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भारत में इस्लामिक स्टेट का जाल

भारत में इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) के तार यहां सक्रिय संगठन इंडियन मुजाहिदीन आदि से जिस तरह जुड़े मिल रहे हैं उसे देखते हुए भारत की गुप्तचर एजेंसियों को सतर्क हो जाना चाहिए और इस नेटवर्क की जड़ों को खत्म करने के पक्के इन्तजाम करने चाहिएं। हैदराबाद में बैठकर यदि कुछ लोग टी.वी. पत्रकारों की पकड़ में यह कहते हुए पाये जाते हैं कि वे भारत के लोकतन्त्र पर यकीन नहीं करते बल्कि इसका लाभ अपनी जेहादी मुहिम को फैलाने में करना चाहते हैं और आईएस के सिद्धान्त शरीया के तहत भारत को लाना चाहते हैं तो यह बहुत ही गंभीर और चिन्तनीय विषय है जिस पर भारत की सरकार को सख्ती से काम लेते हुए ऐसे विचारों को पनपने से रोकना होगा। भारतीय युवा मुसलमानों को धार्मिक उन्माद से भरने की ऐसी कार्रवाइयों को वहीं कुचल देना होगा जहां से इनके जन्म लेने की संभावना बनती है। हैदराबाद में बैठकर ये लोग यह कहने की जुर्रत करते हैं कि वे सीरिया जाकर आईएस के लड़ाकों के साथ संघर्ष करना चाहते हैं और यदि उन्हें वहां जाने में सफलता नहीं मिली तो वे घर (भारत ) में ही आईएस के तरीके से संघर्ष करेंगे। उनकी यह कार्रवाई भारत के मुसलमानों के लिए भी एक चुनौती है कि वे इन तत्वों को अपने बीच में किसी भी सूरत में न पनपने दें। ऐसे लोग न केवल इस्लाम को बदनाम करते हैं बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को भी नेस्तनाबूद कर देना चाहते हैं।

दुर्भाग्य यह है कि इन्हें इस्लाम तक की सही जानकारी नहीं है। कर्बला के धार्मिक युद्ध में 'हजरत इमाम हुसैन' के साथ 1400 साल पहले उन ब्राह्मïणों ने भी युद्ध लड़ा था जिन्हें भारत मे 'हुसैनी ब्राह्मण'  कहते हैं। हजरत हुसैन की याद में ये आज भी दिल्ली समेत पंजाब के कई स्थानों पर अपने अलग 'ताजिये' निकालते हैं। इन्हें 1400 साल पहले भी किसी ने मुसलमान बनाने की कोशिश नहीं की। इनके वंशज आज भी हिन्दू हैं और भारत में रहते हैं। इन्हीं के पूर्वज 'राहिल दत्ता' ने कर्बला युद्ध में हिस्सा लिया था। इसकी कहानी हुसैनी ब्राह्मïण बड़े गर्व से बताते हैं। अत: भारत में इस्लामिक स्टेट के पैरोकारों के लिए कोई जगह नहीं हो सकती जिनका ईमान ही दहशतगर्दी करके इंसानियत का कत्ल करना है और मानवीयता को शर्मसार करना है। जो लोग इस्लाम के मानने वाले मुसलमानों पर ही जुल्म ढहा कर कत्लोगारत करते हैं वे किसी 'दीन' के मानने वाले नहीं हो सकते मगर हैरत की बात यह है कि भारत के कुछ इलाकों में आईएस के झंडे फहरा कर भारत की सार्वभौमिकता को चुनौती देने की कोशिशें कुछ राष्ट्र विरोधी तत्व कर रहे हैं। ये तत्व कश्मीर में वहां के युवा वर्ग को भड़का कर धार्मिक उन्माद से लबरेज कर देना चाहते हैं।

ऐसे तत्वों को पाकिस्तान का सीधा समर्थन प्राप्त है। इस देश में आतंकवादियों की नये-नये नामों से अलग-अलग तंजीमें हैं। चाहे अलकायदा हो या लश्करे तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद अथवा तहरीके-तालिबान-पाकिस्तान सभी आईएस की मानसिकता में जकड़ी हुई हैं। कुछ दिन पहले पाक अधिकृत कश्मीर से अपनी गतिविधियां चलाने वाली तंजीम हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर ने एक वीडियो जारी करके कहा था कि उसका कश्मीर की कथित आजादी से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि सूबे में इस्लामी हुकूमत कायम करके शरीया लागू करना है। बहुत साफ है कि इस्लामी स्टेट की ये सभी संगठन सहायक के रूप में मदद कर रहे हैं और पाकिस्तान की सेना ऐसे संगठनों को पाल-पोस रही है अत: पाक की फौज भी इस मुहिम में शामिल कही जा सकती है मगर सबसे आश्चर्यजनक यह है कि कश्मीर के युवाओं को भड़काने और इस खूबसूरत वादी को दोजख में बदलने का ठेका पाकिस्तान हुर्रियत कांफ्रैंस के नेताओं को छोड़ रहा है और ये लोग उससे धन लेकर घाटी में पत्थरबाजी को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या कयामत है कि हर हुर्रियत नेता का 'रेट' बन्धा हुआ है। यह हकीकत भी टीवी पर सामने आ गई है। इन नेताओं के चेहरे पर पड़े हुए नकाब उतर चुके हैं। अब यह कश्मीर के लोगों को सोचना है कि क्या वे इन धोखेबाजों के इशारों पर अपना भविष्य तय करेंगे? जिन लोगों ने घाटी के स्कूलों तक को आग में जला डाला और जिन्होंने लेफ्टिनेंट फैयाज तक की बलि ले ली, क्या वे कभी उनके अपने हो सकते हैं? जिनका दीन और ईमान चन्द पैसों के लिए नीलाम हो गया हो वे कश्मीर को क्या दे सकते हैं?