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जाते मानसून का कहर

लौटते मानूसन की भारी बारिश ने केरल में तबाही मचा दी है। बारिश और भूस्खलन से 26 लोगों की मौत हो चुकी है। घर नदी में समा गये, पुल और सड़कें पानी में बह गये। कुदरत का क्रोध चारों तरफ नजर आ रहा है। कई लोगों का कुछ पता ही नहीं चल रहा। रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए एनडीआरएफ की टीम ​दिन-रात काम कर रही है। केरल में 2018 और 2019 की बाढ़ की तरह इस वर्ष भी तबाही मचने की आशंका है। मौसम विभाग ने राज्य के 5 जिलों में रेड और सात जिलों में ऑरेंज अलर्ट जारी किया हुआ है।

उत्तराखंड में भी बारिश, तूफान के रेड अलर्ट को देखते हुए आपदा प्रबंधन विभाग सक्रिय हो गया है। चारधाम की यात्रा रोक दी गई है। इस वर्ष हिमाचल हो या उत्तराखंड भूस्खलन की घटनाएं कुछ ज्यादा ही हो रही हैं। मानसून अपने अंतिम पड़ाव पर है और जाते-जाते यह काफी दर्द देकर जाएगा। एक समय था जब मानसून की फुहार पड़ते ही हृदय उल्लास से भर जाता था। मानसून की वर्षा कई-​कई दिन तक रुकने का नाम नहीं लेती थी लेकिन भयंकर हादसे नहीं होते थे, अब मौसम का ​मिजाज ही बदल गया है। आज कुछ ही समय में मूसलाधार वर्षा से जनजीवन ठप्प हो जाता है। 

वर्षा का पैटर्न ही बदल गया है। अब कुछ ही समय में बारिश सबको आफत में डाल देती है। हर साल बाढ़ आती है, करोड़ों  रुपए की सम्मत्ति के नुकसान के साथ-साथ लोगों की जान भी चली जाती है। देश के कोने-कोेने से यात्री धर्म लाभ के लिए चारधाम की यात्रा पर आते हैं लेकिन आजकल बरसात के समय उनके प्राण संकट में आ जाते हैं। शासन-​प्रशासन जितने साधन उनके पास होते हैं उनके अनुसार सहायता करने का प्रयास करता है। सरकारें हर साल जान-माल की क्षति तो सहन कर लेती है लेकिन प्राकृतिक के प्रकोप से बचने के लिए उपायों पर ध्यान नहीं देती।  हमारे देश में नहीं दुनियाभर में ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम के पैटर्न में बदलाव देखने का मिल रहा है। भारत में भी ग्लोबल वार्मिंग के चलते तापमान बढ़ रहा है और इसके चलते कही बहुत ज्यादा बारिश होती है तो कही सूखे के हालात पैदा हो जाते हैं। बीती शताब्दी के मुकाबले धरती का तापमान एक डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा है। ग्रीन हाऊस गैसों के बहुत ज्यादा उत्सर्जन से खासकर कार्बन डाइऑक्साइड से धरती का तापमान बढ़ रहा है। वहीं समुद्र का तापमान 06-07 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। हिन्द महासागर में तो यह बढ़ौतरी और भी ज्यादा हुई है।

इसकी वजह से हवा में नमी बढ़ गई है जिससे असामान्य बारिश देखने को मिल रही है क्योंकि समुद्र की सतह का तापमान बढ़ रहा है, जिसके कारण समुद्र में चक्रवाती तूफानों की संख्या  भी बढ़ रही है। जो बारिश पहले कई महीनों में होती थी, अब उतनी ही बारिश एक महीने में ही हो जाती है। पहले मानसून के एक महीने में औसतन 15-20 दिन बारिश वाले होते थे। अब एक माह में बारिश वाले दिनों की संख्या घट कर दस दिन रह गई है। इन दस दिनों में भी बारिश में काफी असंतुलन होता है। भारी वर्षा दिवस में एक ही दिन में हो रही 6.5 सेंटीमीटर से ज्यादा वर्षा हो जाती है। 

7 अगस्त की शाम ​दिल्ली में ही कुछ देर की मूसलाधार बारिश ने राजधानी और आसपास के शहरों में हालात को अस्त-व्यस्त करके रख दिया था। 

ऐसा नहीं है की जलवायु परिवर्तन अचानक हो गया है। पिछले कई वर्षों से लगातार वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ इस बात के लिए आगाह करते आ रहे हैं कि मौसम तेजी से बदल रहा है और यह बदलाव मानवीय गतिविधियों के चलते हो रहा है। इसलिए बेहतर है कि इन गतिविधियों को रोका जाये जिससे कि  अप्रत्याशित ढंग से धरती का गर्म होना रुके। तमाम चेतावनियों  और भयावह दुष्परिणामों के रह-रह कर पुष्ट होने के बावजूद  कोई फर्क नजर नहीं आ रहा है। पर्यावरण की परवाह बातों, शब्दों, किताबो में और भाषणों में तो दिखती है, व्यवहार में कही नहीं दिखती। नेपोलियन ने कहा था-युद्ध में तब हारना बहुत कष्टदायक होता है जब हमें यह पता है कि हम क्यों हार रहे हैं फिर भी हार को न रोका जा सके। ऐसा ही कुछ पर्यावरण को लेकर हो रहा है। इस बिगड़ते पर्यावरण को लेकर हम सब अंजान नहीं हैं, जानते हुए भी हम इसे रोक नहीं पा रहे हैं। जबकि तय यही है कि पर्यावरण महज नैतिकता का सवाल नहीं है। जिंदा रहने का सवाल है। 

आजादी के बाद से ही देश का विकास पूर्ण रूप से नियोजित नहीं हुआ। नदी-तालाब की जगह सड़कें, इमारतें, बना दी गई। आबादी के बोझ तले शहर, महानगर दबते गये। अब तो बारिश के पानी की निकासी के लिए भी रास्ता नहीं मिल पाता। फिर जलभराव आफत की वजह बन जाता है। बाढ़ आती है तो फसलें खराब होती हैं, जान एवं माल की हानि होती है। क्या हम हर साल शोकातिका से नहीं बच सकते? जिम्मेदारी मानव की भी है। इसलिए पर्यावरण के मिजाज को समझो और इसे बेहतर बनाने के लिए हम जो कुछ कर सके उपाय करें। 

आदित्य नारायण चोपड़ा

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