कश्मीर में सेना की कठिनाई


थलसेना अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत का यह कहना कि सेना जम्मू-कश्मीर में ऐसा युद्ध लड़ रही है जिसे आमने-सामने की लड़ाई नहीं कहा जा सकता है बल्कि गंदला माना जा सकता है, स्वयं में यह बताता है कि इस राज्य में सेना के लिए कितनी चुनौतियां हैं। जिस प्रकार से आतंकवादियों के विरुद्ध सेना के अभियान में बाधाएं खड़ी की जा रही हैं उसे देखते हुए यह जरूर कहा जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर के आम आदमी के मन को अलगाववादियों ने भटका दिया है और वे आतंकवादियों की मृत्यु पर सामूहिक शोक मनाने जैसी कार्रवाई तक करने से नहीं हिचक रहे हैं। दो दिन पहले मृत आतंकवादी बुरहान वानी के हमराह कमांडर सबजार अहमद बट के हलाक होने के बाद जिस तरह उसके शव को लेकर घाटी में प्रदर्शन किया गया उससे यही मतलब निकलता है कि आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त लोगों को यहां के कुछ लोग समर्थन देने से बाज नहीं आ रहे हैं। यह स्थिति राज्य की व्यवस्था को दुरुस्त बनाने के काम में निश्चित रूप से अड़ंगा पैदा करती है। जिस प्रकार से राज्य में पत्थरबाजी का माहौल बनाया गया है उससे देश की सेना अपने ही लोगों के सामने आकर खड़ी हो गई मगर यह स्थिति इस राज्य के सियासती दलों ने कुछ वोटों की खातिर बनने दी है। जनरल रावत ने पहले भी चेतावनी दी थी कि जो लोग दहशतगर्दों के खिलाफ सेना की कार्रवाई में बाधा खड़ी करेंगे उनके साथ सख्त कार्रवाई की जाएगी और दहशतगर्दों का हमसफर ही समझा जाएगा। इस चेतावनी के बाद स्वाभाविक तौर पर राज्य में परिस्थितियों में सुधार होना चाहिए था मगर वह नहीं हुआ। इसकी वजह भी सियासती पार्टियां रहीं। नेशनल कांफ्रेंस के नेता डा. फारूक अब्दुल्ला ने पत्थरबाजों का खुलेआम समर्थन किया और यहां तक कह डाला कि वे अपने कश्मीर की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह बयान भारत की सत्ता के खिलाफ नहीं बल्कि भारतीय सार्वभौमिकता के खिलाफ था क्योंकि सेना भारत की सार्वभौम शक्ति का प्रतीक होती है। जनरल रावत ने अपनी सेना के उस मेजर लीतुल गोगोई की कार्रवाई का भी समर्थन किया जो उन्होंने पत्थरबाजों का मुकाबला करने के लिए की थी। पत्थरबाजों के बीच से चुनाव के काम में लगे लोगों को निकालना आसान बात नहीं थी। मेजर गोगोई ने एक पत्थरबाज को ही सेना की जीप के आगे बांधकर पत्थरबाजों को निहत्था खड़ा रहने के लिए मजबूर कर दिया और बीसियों लोगों की जान बचाने में सफलता प्राप्त की मगर दूसरी तरफ यह चौंकाने वाली बात भी है कि भारतीय सेना में भर्ती होने के लिए जम्मू-कश्मीर के नौजवानों में कम उत्साह नहीं है। हाल ही में 800 कश्मीरी युवकों ने सेना में भर्ती के लिए परीक्षा दी। यह परीक्षा उन्होंने हुर्रियत कांफ्रेंस की इस अपील के बावजूद दी कि राज्य में दो दिन पूरी तरह हड़ताल रहे और भारतीय संस्थानों का विरोध किया जाए। हुर्रियत कांफ्रेंस ने सबजार की मौत के बाद यह फतवा जारी किया था कि घाटी में दो दिन की पूरी हड़ताल रहे, सारे बाजार, दफ्तर और स्कूल बंद रहें। इसके बावजूद 800 कश्मीरी युवा सेना की भर्ती परीक्षा में शामिल हुए। यह इस बात का सबूत है कि कश्मीरी युवा पीढ़ी अपने भविष्य के प्रति सजग है और वह भारतीय सेना में भर्ती होना सम्मान मानती है और इसके लिए सभी प्रकार की परीक्षाओं से गुजरने को तैयार है लेकिन अलगाववादी तत्व इस पीढ़ी को रास्ते से भटका देना चाहते हैं और उनके हाथों में पत्थर पकड़ाना चाहते हैं। इस तरीके का माहौल घाटी में बनाया जा रहा है। उसके पीछे निश्चित तौर पर पाकिस्तान का हाथ कहा जा सकता है क्योंकि इसकी सरहदों में बैठे हुए लोग ही कश्मीरियों को आतंकवादी बनाना चाहते हैं। सबजार बट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पाकिस्तान परस्त घाटी में आतंकवादियों को शहीदों का दर्जा देते हैं और उनकी मौत पर गम के इजहार के नाम पर भोलेभाले कश्मीरियों को भड़काते हैं। यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है। घाटी में चल रहे इस गंदले युद्ध को रोकने के लिए जरूरी है कि वहां पत्थरबाजी समाप्त हो और युवा पीढ़ी राष्ट्रीय धारा में आए। यह पीढ़ी आना भी चाहती है, चाहे खेल का क्षेत्र हो या संगीत का अथवा शिक्षा का, सभी में कश्मीर के युवक-युवती कीर्तिमान तक बना रहे हैं। जो दहशतगर्द समर्थक तंजीमों और हुर्रियत कांफ्रेंस को नहीं भा रहा है। इस वजह से ये सब मिलकर कश्मीर में पत्थरबाजी की संस्कृति को पनपाने में लगे हुए हैं। इसलिए अब यह कश्मीरियों को सोचना है कि उनका भविष्य कहां सुरक्षित है। भारत की सेना उनकी सुरक्षा के लिए है और उनके उज्ज्वल भविष्य के रास्ते को साफ-सुथरा रखने के लिए है।