भारत के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध संसद में महाभियोग चलाने का 64 राज्यसभा सदस्यों का संकल्प निरस्त हो चुका है मगर समस्त देशवासियों में यह आशंका पैदा हो गई है कि न्याय के सर्वोच्च प्रतिष्ठान ‘सर्वोच्च न्यायालय’ में बैठे हुए इसके अधिष्ठाता की विश्वसनीयता संदेहों से परे नहीं है।

यह मामला इससे पहले मुख्य न्यायाधीश की व्यक्तिगत विश्वसनीयता के बारे में 1974 में तब उठा था जब श्रीमती इन्दिरा गांधी ने चार न्यायाधीशों की वरिष्ठता को लांघ कर श्री अजित नाथ रे को मुख्य न्यायाधीश के पद पर बिठाया था परन्तु उस मामले में सीधे सत्तारूढ़ सरकार पर न्यायपालिका को अपने हित साधने में सहायक बनाने का आरोप लगा था। स्व. जयप्रकाश नारायण ने इन्दिरा जी के इस कदम को न्यायपालिका की स्वतन्त्रता पर हमला बताते हुए इसे अपने आंदोलन का मुख्य अंग बनाया था।

तब भारतीय जनसंघ इस आन्दोलन में पूरी तरह शरीक थी। पूरे मामले में सरकार की नीयत पर सन्देह खड़ा किया जा रहा था। वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा की व्यक्तिगत विश्वसनीयता को सन्देह के घेरे में लेकर सात राजनीतिक दलों के 64 सांसदों ने सरकार की नीयत को ही निशाने पर रखा है। हालांकि दोनों मामले अलग तरीके के हैं मगर दोनों की मंशा एक ही है। श्री मिश्रा को पद से हटाने का संकल्प राज्यसभा के सभापति श्री वेंकैया नायडू ने जिस आधार पर निरस्त किया है उसे लेकर वििध विशेषज्ञों व कानूनविदों में मतभेद हैं।

सबसे बड़ा मुद्दा सभापति के उस विवेकाधिकार का है जिसका प्रयोग करके उन्होंने संकल्प को निरस्त किया है। मुख्य प्रश्न यह खड़ा हो रहा है कि क्या सभापति को सांसदों द्वारा दिए गए संकल्प में रखे गए आरोपों की सत्यता की जांच स्वयं ही करने का अधिकार है ?

इससे जुड़ा हुआ दूसरा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या संकल्प रखने वाले सांसदों को लगाये गए आरोपों की सत्यता का यकीन है? इससे यह प्रश्न उभरता है कि यदि आरोप सच्चे नहीं हैं तो फिर किस आधार पर मुख्य न्यायाधीश को हटाने की आगे की प्रक्रिया शुरू की जाये? इन सभी सवालों का जवाब ढूंढने का हल भी हमारे संविधान में ही पूरी बेबाकी के साथ दिया गया है।

न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 को एेसी किसी भी गुत्थी को सुलझाने का जरिया इसीलिए बनाया गया था जिससे संसद के दोनों सदनों लोकसभा या राज्यसभा में न्यायाधीशों के खिलाफ रखे गए अभियोग प्रस्तावों पर इन दोनों सदनों के पीठाधीश्वर निरपेक्ष भाव से अपने दायित्व का निर्वहन कर सकें। इस अधिनियम के तहत अभियोग संकल्प के संसदीय नियमों के तहत सही पाये जाने के बाद एक तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय न्यायिक जांच समिति का गठन करके पीठाधीश्वर संकल्प में लगाये गए आरोपों की जांच करने के लिए उससे कहेंगे और उसकी रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्यवाही करेंगे।

यदि किसी भी आरोप में सत्यता है और वह जांच समिति की राय में पद की गरिमा के विरुद्ध है तो पीठाधीश्वर राष्ट्रपति के पास रिपोर्ट भेज देंगे और राष्ट्रपति संसद में अभियोग चलाने की स्वीकृति प्रदान करेंगे। तीन सदस्यीय जांच समिति में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश व किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व एक लब्ध प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ होंगे। संविधान में यह व्यवस्था इसीलिए की गई जिससे संकल्प पर फैसला करते समय संसद के सदनों की पीठाधीश्वर नीयत पर किसी भी प्रकार का सन्देह न किया जा सके और वह इस गंभीर न्यायिक मसले का हल न्यायिक विशेषज्ञाें की राय से ही निकाल सकें।

अतः यह सवाल खड़ा किया जाना बेमानी है कि राज्यसभा के सभापति का कार्यालय कोई डाकघर नहीं है कि उसमें चिट्ठी डाल कर उसे सही पते पर पहुंचा दिया जाए। एेसी टिप्पणी सभापति के पद की मर्यादा के खिलाफ मानी जायेगी क्योंकि वह चुने हुए सदन के संरक्षक होते हैं। सभापति सदन के नियमों व उसे संचालित करने की प्रणाली के विधान से बन्धे होते हैं। अपने सदन के सदस्यों द्वारा दिये गए किसी भी संकल्प या प्रस्ताव को वह इसी कसौटी पर कस कर आगे की कार्रवाई करते हैं किन्तु श्री मिश्रा के मामले में संकल्प में लगाये गए आरोपों की सत्यता की परख श्री नायडू ने पहले ही स्वयं करने का फैसला किया जिसकी वजह से इस मामले को राज्यसभा सांसद अब सर्वोच्च न्यायालय में ले जाना चाहते हैं। उनका कहना है कि यह आदेश कानून सम्मत नहीं है।

संविधान के जिस अनुच्छेद 124 (4) के तहत मुख्य न्यायाधीश मिश्रा के विरुद्ध अभियोग संकल्प रखा गया उसमें प्रमाणित आरोपों का सन्दर्भ जांच समिति द्वारा पाए गए आरोपों से है न कि संकल्प में लगाये गए प्रारम्भिक आरोपों से। 1991 में जब पहली बार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री वी. रामास्वामी को पद से हटाने का संकल्प लोकसभा में लाया गया था तो तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष श्री रबि राय ने इसे स्वीकार करके एक तीन सदस्यीय जांच समिति को सौंप दिया था और इसके बाद मई 1993 में जाकर इस पर लोकसभा में बहस शुरू हुई थी।

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता व स्वायत्तता को अक्षुण्ण रखने के लिए और संसद के किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से बचाने के लिए ही न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 बना था। यह अधिनियम संसद के पीठाधीश्वरों को ही नहीं बल्कि संसद सदस्यों तक को न्यायालय में हस्तक्षेप करने के प्रयासों पर पूरी तरह अंकुश लगाता है और इस तरह लगाता है कि कोई भी सत्तारूढ़ सरकार न्यायाधीशों की स्वतन्त्रता को उपकार रूप में न देख सके। इसकी मार्फत विधायिका व न्यायपालिका के बीच का अधिकार क्षेत्र भी बहुत खूबसूरती के साथ नियमित किया गया है। अतः सवाल भाजपा या कांग्रेस का नहीं बल्कि वास्तव में संविधान की सर्वोच्चता और मर्यादा का है।