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धन्यवाद प्रभु

यह बात सच है कि जीव​न में स्थाई तो कुछ भी नहीं है। दुनिया में जब सन् 1920 में महामारी ने अपना रौद्र रूप दिखाकर लाखों जि​न्दगियां निगल लीं थीं तो वह स्पेनिश फ्लू भी नहीं रहा तो यह कोरोना क्या चीज है लेकिन सन् 2019 में चीन से आया कोविड-19 पूरी दुनिया को झकझोर कर रख देने में कामयाब हुआ। आज की तारीख तक अकेले भारत में कोरोना की तीन लहरें आ चुकी हैं। हमने पहली और दूसरी लहर में बहुत कुछ गंवाया और अभी भी ​तीसरी लहर का वजूद बरकरार है। पहली और दूसरी लहर में बहुत कुछ गंवाने के बाद तीसरी लहर में हमने कोरोना को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया, ​बल्कि मानवीय उपचार और रोकथाम के अलावा सोशल डिस्टेसिंग के पालन से हमने कोरोना पर लगभग विजय पा ली है तो अब अगर देश में फिर से स्कूल-कालेज खुलने जा रहे हैं और दसवीं तथा बारहवीं की बोर्ड परीक्षाएं सीबीएसई ने ऑफ लाइन अर्थात परीक्षा केन्द्रों पर आयो​िजत करने का ऐलान किया है तो इस पहल का दिल खोलकर स्वागत किया जाना चाहिए।

हम तो डर रहे थे कि यह दिन कभी आएगा ही नहीं। हर तरफ नाकारात्मकता थी और अब शिक्षा के क्षेत्र में अगर चीजें पटरी पर आ रही हैं तो फिर यह स्वागत योग्य कदम है। सरकारों और राज्य सरकारों के प्रशासनिक अमले ने आखिरकार अच्छे पग उठाए और कोरोना के पांव उखड़ रहे हैं। अगर हम डरकर घरों में ही बैठे रहेंगे, वर्कफ्रॉम होम करेंगे, परीक्षा घर बैठे ही देंगे या परीक्षा देंगे ही नहीं और फिर भी हम उत्तीर्ण मान लिए जाएंगे तो यह व्यवस्था क्षणिक तो सकती है परन्तु स्थाई तौर पर इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। कल्पना कीजिये पिछले दो साल में शिक्षा के क्षेत्र में जो आनलाइन प्रणाली मजबूरी के चलते स्थापित  हो रही थी और अब वही शिक्षा स्कूल-कालेजों में हासिल की जाएगी तो यह पुराने अर्थात सामान्य दिनों की शुरूआत हो रही है। सब कुछ पहले जैसा हो यह कल्पना हर कोई कर रहा था क्योंकि जीवन में किसी ने लाॅकडाउन पहली बार देखा, किसी ने पाबंदियां पहली बार देखीं, किसी ने कर्फ्यू पहली बार देखा तो किसी ने अपने वीकेंड अर्थात शनिवार एवं रविवार को खुद को घरों में कैद रखने की आदत डाल ली थी। खुश हो जाइये कि अब हमें इससे मुक्ति मिलने जा रही है। 

26 अप्रैल से सीबीएसई ने दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाएं आफलाइन मोड में कराए जाने का ऐलान कर दिया है और साथ ही स्पष्ट कर दिया है कि सभी प्रश्न सबजैक्टिव और ओबजैक्टि होंगे। अगर स्टूडेंट्स बिना  पढ़े ​बिना परीक्षा दिए उत्तीर्ण हुए तो शिक्षा का महत्व ही क्या रह जाएगा। इसीलिए सीबीएसई ने यह साहसिक पग उठाकर बाकी देशभर के एक्सपर्ट्स को यूनिवर्सिटी के तहत सभी कालेज खोलने के लिए प्रेरित भी किया है। खुशी की बात यह है कि हमारी डीयू में भी 17 फरवरी से सभी कालेज खोलने का ऐलान कर दिया है। मजेदार बात यह है कि डीयू के स्टूूडैंट्स कक्षाएं शुरू करने की मांग को लेकर आंदोलन किये हुए थे। ​शिक्षा प्राप्त करने के लिए यह तरीका सही था क्योंकि अब सारी शिक्षा आनलाइन से नहीं चल सकती। इस कड़ी में बराबर शिक्षकों से भी दबाव घटेगा और साथ ही अहम बात यह है कि छोटे बच्चे या दसवीं और बारहवीं तक के छात्र जो सब कुछ कम्प्यूटर से ही करते थे और लिखना भी भूल गए थे को अब पैन-कापी की जरूरत पड़ेगी, जो आप याद रखते हैं उसे लिखने और रिवीजन के लिए पैन-कापी का महत्व जीवित रखना पड़ेगा। इस पहल का हमें स्वागत करना होगा।

कारगर बात यह है कि कोराेना के नियम जो सोशल डिस्टैंसिंग, मास्क और सैनेटाइजर से जुड़े हैं उनका पालन भी होना चाहिए। एक ऐसा वर्ग पैदा हो रहा था जो यह कह रहा था कि जब बिना स्कूल जाए, ​बिना एग्जाम दिए अगली क्लास में प्रमोट किया जा रहा है तो इसे न बदला जाए। हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि हर किसी को ऐसी सोच से ऊपर उठना चाहिए। शिक्षा के महत्व और बढ़ते कम्पीटिशन के चलते शिक्षकों के मार्गदर्शन और किताबों के अध्ययन को न हम भूले थे और न भूलना ही चाहिए। आइये अब सबकुछ सामान्य हो रहा है तो हम सबको पटरी पर चलना चाहिए। सही व्यवस्था ही जीवन की पटरी है और जब हम सब कुछ सामान्य रूप से करते हैं तो इसमें गति आती है। घर पर 24 घंटे कैद रहकर सब कुछ सम्भव नहीं है। अब हम फिर से कोरोना से मुक्त हो रहे हैं। अब अपनी पुरानी व्यवस्था में लौट रहे हैं। शिक्षा जगत में आई पाबंदियां अब जा रही हैं और स्टूडेंट्स हमारी गौरवपूर्ण स्कूल-कालेज के दिनों में जाकर पढ़ने की परम्परा में लौट रहे हैं। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। यही नहीं हमने अपने वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब के सदस्यों से वायदा किया था कि जब छोटे बच्चों के स्कूल खुलेंगे उसके साथ-साथ आपकी ब्रांच भी खोल देंगे। सो हम उसे भी 20 फरवरी से शुरू कर रहे हैं परन्तु सबको मास्क तो पहनना ही पड़ेगा।