समेत कई यूरोपीय देश चिन्तित हैं। हाल ही में चीन ने अफ्रीकी देश जिबूनी में भी अपना नौसैनिक अड्डा बनाया है। हिन्द महासागर में स्थित रीयूनियन आईलैंड फ्रांस के लिए अहम क्षेत्र है। साथ ही फैसिफिक ओशियन में चीन की बढ़ती गतिविधियां फ्रांस की परेशानी की बड़ी वजह है। फ्रांस के पास ताकतवर समुद्री सेना और परमाणु पनडुब्बियां हैं। फ्रांस इस क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर बेहद सक्रिय है और यहां स्थिरता को लेकर भारत फ्रांस का अहम सुरक्षा सांझेदार बना है।

चीन की कंपनियां दुनियाभर में हवाई अड्डों से लेकर बंगलादेश के शेयर बाजार तक निवेश कर रही हैं। यह सभी असल में चीनी सरकार के इशारों पर काम करती हैं और वास्तव में इनका निवेश व्यावसायिक नहीं बल्कि स्ट्रेटिजिक है। भारत भी इस खतरे को पहचान कर खड़ा हो रहा है। कुछ समय से अंडमान और निकोबार आइलैंड से लेकर म्यांमार के बार्डर तक चीन ने अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ाई हैं। भारत को हिन्द महासागर में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए उन देशों से सहयोग की जरूरत है जो चीन के बढ़ते दबदबे से चिन्तित हैं। इस दृष्टि से फ्रांस हमारा घनिष्ठ मित्र बनकर सामने आया है।

फ्रांस और भारत के बीच 1998 में रणनीतिक समझौता तब हुआ था जब परमाणु परीक्षण की वजह से पूरी दुनिया ने भारत पर प्रतिबंध लगाया हुआ था। अब तो जैतापुर परमाणु संयंत्र को लेकर भी समझौता हुआ है। जैतापुर संयंत्र का काम भी अब तेजी से होगा। 9,700 मैगावाट क्षमता का यह संयंत्र दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा संयंत्र होगा। जमीन से आसमान तक कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जिसमें भारत आैर फ्रांस मिलकर काम नहीं कर रहे। इसे भारत-फ्रांस सहयोग के इतिहास में स्वर्णिम कदम ही माना जाना चाहिए। इस बात का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिया जाना चाहिए कि मेक इन इंडिया की नीति के बावजूद उन्होंने भारत की जरूरतों को आगे बढ़ाया। उन्होंने महसूस किया कि देश की जरूरतों को दरकिनार नहीं किया जा सकता और राफेल डील की। रणनीतिक रूप से 21वीं सदी में फ्रांस भारत का महत्वपूर्ण सांझेदार बनेगा।