सुना है कलियुग है, इंटरनेट की वजह से पूरी दुनिया एक ग्लोबल विलेज बन गई है और सभी लोगों का आपसी सम्पर्क बहुत जल्दी और दूरी कम हो गई है। नेट ने सबको नजदीक तो कर दिया परन्तु खूनी रिश्ते सफेद हो गए हैं। अभी तक यही देखते आ रहे थे कि जमीन-जायदाद, पैसे के लिए अपने सगे-सम्बन्धी दुश्मन बन जाते हैं, नजरें फेर लेते हैं, धोखा देते हैं। स्पेशियली जब आपके ऊपर से आपके पिता का साया उठ जाता है तो सबसे पहले आपके अपने ही आपकी जायदाद हड़पने आते हैं।

जिस घर में चाचा को पिता का दर्जा दिया जाता हो वहां सबसे पहले चाचा ही सभी हदें पार करता ​है, विश्वास तोड़ता है और खून के रिश्ते को शर्मसार करता है। अभी तक यही देख रहे थे कि चाचा-भतीजा, भाई-भाई पैसे-जायदाद के ​पीछे खूनी रिश्तों की मर्यादाएं तोड़ देते हैं आैर भूल जाते हैं कि उनके अन्दर किस मां का, किस पिता का खून दौड़ रहा है। परन्तु पिछले कुछ दिनों से जो हमारे देश में हो रहा है, इसे तो घोर कलियुग या अन्याय ही कहा जाएगा।

पैसा और आपका हक कोई छीन ले तो ईश्वर कभी न कभी उसको सजा जरूर देता है आैर आप फिर भी इसको सह लेते हो परन्तु अगर कोई बाप अपनी बेटी को बेच दे या कोई बड़ा नजदीकी रिश्तेदार अपने ही खून के रिश्ते की नन्हीं बेटी का बलात्कार या उसको गन्दी नजर से देखे या कोई गन्दी हरकत करे तो….। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 70 कि.मी. दूर सीतापुर जिले के शख्स ने अपनी ही बेटी के साथ ऐसा पाप किया जिससे शायद सारी दुनिया के पाप भी शर्मिन्दा हो गए।

एक बाप इस कदर वहशी बन सकता है कि वह अपनी ही बेटी को अपने दोस्तों को गिफ्ट कर दे और फिर उन्हीं के साथ मिलकर उसका गैंगरेप कर दे….उफ! ऐसे ही छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में 11 वर्षीय बालिका के साथ रिश्तेदार ने उस समय बलात्कार किया जब वह बारात में शामिल थी। यही नहीं, कहीं यह सुना कि सौतेला बाप बच्ची के साथ बलात्कार करता रहा और धमकी भी देता रहा कि अगर मां को बताएगी तो ते​री मां को मार दूंगा।

लोनी में सौतेले बाप ने डेढ़ माह तक 12 वर्षीया मासूम बेटी को हवस का शिकार बनाया। एक कलियुगी मां ने अपने दुधमुंहे 8 माह के बच्चे की हत्या कर दी। माता-कुमाता बन गई। इन्दौर में 8 माह की बच्ची से उसके सगे मामा ने किया बलात्कार, हाथरस में 6 साल की बच्ची से रेप, रायपुर में नामी स्कूल की पहली क्लास की बच्ची से रेप, आे​डिशा में रिश्तेदारों ने बन्धक बनाकर रेप किया। इतनी घटनाएं हर समय टी.वी. पर चलती हैं कि लगता है रेप चैनल बन गए हैं परन्तु आज धर्म बहन, बेटी तो दूर अपनी सगी बेटी, अपने सगे खून के रिश्ते और अपने ही रिश्तों को शर्मिन्दा करने पर लगे हैं।

‘वाह दुनिया के रखवाले तेरे दर्द भरे नाले’ परन्तु यहां तो दर्द भी ऐसा दर्द जो अपने ही दे रहे हैं। अक्सर यही देखने को मिल रहा है कि बलात्कार या हत्याओं के मामलों में अधिकतर जानने वाले या नजदीकी रिश्तेदार का हाथ होता है परन्तु यह कितना भयानक सच है कि आज के जमाने में रिश्ते भयानक होते जा रहे हैं। इसमें न तो किसी धर्म को दोष दिया जा सकता है, न किसी सरकार आैर न प​ब्लिक को। इसमें तो लोगों की मा​नसिकता गन्दी, सोच गन्दी, हवस जो सभी मर्यादाएं भूल रही है, इसमें किसका दोष है?

मुझे तो यही लग रहा है जो सोशल मीडिया, नेट, फेसबुक, व्हाट्सअप का सही दिशा में इस्तेमाल होना चाहिए, कहीं न कहीं गलत दिशा में हो रहा है। लड़कियां-लड़के सेेल्फी खींच कर या अपनी अलग-अलग फोटो खींचकर शो करते हैं, गलत दोस्तियां हो जाती हैं परन्तु जहां रिश्तेदार दोषी हैं, अपना सगा खून दोषी है वहां तो कोई भी बात फिट नहीं होती, न कपड़े, न सोशल मीडिया, न धर्म, न जाति न पार्टी इश्यू आदि। ऐसे रिश्तेदारों को एकदम फांसी की सजा होनी चाहिए। जब तक यह नहीं होगा तब तक कुछ नहीं हो सकता। सजा ही इसका एकमात्र इलाज है।

(हां इसमें कुछ प्रतिशत निर्दोष व्यक्तियों को भी बलि का बकरा बनाया जा सकता है जैसे 498 का मिसयूज हुआ) परन्तु कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा क्योंकि खूनी रिश्ते सिसक रहे हैं, भयानक होते नजर आ रहे हैं। पहले सुनते थे कि कोई धर्म की बहन, धर्म की बेटी भी बनाता था, उस रिश्ते को जीवन भर निभाते थे। जिसको एक बार बहन कह दिया उसकी तरफ वैसी ही भावनाएं, वैसी ही सोच।

चित्तौड़गढ़ की रानी कर्णवती ने ​हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा का वचन लिया था। पिछले दिनों मुझे बहुत सी लड़कियों ने पत्र लिखे जिसमें गीता आर्य कन्या गुरुकुल पाड़ा (करनाल) की कुछ पंक्तियों मैं लिखना चाहूंगी- ‘क्यों मां लक्ष्मी, मां दुर्गा, मां सरस्वती के देश में नारी चींटी की तरह रौंदी जा रही है। इन्सानों की बस्ती में हैवानों की बदबू आ रही है, क्यों ऐसी घटनाएं दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं, क्यों धर्मनिरपेक्ष भारत की बेटी धर्म से जोड़ी जा रही है, क्यों प्रतिदिन न जाने कितनी मासूम बच्चियां अपनी जिन्दगी गंवा रही हैं। गैरों की क्या बात करें, अपनों से ही छली जा रही हैं।’ वाकई में आगे कोई गलत काम करता या सोचता था तो उसे कहते थे कि तेरे घर में मां-बहन-बेटी नहीं है।

अब तो कुछ चन्द वहशी लोगों ने इसको भी गलत करना शुरू कर दिया। सच में ऐसी बातों को यहीं रोकना चाहिए। ऐसे दरिन्दों को बीच चौराहे पर लोगों के सामने फांसी लगानी चाहिए ताकि ऐसी गन्दी सोच वालों की रूह कांप जाए। इतने पवित्र रिश्ते जिनको महसूस कर पाकर बेटियां गर्व से जीती हैं उन्हें तार-तार करने वालों का मर जाना ही अच्छा है। जो धरती पर बोझ हैं, अपने घर पर बोझ हैं, देश पर बोझ हैं, ऐसे बोझ को ढोने से क्या फायदा।

मुझे पूरी उम्मीद है मोदी जी आैर हमारी सरकार जरूर इस पर संज्ञान लेगी। मां, बहन, बेटी, पत्नी, दादी, नानी ऐसे पवित्र रिश्तों की मर्यादा कायम रहनी चाहिए। मैं फिर कहूंगी बेटी तो बेटी है, चाहे वो तेरी हो या मेरी हो, आपकी हो या हमारी हो, गली की हो, मोहल्ले की हो, शहर की हो, देश की हो। मैं स्वाति मालीवाल की भावनाओं की कद्र करती हूं, उसकी मांग के साथ हूं, परन्तु उससे प्रार्थना करूंगी कि भूख हड़ताल से नहीं, आओ मिलकर काम करें लोगों की सोच बदलने का, गली-गली, नुक्कड़, गांव घूमें।

अगर स्वास्थ्य ठीक होगा तभी यह काम हो सकेंगे। अनशन रखकर आप खबरों की सुर्खियों में तो जरूर छाई रहेंगी और कुछ दिनों के बाद एक खबर बनकर रह जाएंगी परन्तु असली काम से दूर रहेंगी जाे आपके अन्दर है। आओ सुर से सुर मिलाएं, कदम से कदम मिलाएं, हाथ बढ़ाएं ताकि कोई नामर्द किसी बालिका-बेटी की तरफ आंख उठाने की कोशिश करे तो उसकी आंख फोड़ दें। अपने आपको कमजोर ​साबित न करके रानी झांसी बाई बनें, हम कमजोर नहीं हैं, अब कोई बालिका न उजड़े। अब महिलाएं आजाद हैं, हम झांसी की रानियां हैं, अ​हिल्या बाई हैं।