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मन्दिर और भेड़िया पाकिस्तान

पाकिस्तान के फ्रंटियर सूबे के एक गांव में मन्दिर को ध्वस्त करने की खबरें आने से यह सवाल उठना वाजिब है कि 1947 तक भारत का ही हिस्सा रहे इस देश के साथ आपसी सम्बन्धों की स्थिति क्या रही है और दोनों देशों के नागरिकों पर इसका किस हद तक प्रभाव पड़ा है। पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथियों की ऐसी धार्मिक उन्माद से भरी कार्रवाइयों का दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों पर क्या असर पड़ता है? कुछ इतिहासकारों का मत है कि यदि पाकिस्तान की मांग पर संयुक्त भारत में रह रही समस्त मुस्लिम जनता के बीच ही जनमत संग्रह कराया गया होता तो परिणाम पाकिस्तान के निर्माण के विरुद्ध आता क्योंकि तब स्वतन्त्रता संग्राम लड़ रही कांग्रेस पार्टी में एक से बढ़ कर एक प्रभावशाली मुस्लिम नेता थे जिनमें मौलाना अब्दुल कलाम आजाद व सीमान्त गांधी कहे जाने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान के नाम प्रमुखता से लिये जा सकते हैं। इनके अलावा उत्तर प्रदेश के हाफिज मुहम्मद इब्राहीम से लेकर बंगाल के बहुत से मुस्लिम नेता थे जो पाकिस्तान के निर्माण के विरुद्ध अलख जगा रहे थे मगर इन सबसे अलग जम्मू-कश्मीर में शेख मुहम्मद अब्दुल्ला के नेतृत्व में इस रियासत में राजशाही को समाप्त करने का आन्दोलन चल रहा था और इस आन्दोलन में पाकिस्तान के निर्माण का जबर्दस्त विरोध हो रहा था। स्वयं शेख अब्दुल्ला ने पाकिस्तान के निर्माण से कुछ दिन पहले श्रीनगर में आयोजित एक विशाल जनसभा में कहा था, ‘‘जब तक मेरे जिस्म में खून का एक कतरा भी बाकी है तब तक पाकिस्तान वजूद में नहीं आ सकता।’’ यह सब पक्का मय सबूत का इतिहास है जिसे कोई नहीं बदल सकता मगर उस समय मुस्लिम लीग के नेता मुहम्द अली जिन्ना ने अंग्रेज सरकार के ‘कैबिनेट मिशन’ को पलीता लगाते हुए 1946 में सीधी कार्रवाई (डायरेक्ट एक्शन) का आह्वान किया और पूरे देश को हिन्दू-मुस्लिम दंगों की आग में झोंक दिया। 

इन दंगों को भड़काने में उस समय भारत के वायसराय ‘लार्ड वावेल’ की भूमिका छद्म रूप से रही क्योंकि तब उनके नेतृत्व में बनी अधिशासी परिषद  (वायसराय एक्जीक्यूटिव कौंसिल) को हरकत में आने से रोक दिया गया और प्रान्तीय एसेम्बलियों में बनी सरकारों को कानून-व्यवस्था से निपटने के लिए अधिकृत किया गया। दंगे प्रायः ब्रिटिश इंडिया (रजवाड़ों की रियासतों के अलावा) में ही हो रहे थे। इनमें भी पंजाब, सिन्ध, बंगाल प्रमुख थे और उत्तर  प्रदेश के चुनीन्दा इलाके थे। इन परिस्थितियों को पनपा कर जिन्ना ने भारत के दो टुकड़े करवाये थे मगर जिन्ना यह भी जानता था कि गांधी के देश में उसका इस्लाम के नाम पर बना  मुल्क पाकिस्तान कभी भी दम तोड़ सकता है क्योंकि नये बने पाकिस्तान की पूरी रवायतें हिन्दोस्तानी हैं और उसके पाकिस्तान के गोशे-गोशे में हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे के निशान बिखरे पड़े हैं। इसी वजह से पाकिस्तान बनने के बाद उसने खुद यह कबूल किया कि दोनों देशों के सम्बन्ध अमेरिका और कनाडा जैसे होने चाहिएं। अतः यह निर्रथक नहीं है कि भारत के गणतन्त्र घोषित होने के बाद शुरू के पांच साल तक केवल पड़ोसी देशों के राज प्रमुखों को ही 26 जनवरी की परेड में मुख्य अतिथि बनाया गया।

 पहले गणतन्त्र दिवस पर इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णों आये और दूसरे 1951 के गणतन्त्र दिवस पर नेपाल के महाराजाधिराज त्रिभुवन वीर विक्रम शाह आये और तीसरे 52 व 53 में किसी को निमंत्रित नहीं किया गया जबकि 1954 में भूटान नरेश जिग्मे-दोरजी वांग्चुक मुख्य अतिथि बने और 1955 में पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मुहम्मद को यह इज्जत बख्शी गई, परन्तु 1956 में पाकिस्तान का संविधान लागू हुआ और इसके बाद इस मुल्क में भारी उठापटक शुरू हो गई और इसका लोकतान्त्रिक स्वरूप नष्ट होता गया और कालान्तर में मार्शल ला लागू होने के बाद यह सैनिक कट्टरपंथियों के कब्जे में आता चला गया जिसकी वजह से इसकी जनसंख्या में बदलाव आना शुरू हुआ और इस देश में बसे 15 प्रतिशत से अधिक हिन्दुओं का धर्मान्तरण होता चला गया और उनके पूजा स्थलों को विद्रूप करने की साजिशें अंजाम पाती गईं।

 इस देश के हुक्मरानों ने भारत विरोध को अपना ईमान बना लिया जिसके आवरण में हिन्दू विरोध मुखर होता चला गया। इसके बावजूद पाकिस्तान में भारत की गौरवगाथा के अवशेष बिखरे पड़े हैं जिनमें इसकी राजधानी इस्लामाबाद के निकट स्थित आचार्य चाणक्य का तक्षशिला विश्वविद्यालय भी है और बलूचिस्तान प्रान्त में स्थित हिंगलाज देवी का मन्दिर भी है। यह मन्दिर पाकिस्तान में भारतीय हिन्दू संस्कृति का ध्वज वाहक इस तरह है कि हर वर्ष चैत्र मास में इस प्रान्त के मुसलमान भी इस मन्दिर की यात्रा ‘दादी की हज’ के नाम पर करते हैं।  इसके साथ ही सिन्ध प्रान्त में जैन संस्कृति के अवशेष बिखरे पड़े हैं जिनमें जैन मन्दिर भी हैं। ये सभी स्थल अब वीरानी की हालत में हैं मगर भारत की कहानी सुनाते हैं। यह भारत ही पाकिस्तान में कट्टरपंथियों की निगाहों में गड़ता रहता है और वे कोई न कोई ऐसा काम जरूर करते रहते हैं जिससे पाकिस्तान में हिन्दू विरोध उनका कौमी नारा बना रहे मगर जिस फ्रंटियर सूबे के गांव में इन तत्वों ने 1920 में बने जिस मन्दिर को तोड़ा है उसी इलाके के नेता खान अब्दुल गफ्फार खान ने बंटवारा हो जाने के बाद महात्मा गांधी से अपनी आंखों में आंसू भर कर कहा था कि ‘बापू आपने हमें किन भेड़ियों को सौंप दिया है।’  बादशाह खान के नाम से प्रसिद्ध भारत रत्न खान अब्दुल गफ्फार खान का यह कथन आज भी पाकिस्तान की असलियत का बखान कर रहा है और ऐलान कर रहा है कि 73 साल बाद भी भेड़िये ने अपनी चाल नहीं बदली है और वह यहां के लोगों से इंसानियत को खत्म करना चाहता है मगर पाकिस्तान में भी अब ऐसे लोगों की जमात उभर चुकी है जो ऐसी कार्रवाइयों की खुल कर निन्दा करती है और लाहौर के चौराहे का नाम भगत सिंह चौक रखना चाहती है मगर इनके हुक्मरानों का क्या किया जाये जिन्होंने हिन्दू विरोध को ही पाकिस्तान के वजूद से जोड़ दिया है।